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क्यों राम जन्मभूमि की रट लगाने वाली जमातें अयोध्या की हनुमानगढ़ी का नाम नहीं लेतीं?

अयोध्या की ऐतिहासिक हनुमानगढ़ी ने आज़ादी के पहले से ही अपनी व्यवस्था में लोकतंत्र और चुनाव का ऐसा अनूठा और देश का संभवतः पहला प्रयोग कर रखा है, जिसका ज़िक्र तक करना सांप्रदायिक घृणा की राजनीति करने वालों को रास नहीं आता.

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हनुमानगढ़ी अयोध्या (फोटो साभार: फेसबुक/@HanumanGarhi.Ayodhya)

1990 के बाद से जब भी लोकसभा या उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव होने को होते हैं, विभिन्न सत्ताकांक्षी पार्टियों द्वारा अपने और प्रतिद्वंद्वियों के राजनीतिक हानि-लाभ के मद्देनजर किसी न किसी बहाने अयोध्या के राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद को उनके केंद्र में लाया जाता रहा है.

कई बार तो विश्व हिंदू परिषद चुनावों के महीनों पहले से ही अयोध्या पहुंचकर इस मामले को गरमाना और आसमान सिर पर उठा लेना शुरू कर देती रही है.

इस बार की बदली हुई परिस्थितियों में उसने ऐसा न करने का फैसला कर रखा है ताकि नरेंद्र मोदी सरकार को राम मंदिर निर्माण का वादा न निभाने का नुकसान न उठाना पड़े.

फिर भी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गत रविवार को लखनऊ में जिस तरह प्रदेश में भाजपा के सारे प्रतिद्वंद्वियों का सूपड़ा साफ हो जाने का दावा करते हुए कहा कि हिंदू राम जन्मभूमि पर अपना दावा कभी नहीं छोड़ेंगे और जहां रामलला विद्यमान हैं, वही राम जन्मभूमि है, उससे साफ है कि उनकी जमातों ने अभी भी जरूरत के वक्त इस विवाद को निचोड़ने की नीयत छोड़ी नहीं है.

ऐसे में यह विश्वास करने के कारण हैं कि प्रचार अभियान में उपयुक्त अवसर आते ही इस बार भी विवाद को एंट्री दे दी जायेगी.

बताने की बात नहीं कि इस विवाद के बहाने शुरू की गई धर्मों या मंदिर-मस्जिद की राजनीति ने चुनावों को सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक मुद्दों से दूर ले जाकर देश और देशवासियों का कितना नुकसान किया है.

लेकिन देश के लोकतांत्रिक भविष्य के लिहाज से यह जानना कहीं ज्यादा जरूरी है कि भगवान राम के टाट में होने के बहाने राम जन्मभूमि व राम मंदिर की रट लगाने वाली जमातें अयोध्या की ऐतिहासिक हनुमानगढ़ी का नाम तक नहीं लेतीं.

भले ही उसने देश के आजाद होने के पहले ही अपनी व्यवस्था में लोकतंत्र और चुनाव का अपनी तरह का अनूठा और देश का संभवतः पहला प्रयोग कर रखा हो और अभी भी उसे सफलतापूर्वक संचालित करती आ रही हो.

यकीनन, उसका यह प्रयोग हमारे लोकतंत्र की बड़ी प्रेरणा हो सकता है, लेकिन अभी तक अलक्षित ही चला आ रहा है.

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और तेलंगाना समेत पांच राज्यों की विधानसभाओं के गत चुनाव में योगी आदित्यनाथ ने हनुमान को वनवासी गिरिवासी, वंचित और दलित वगैरह करार दिया तो भी उनकी इस गढ़ी के लोकतंत्र की शान में दो शब्द कहना जरूरी नहीं समझा क्योंकि ऐसा करना उनकी सांप्रदायिक घृणा की राजनीति को रास नहीं आने वाला था.

वैसे ही जैसे वे यह छिपाने में ही भलाई समझते हैं कि अवध की गंगाजमुनी संस्कृति के अनुरूप इस गढ़ी के निर्माण में नवाब शुजाउद्दौला का उल्लेखनीय योगदान रहा है.

बहरहाल, इस गढ़ी ने अठारहवीं शताब्दी की समाप्ति से बीस-पच्चीस साल पहले ही वयस्क मताधिकार पर आधारित लोकतंत्र को व्यवस्था और जीवनदर्शन के तौर पर अंगीकार कर लिया था.

वह भी अलिखित या अनौपचारिक रूप से नहीं, बाकायदा संविधान बना और लागू करके. पर्शियन (फ़ारसी) में लिखे गये इसके संविधान के अनुसार इसका सर्वोच्च पदाधिकारी गद्दीनशीन कहलाता है, जो वंश परंपरा, गुरु शिष्य परंपरा अथवा किसी उत्तराधिकार से नहीं आता.

उसका निश्चित अवधि के लिए बाकायदा चुनाव होता है, जिसके बाद उसे वचन देना पड़ता है कि वह गढ़ी की सारी संपत्ति को सामूहिक मानेगा, उसका संरक्षक बनकर रहेगा, उसे निजी प्रयोग में नहीं लायेगा, बर्बाद नहीं करेगा और पंचों के परामर्श के बगैर कोई कदम नहीं उठायेगा.

वचनभंग करने की स्थिति में संविधान में उसे दंडित करने की भी व्यवस्था है.

