भारत

उदारीकरण के बाद बनीं आर्थिक नीतियों से ग़रीब और अमीर के बीच की खाई बढ़ती गई

जब से नई आर्थिक नीतियां आईं, चुनिंदा पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने के लिए खुलेआम जनविरोधी नीतियां बनाई जाने लगीं, तभी से देश राष्ट्र में तब्दील किया गया. इन नीतियों से भुखमरी, कुपोषण और ग़रीबी का चेहरा और विद्रूप होने लगा तो देश के सामने राष्ट्र को खड़ा कर दिया गया. खेती, खेत, बारिश और तापमान के बजाय मंदिर और मस्जिद ज़्यादा बड़े मुद्दे बना दिए गए.

(फोटो: रॉयटर्स)

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विकास की पूरी बहस आर्थिक विकास के इर्द-गिर्द सीमित हो गई है. आख़िर इस आर्थिक विकास ने हमें एक ऐसी चमक दी है, जो हमारी आंखों में पड़ती है और फिर हमें असमानता दिखाई देना बंद हो जाती है.

वर्तमान विकास मिथ्या सकारात्मकता का सबसे ज़्यादा निर्माण करती है. वर्ष 2018 की फोर्ब्स की रिपोर्ट (जो केवल दुनिया के अमीरों के काम, जीवन शैली और कमाई पर अध्ययन-प्रकाशन करती है) के मुताबिक भारत के 100 अरबपतियों (जिनकी संपदा रुपये में नहीं डॉलर में मापी जाती है) की कुल संपदा 32,964 अरब रुपये (492 अरब डॉलर) थी.

वर्ष 2017 के अनंतिम आंकड़ों के मुताबिक भारत की औसतन प्रति व्यक्ति आय 1,12,764 रुपये प्रति वर्ष थी. इस हिसाब से सबसे ज़्यादा संपदा संपन्न 100 लोगों की कुल संपदा का मतलब है 29.23 करोड़ लोगों की एक साल की कमाई.

वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में कुल परिवारों की संख्या की 24.5 करोड़ थी. इसका मतलब है कि 100 अरबपति देश की पूरी जनसंख्या की एक साल की कमाई से भी ज़्यादा संपदा पर क़ब्ज़ा रखते हैं.

फोर्ब्स की रिपोर्ट बताती है कि जिस साल (वर्ष 2017-18) में रुपये की कीमत गिर रही थी, बेरोज़गारी बढ़ रही थी. किसान आत्महत्या कर रहा था, वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) के आगाज़ ने अर्थव्यवस्था को झटका दिया था; उस साल भारत के 2.5 लाख सबसे अमीर परिवारों ने 2200 करोड़ रुपये प्रतिदिन के हिसाब से कमाई की.

इसके उलट भारत में लगभग 6 करोड़ लोग बेरोज़गारी के संकट से जूझ रहे हैं. भारत में वर्ष 1991 में आर्थिक उदारीकरण की नीतियों के शुरू होते समय एक भी डॉलर अरबपति नहीं थी.

वर्तमान में 121 अरबपति (ऐसे अमीर जिनकी संपत्ति अरब डॉलर में आंकी गई है) भारत की न सिर्फ़ अर्थव्यवस्था को ही अपने नियंत्रण में ले चुके हैं, बल्कि भारतीयों का व्यवहार, उपभोग और लोकतांत्रिक समझ को भी लगभग अपने क़ब्ज़े में कर लिया है.

आर्थिक उदारीकरण ने यह तय कर दिया था कि जिसके पास धन होगा, उसे ही सेवाएं हासिल होंगी. सरकार धीरे-धीरे जनकल्याणकारी राज्य की अवधारणा का परित्याग कर देगी और यही हुआ भी है.

ऑक्सफेम की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2017-18 में भारत के अरबपतियों ने 20,913 अरब रुपये की कमाई की. यह राशि भारत सरकार के बजट के बराबर थी.

भारत में उच्च पदस्थ अधिकारी को 8600 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से वेतन मिलता है, उसके परिणाम का मूल्यांकन लगभग नहीं होता है किंतु महात्मा गांधी ग्रामीण रोज़गार गारंटी क़ानून के तहत मज़दूर के लिए भारत में औसत मज़दूरी 187 रुपये तय है, जिसका मूल्यांकन भी होता है.

