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क्या मोदी सरकार ने चुनावी फायदे के लिए एक स्वतंत्र और विश्वसनीय लोकपाल की बलि दे दी

लोकपाल के अध्यक्ष और इसके सदस्यों की नियुक्ति में सत्ता पक्ष के सदस्यों की संख्या अधिक थी और चयन में पूरी तरीके से गोपनीयता बरती गई. ऐसा करना लोकपाल कानून के प्रावधानों का पूरी तरह से उल्लंघन है. चयन प्रक्रिया से समझौता करके मोदी सरकार ने कामकाज शुरू करने से पहले ही लोकपाल संस्था को कमजोर कर दिया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फोटो: रॉयटर्स)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फोटो: रॉयटर्स)

एक जनवरी 2014 को राष्ट्रपति ने संसद द्वारा पारित लोकपाल एवं लोकायुक्त कानून को मंजूरी दी थी. एक दमदार जन आंदोलन के बाद यह कानून बना था, जिसका मकसद भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए एक प्रभावी व स्वतंत्र लोकपाल (ऑम्बुड्समैन) बनाना था. ऐसा लोकपाल जो बिना किसी भय या पक्ष लिए उच्च स्तरीय सरकारी मशीनरी में भ्रष्टाचार के बड़े से बड़े मामलों को देखे.

लोकपाल की जरूरत इसलिए महसूस की गई क्योंकि देश में वर्तमान जांच एजेंसियां जैसे केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) आदि पर भरोसा नहीं रह गया था. इन जांच एजेंसियों को पिंजड़े में बंद तोता माना जाता है जो कि सत्ता में बैठे लोगों के इशारे पर काम करती हैं.

भ्रष्टाचार विरोधी एजेंडे पर 2014 का लोकसभा चुनाव जीतने के बाद मोदी सरकार से यह उम्मीद की जा रही थी कि वह लोकपाल की नियुक्ति के लिए जरूरी कदम उठाएगी ताकि इस संस्था पर भरोसा कायम हो.

दुर्भाग्यवश, ऐसा नहीं हुआ और सरकार ने देश को मजबूत लोकपाल देने के लिए अपनी इच्छा शक्ति नहीं दिखाई. पूरे पांच साल के अपने कार्यकाल के दौरान मोदी सरकार लोकपाल को नियुक्त करने में पूरी तरह विफल साबित हुई. हालांकि, अब 2019 के आम चुनाव से ठीक तीन सप्ताह पहले सरकार ने लोकपाल के अध्यक्ष और इसके सदस्यों को नियुक्त कर दिया है, लेकिन नियुक्ति की प्रक्रिया में दो तरीकों से पूरी तरह समझौता किया गया है.

पहला कारण ये है कि लोकपाल के अध्यक्ष और उसके सदस्यों के लिए नामों की सिफारिश करने वाली चयन समिति में सरकार के प्रतिनिधि और मनोनित सदस्य की अधिकता थी. यानि कि इस चयन समति में सत्ता पक्ष के ही ज्यादा लोग मौजूद थे.

एक संस्था की स्वतंत्रता को सुनिश्चत करने का महत्वपूर्ण सिद्धांत है कि चयन समिति में सत्ता पक्ष के सदस्यों की संख्या बहुमत में न हों. लोकपाल कानून में प्रावधान किया गया है कि चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा में विपक्ष के नेता, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या मुख्य न्यायाधीश द्वारा नियुक्त न्यायाधीश और इन चारों लोगों द्वारा द्वारा अनुशंसित एक न्यायविद (जूरिस्ट) शामिल होना चाहिए.

2014 के आम चुनाव के बाद किसी को भी विपक्ष के नेता के तौर पर मान्यता नहीं दी गई थी, इसलिए चयन समिति के नियमों में संशोधन कर विपक्ष के नेता की बजाय सबसे बड़े राजनीतिक दल के नेता को शामिल करने का प्रस्ताव किया जाना चाहिए था. जैसा कि, सीबीआई निदेशक की नियुक्ति के लिए किया गया. सीबीआई निदेशक की नियुक्ति के लिए बनी चयन समिति में विपक्ष के नेता की जगह सबसे बड़े राजनीतिक दल के नेता को शामिल करने का प्रस्ताव संसद के समक्ष रखा गया था, जिसे संसद ने पारित भी कर दिया.