रामानंदी साधुओं के निर्वाणी अखाड़े की इस गढ़ी में कोई भी वैष्णव विरक्त किसी नगा के अंतर्गत शिक्षा-दीक्षा के लिए रह सकता है, लेकिन गढ़ी से संबद्धता या मताधिकार उसे यों ही नहीं मिल जाता.

इसके लिए उसे एक निर्धारित प्रक्रिया से गुजरना होता है. शिक्षा-दीक्षा के लिए गढ़ी में आने वाले को सादिक चेला या साधक शिष्य कहते हैं.

साधु बनने से पहले उसे छोरा बनना पड़ता है, फिर बारी-बारी से बंदगीदार, हुरदंगा, मुरेठिया, नगा और प्रतिश्रेणी नगा. प्रतिश्रेणी नगा हो जाने के बाद वह गढ़ी का सदस्य हो जाता है और उसे मताधिकार मिल जाता है.

जानना दिलचस्प है कि छठे गद्दीनशीन बाबा बलरामदास के समय साधुओं की संख्या छह सौ से ज्यादा हो गई और उनमें से अनेक के धर्म प्रचार के लिए विचरण करते रहने के कारण प्रबंध में समस्याएं आने लगीं, तो उनकी चार पट्टियां बनाई गईं-सागरिया, बसंतिया, उज्जैनिया और हरिद्वारी.

व्यवस्था दी गई कि ये चारों निर्वाणी अखाड़े से ही संबद्ध रहेंगी. प्रत्येक पट्टी के तीन उपविभाग भी बनाये गये- जमात खालसा, जमात हुंडा और जमात झुंडी.

नियमानुसार गढ़ी में कुल तीन पंचायतें हैं- पट्टी पंचायत, अखाड़ा पंचायत और अखाड़ा कार्यकारिणी की पंचायत. पहले चारों पट्टियों के मतदाता अपने महंत का चुनाव करते हैं, फिर अखाड़ा पंचायत चुनी जाती है.

अंत में अखाड़े और चारों पट्टियों से चुने गये 24 पंच अपना सरपंच चुनते हैं, जो अखाड़ा कार्यकारिणी की पंचायत का सरपंच कहलाता है.

उसका कार्यकाल दो साल होता है और उसको गद्दीनशीन के समक्ष सच्चाई, ईमानदारी व निष्पक्षता की शपथ लेनी पड़ती है.

जैसा कि पहले बताया ही गया है कि गद्दीनशीन को भी अखाड़े के पंच ही चुनते हैं.

पट्टी, अखाड़े अथवा अखाड़ा कार्यकारिणी की पंचायतों की बैठकें आहूत करने और उनकी सूचनाएं देने-दिलाने के लिए ‘कोतवाल’ नाम के एक पदाधिकारी की नियुक्ति होती है, जबकि हिसाब-किताब रखने वाले पदाधिकारी को ‘गोलकी’ या ‘मुख्तार’ कहते है.

हनुमानगढ़ी अयोध्या (फोटो साभार: फेसबुक/@HanumanGarhi.Ayodhya)

हनुमानगढ़ी अयोध्या (फोटो साभार: फेसबुक/@HanumanGarhi.Ayodhya)

पट्टियों की हर जमात से हर तीन वर्ष के लिए गोलकी नियुक्त किये जाते हैं और इस नियुक्ति में भी मतदाताओं का फैसला ही सिर-माथे होता है.

सच्चे अर्थों में पंच ही गढ़ी के प्रबंधक और मालिक होते हैं. अखाड़ा कार्यकारिणी की पंचायत में कोरम तब पूरा माना जाता है, जब कम से कम 16 पंच उपस्थित हों.

सारे फैसले बहुमत से किये जाते हैं और किसी मसले पर पक्ष विपक्ष के मत बराबर हो जायें तो सरपंच को निर्णायक मत देने का अधिकार होता है.

पंचायत जरूरत पड़ने पर गढ़ी की परंपराओं का पालन न करने या उसकी प्रतिष्ठा भंग करने वालों पर दंड तय कर सकती है. उनका सेर-सीधा बंद कर सकती है.

ज्ञातव्य है कि सेर-सीधा किसी साधु के सम्मान का प्रतीक होता है और इसके बंद होने का अर्थ है संबंधित साधु का गढ़ी से निष्कासन.

गढ़ी के दिशावाहकों ने शुरू से ही उसे मौरूसी या हाकिमी मठ बनाने के बजाय पंचायती मठ बनाया और लोकतंत्र व सामूहिकता के सिद्धांतों को अपनाने पर जोर दिया. लंबे इतिहास में गढ़ी को इसका लाभ भी मिला.

वह संपत्तियों व परिसंपत्तियों को लेकर दूसरे मठों व मंदिरों जैसे झगड़ों की शिकार नहीं हुई क्योंकि न वहां व्यक्तिगत संपत्ति है और न उसके लिए झगड़े की बांसुरी बजती है.

साधुओं की चारों पट्टियों को सत्ता संघर्ष से बचाने के लिए नियम है कि गद्दीनशीन बारी-बारी से हर पट्टी से चुना जायेगा और महज अखाड़े के प्रति उत्तरदायी होगा.

पट्टियों के महंतों के चुनाव में भी ध्यान रखा जाता है कि समान अवसर के सिद्धांत का उल्लंघन न हो. इसकी तीनों जमातों से बारी-बारी से महंत चुने जाते है और जिस जमात की बारी होती है, वह चुनाव में हिस्सा नहीं लेती.

कार्यकाल समाप्ति से पहले पद रिक्त हो जाने पर उपचुनाव भी कराये जाते हैं.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)