यानी इसी स्तर पर 46 गुना का भेद दिखाई देता है. भारत के सबसे बड़े उद्योगपति मुकेश अंबानी की संपत्ति हर रोज़ 300 करोड़ रुपये के हिसाब से बढ़ी.

यानी देश के 8 करोड़ किसान और मज़दूर की आय से इसका अंतर लगा पाना थोड़ा मुश्किल है. फिर भी जान लीजिए कि सबसे अमीर और श्रमिक की कमाई में 1.60 करोड़ गुना का अंतर है.

ज़रा ग़ौर से देखिये कि जब से नई आर्थिक नीतियां आईं, चुनिंदा पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने के लिए खुलेआम जनविरोधी नीतियां बनाई जाने लगीं, तभी से देश राष्ट्र में तब्दील किया गया.

इन नीतियों से भुखमरी, कुपोषण और ग़रीबी का चेहरा और विद्रूप होने लगा, तो देश के सामने राष्ट्र को खड़ा कर दिया गया. खेती, खेत, बारिश और तापमान के बजाय मंदिर और मस्जिद ज़्यादा बड़े मुद्दे बना दिए गए.

राष्ट्र के मानक ऐसे बने कि सच बोलना गुनाह और राष्ट्र विरोधी कृत्य क़रार दिया गया. अब हम ऐसे मुकाम पर आ खड़े हुए हैं, जब प्रमाण मांगना नया अक्षम्य अपराध क़रार दिया गया है.

बस चुप रह कर देखो और स्वीकार करो. यदि प्रमाण मांगा या अमन की बात की या उन नीतियों के बारे में कुछ कहा, जो कुछ पूंजीपति परिवारों को फायदा पहुंचा रही हैं, तो कारागार में डाल दिया जाएगा.

आशंका है कि शायद सरकारें अदालतों को भी यही निर्देश देने वाली हैं कि जो सत्ता कहे, उसे आदेश मान लिया जाए; न तो सुनवाई हो, न ही सबूतों की बात हो; बस राष्ट्र को ध्यान में रखा जाए; राष्ट्र यानी कौन? इसके बारे में भी बात करना ख़तरे से ख़ाली नहीं है.

असमानता का वर्तमान स्तर

क्रेडिट सुईस रिसर्च इंस्टिट्यूट की ग्लोबल वेल्थ रिपोर्ट-2018 (वैश्विक संपदा रिपोर्ट) के मुताबिक भारत की कुल संपदा 38,818 खरब रुपये की थी. इसमें से 30122.77 खरब रुपये की संपदा (78 प्रतिशत) पर देश के सबसे संपन्न 20 प्रतिशत लोगों का नियंत्रण था.

इसके बाद अगले 40 प्रतिशत लोगों के पास 8695.2 खरब रुपये (22.4 प्रतिशत) की संपदा थी. यही भारत का मध्यम वर्ग कहलाता है, जो दो पहिया, चार पहिया, एचडी टेलीविज़न और घर की मासिक किश्त के भुगतान को जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य मानता है.

वह पर्यावरण, नदियों के सूखने, बढ़ती हिंसा, सांप्रदायिकता और लोकतांत्रिक मूल्यों को अपने जीवन का प्राथमिक मसला नहीं मानता है.

देश के सबसे ग़रीब 20 प्रतिशत लोग केवल संपदा से वंचित ही नहीं है, बल्कि क्रेडिट सुईस की रिपोर्ट के मुताबिक भारत के सबसे गरीब 20 प्रतिशत (17 करोड़) लोगों की संपदा ऋणात्मक 349.36 खरब रुपये है, और उसके पास कोई संपदा नहीं है.

क्रेडिट सुईस ने अपने अध्ययन के लिए सकल मूल्य या संपदा के आकलन में परिवारों द्वारा अर्जित वितीय पूंजी और उनकी अचल संपत्ति, ज़मीन-जायदाद के मूल्य को शामिल किया है. इसमें से परिवारों के ऊपर मौजूद क़र्ज़ को घटा दिया गया है.

यह रिपोर्ट बताती है कि भारत के सबसे संपन्न 1 प्रतिशत वयस्कों के पास 9976 खरब रुपये की संपदा है. यानी भारत के 80 प्रतिशत वयस्कों की कुल संपदा से अधिक का मालिकाना इन एक प्रतिशत पूंजीपतियों के क़ब्ज़े में है.