लेकिन सरकार ने लोकपाल चयन समिति के लिए ऐसा संशोधन करने की बजाय 10 पेज का एक संशोधन बिल पेश कर दिया, जिसमें कानून में ही बदलाव करने की कोशिश की गई. जिसके चलते यह संशोधन विवादास्पद हो गया और पूरे कानून को संसद की स्थायी समिति को सौंप दिया गया. जिससे यह संशोधन अटक गया और पास नहीं किया जा सका.

भ्रष्टाचार विरोधी और पारदर्शिता के समर्थक कार्यकर्ताओं ने जब लोकपाल की नियुक्ति न करने का मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखा तो अप्रैल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि विपक्ष के नेता के बिना भी चयन समिति द्वारा लोकपाल की नियुक्ति की जा सकती है.

इसके बावजूद, मोदी सरकार ने लोकपाल की नियुक्ति नहीं की, जिसके बाद कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में अदालत की अवमानना का मामला रखा, तब जाकर लगभग 45 महीने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली चयन समिति की बैठक हुई.

इस बैठक में प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष और मुख्य न्यायाधीश ने चयन समिति के प्रख्याद न्यायविद के रूप में मुकुल रोहतगी की नियुक्ति की. रोहतगी मोदी सरकार के कार्यकाल में तीन साल तक अटॉर्नी जनरल रह चुके हैं.

लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को चयन समिति की बैठक में आमंत्रित तो किया गया था, लेकिन उन्हें निर्णय लेने की शक्तियां नहीं दी गईं. इसमें आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिए कि उन्होंने बैठक में शामिल होने से ही इनकार कर दिया.

इसकी वजह से लोकपाल का चयन करने वाली समिति में सत्ता पक्ष के प्रतिनिधियों की संख्या अधिक रही, जो कि लोकपाल कानून के मूल अवधारणा के खिलाफ है, जिसमें कहा गया है कि लोकपाल का चयन करते समय सत्ता पक्ष बहुमत की स्थिति में नहीं होना चाहिए.

दूसरा, लोकपाल की चयन समिति के कामकाज में गोपनीयता बरती गई. जबकि लोकपाल कानून की धारा 4(4) में स्पष्ट तौर पर प्रावधान किया गया है कि चयन समिति को पारदर्शी तरीके से चयन प्रक्रिया को पूरा करना होगा, जिसमें किसी की मनमानी न हो और जनता की जानकारी में लोकपाल का चयन हो.

कानून में कहा गया है, ‘लोकपाल के सदस्यों व अध्यक्ष का चयन करते वक्त चयन समिति अपनी प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी रखे.’

इसके बावजूद, इस प्रावधान का पूरी तरह उल्लंघन किया गया और लोकपाल चयन समिति की ओर से कोई पारदर्शी प्रक्रिया नहीं अपनाई गई. यहां तक कि सर्च कमेटी द्वारा शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों की सूची भी सावर्जनिक नहीं की गई. इतना ही नहीं, जब सूचना का अधिकार कानून के तहत चयन समिति की बैठकों की कार्यवाही (मिनट्स) मांगी गई तो यह कह कर देने से इंकार कर दिया गया कि यह गुप्त सूचना है.

इस तरह की पारदर्शिता का अभाव इसलिए भी समस्या खड़ी करता है, क्योंकि चयन समिति विपक्ष के नेता के बिना काम कर रही है.

दुर्भाग्यवश, चयन की प्रक्रिया से समझौता करके मोदी सरकार ने कामकाज शुरू करने से पहले ही लोकपाल संस्था को कमजोर कर दिया है. मोदी सरकार ने जिस तरह से दूसरी संस्थाओं को नुकसान पहुंचाया है, उसी तरह से चयन प्रक्रिया में समझौता करके लोकपाल संस्था को कमजोर करने का प्रयास किया है.

इस तरह, एक स्वघोषित चौकीदार के नेतृत्व में आगामी चुनाव में छोटा सा लाभ लेने के लिए एक स्वतंत्र एवं विश्वनीय लोकपाल की बलि दे दी गई.

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(लेखिका अंजलि भारद्वाज आरटीआई कार्यकर्ता हैं और सतर्क नागरिक संगठन एवं सूचना का जन अधिकार के लिए राष्ट्रीय अभियान से भी जुड़ी हैं.)