ऐसे में स्वाभाविक सा सवाल उठता है कि जब देश के आर्थिक विकास और आर्थिक नीतियों का सूत्र इन एक प्रतिशत लोगों के हाथ में है, तो हम अपनी व्यवस्था से आज किस स्वतंत्रता और किस लोक कल्याण की अपेक्षा रख सकते हैं?

क्या यह एक अच्छी आर्थिक नीति का प्रमाण है कि 134 करोड़ लोगों के देश को एक प्रतिशत पूंजीपतियों का उपनिवेश बना कर रख दिया जाए!

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असमानता कुदरती रूप से पैदा नहीं होती है. नीतियों और मानवीय लोलुपता का स्वभाव इसे जन्म देता है. जब राज्य व्यवस्था बढ़ती असमानता पर सजग नहीं होती हैं, तब देश के संसाधन और संभावनाएं बर्बाद हो जाते हैं.

वस्तुतः आर्थिक नीतियां समाज में किस तरह की स्थिति पैदा करेंगी, यह उसके नज़रिये से तय होता है. उदारीकरण और निजीकरण ने एक तरफ़ तो पूंजी और संसाधनों को कुछ लोगों के हाथ में केंद्रित किया है, तो दूसरी तरफ निजीकरण के लिए राज्य व्यवस्था ने लोक अधिकारों, बुनियादी सेवाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा आदि पर अपनी ज़िम्मेदारियों को सीमित किया है.

इन सेवाओं के निजी क्षेत्र में जाने का असर यह हुआ कि समाज का वंचित तबका इन सेवाओं के लिए ख़र्च न कर पाने के कारण इनसे वंचित रहने लगा है.

अब हमारे यहां मोटे तौर पर दो तरह की व्यवस्थाएं बन गई हैं. सरकार द्वारा संचालित शिक्षा व्यवस्था, जिसमें भी 10 तरह के स्कूल, किताबें, शिक्षक और मानक हैं.

Allahabad: Children attend a class at a Government school on the occasion of 'World Literacy Day', in Allahabad, Saturday, Sept 8, 2018. (PTI Photo) (PTI9_8_2018_000090B)

फोटो: पीटीआई

90 प्रतिशत के लिए जो सरकारी स्कूल हैं, उनमें शिक्षक नहीं हैं, शिक्षक प्रशिक्षित नहीं हैं, बुनियादी ढांचा नहीं है, निगरानी और जवाबदेयता नहीं है. यानी कुल मिलकर वहां जीवन बदलने वाली गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं है. सरकार की नीतिगत मंशा इसे मज़बूत करने की नहीं है.

दूसरी व्यवस्था है निजी क्षेत्र में शिक्षा की; वह मंहगी है, उसके तरीके भी ऐसे हैं, जिनसे गरीब और वंचित लोग अपना जुड़ाव नहीं देख पाते हैं और बहुत सारे बच्चे उससे बाहर हो जाते हैं.

यहां शिक्षा एक बाज़ार और उत्पाद है. यहां निजी क्षेत्र यह नहीं मानता कि हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण समान शिक्षा का अधिकार देना उसकी संवैधानिक ज़िम्मेदारी है; यह ज़िम्मेदारी तो राज्य की मानी गई है.

व्यापक आर्थिक असमानता बच्चों को गहरे रूप में प्रभावित करती है. सामाजिक असमानता आर्थिक असमानता को और ज़्यादा धारदार बना देती है.

आर्थिक असमानता से आर्थिक ग़रीबी के दायरे का विस्तार होता है. ग़रीब बच्चों के लिए सरकार स्कूल चलाती है, किंतु उन स्कूलों और शिक्षा व्यवस्था को कमज़ोर रखती है. इससे शिक्षित ज़्यादातर बच्चे जीवन में बदलाव नहीं ला पाते हैं जिससे असमानता बढ़ती रही है.

यही बात स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी लागू होती है. हमारी आर्थिक नीतियों के कारण आर्थिक असमानता बढ़ी है. जो तबका इस असमानता का दंश भोग रहा है, उसे पीने का साफ़ पानी नहीं मिलता है, आवास की बुनियादी और स्वस्थ व्यवस्था नहीं मिलती है.

जब वह बीमार पड़ता है, तब उसे गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा भी नहीं मिलती है. वह बीमारी और वंचितपन के दुरूह चक्र में फंस जाता है. भारत में 93 प्रतिशत महिलाएं असंगठित क्षेत्र में काम करती हैं, उनके काम, वेतन, आर्थिक सुरक्षा कुछ भी सुरक्षित नहीं है. उन्हें मातृत्व हक़ भी नहीं मिलता है.

फोटो: रॉयटर्स

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इसके कारण गर्भावस्था के दौरान उन्हें भारी काम की मज़दूरी करनी पड़ती है, उन्हें आराम नहीं मिलता है, उन्हें स्वास्थ्य और पोषण का पूरा हक़ नहीं मिलता है.

पहले तो उनका प्रसव जोखिम में होता है, फिर जन्म के तत्काल बाद बच्चों को मां का दूध नहीं मिल पाता है. जिसका परिणाम होता है बच्चों का विकास बाधित होना, विकलांगता, शिशु मृत्यु और मातृत्व मृत्यु.

लगभग एक चौथाई बच्चे कम वज़न के साथ पैदा होते हैं. भारत में 58.4 प्रतिशत बच्चों को जन्म के तत्काल बाद मां का दूध (कोलेस्ट्रम) नहीं मिलता है और 91.3 प्रतिशत बच्चों को मां के दूध के साथ पर्याप्त ऊपरी आहार नहीं मिलता है.

भारत में हर साल जितनी मौतें होती हैं, उनमें से 12.4 प्रतिशत मौतें 0 से 4 साल की उम्र में होती हैं और 45 प्रतिशत मौतों में कारण होते हैं बच्चों का समय से पहले जन्म होना, कम वज़न और निमोनिया.

यदि 93 प्रतिशत वंचित महिलाओं को भी मातृत्व हक़ (यानी आर्थिक लाभ, आराम, स्वास्थ्य सेवाएं और पोषण आहार) दिया जाता, तो यह स्थिति बदल सकती थी.

वर्तमान स्थिति यह है कि प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना में भी ऐसी शर्तें शामिल हैं, जिनका मक़सद कम से कम महिलाओं को लाभ देना है. निजी, संगठित और राज्य व्यवस्था; तीनों से केवल 7% महिलाओं को हक़ मिलते हैं.

जब पालकों के सामने आजीविका की असुरक्षा का संकट होता है, तब वे अपने बच्चों की देखरेख नहीं कर पाते हैं. उन्हें स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा की गुणवत्ता से समझौता करना पड़ता है, क्योंकि आर्थिक ग़रीबी के कारण वे खुले मुनाफ़ाखोर बाज़ार से सेवाएं ख़रीद पाने की स्थिति में नहीं होते हैं.

इतना ही नहीं गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को या तो स्वास्थ्य और परामर्श मिलती ही नहीं हैं, या फिर ख़राब गुणवत्ता की सेवाएं मिलती हैं. ग़रीबी के कारण बच्चों को, ख़ास तौर पर लड़कियों को शिक्षा हासिल नहीं हो पाती है. इसका असर उनकी प्रजनन संबंधी भूमिका पर भी पड़ता है और उनकी निर्णय ले पाने की क्षमता नकारात्मक रूप से प्रभावित होती है.

यह महज़ सैद्धांतिक बात नहीं है, स्थापित तथ्य है कि आर्थिक असमानता से बच्चों के कुपोषण और मृत्यु दर का गहरा संबंध है.

संपदा विपन्न तबकों में कुपोषण और बाल मृत्यु दर का स्तर दो से तीन गुने तक ज़्यादा है. यदि इन तबकों में कुपोषण और बाल मृत्यु दर को कम करना है, तो इसके लिए संपदा के पुनर्वितरण और ज़िम्मेदार संयमित इस्तेमाल को नीति का केंद्रीय हिस्सा बनाना होगा.

भारत में जिस तरह से आर्थिक असमानता बढ़ रही है और संपदा पर एकाधिकार बढ़ता जा रहा है, उसके चलते देश में कुपोषण और बाल मृत्यु दर में प्रभावी कमी ला पाना मुश्किल होता जाएगा.

यह एक अनिवार्यता है कि बच्चों के अधिकारों और बेहतरी के लक्ष्य को आर्थिक समानता के लक्ष्य के साथ परस्पर संबंधित लक्ष्य के रूप में लागू किया जाए.

(लेखक सामाजिक शोधकर्ता और कार्यकर्ता हैं.)