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छत्तीसगढ़: रमन सिंह के दामाद पर 50 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी का आरोप, जांच पैनल ने सौंपी रिपोर्ट

पूर्व मुख्यमंत्री के दामाद पुनीत गुप्ता पर आरोप है कि उन्होंने दाऊ कल्याण सिंह (डीकेएस) अस्पताल के अधीक्षक पद पर रहते हुए 50 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी की.

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह जिनके नेतृत्व में 15 सालों से राज्य में भाजपा की सरकार है. (फोटो साभार: फेसबुक/ रमन सिंह)

छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह. (फोटो साभार: फेसबुक/रमन सिंह)

रायपुर:  छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह के दामाद पुनीत गुप्ता के खिलाफ 50 करोड़ रुपये की कथित वित्तीय अनियमितता के मामले में जांच समिति ने एक रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है. सीनियर सरकारी अधिकारियों के तीन सदस्यीय जांच समिति ने ऑडिट रिपोर्ट पेश कर करोड़ों रुपये के घोटाले का आरोप लगाया है.

पुनीत गुप्ता पर आरोप है कि उन्होंने दाऊ कल्याण सिंह (डीकेएस) अस्पताल के अधीक्षक पद पर रहते हुए 50 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी की.

इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक जांच पैनल ने रायपुर के डीकेएस सरकारी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में वित्तीय अनियमितताओं को देखते हुए, बिना आधिकारिक अनुमोदन, ओवरस्पीडिंग और झूठी ऑडिट रिपोर्ट पेश कर करोड़ों रुपये का धोखाधड़ी करने का आरोप लगाते हुए एक रिपोर्ट पेश की है.

यह रिपोर्ट 18 पन्नों की उस रिपोर्ट पर आधारित है जिसमें छत्तीसगढ़ पुलिस ने पिछले सप्ताह भाजपा नेता व तीन बार मुख्यमंत्री रहे रमन सिंह के दामाद डॉ. पुनीत गुप्ता के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी.

पुनीत गुप्ता जनवरी 2016 से जनवरी 2019 तक डीकेएस अस्पताल के अधीक्षक थे. कांग्रेस सरकार ने जब उन्हें वहां से हटा दिया तो उन्होंने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया.

गौरतलब है कि पुलिस ने 16 मार्च को गुप्ता पर 50 करोड़ रुपये की वित्तीय अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ आपराधिक साजिश, जालसाजी और धोखाधड़ी के आरोप में केस दर्ज किया.

उन पर केस नए डीकेएस अधीक्षक डॉ. केके सहारे द्वारा पुलिस में किए शिकायत के आधार पर दर्ज किया गया, जिन्होंने छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा गठित समिति की रिपोर्ट का हवाला दिया है.

सहारे ने अपनी शिकायत में ज़िक्र किया है कि दिसंबर 2015 से अक्टूबर 2018 के दौरान अस्पताल के अधीक्षक पद पर रहते हुए गुप्ता ने बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी की. साथ ही यह भी बताया है कि जांच समिति द्वारा 8 मार्च को अस्पताल में निविदा प्रक्रिया में शामिल लोगों से बात करने के बाद रिपोर्ट प्रस्तुत की गई थी.

उन्होंने आरोप लगाया कि गुप्ता ने अपने ओहदे का दुरुपयोग किया और डॉक्टरों और अन्य स्टाफ को नियुक्त करने में नियमों की अनदेखी की. उन्होंने सरकारी धनराशि का दुरुपयोग कर ऐसी मशीनें खरीदीं, जिनका मरीज़ों के इलाज से कोई लेना-देना नहीं.

जांच समिति में विशेष सचिव एपी त्रिपाठी, संयुक्त सचिव प्रियंका शुक्ला और अतिरिक्त निदेशक रत्ना उजगले शामिल हैं. इस समिति का गठन 15 फरवरी को किया गया था.

जांच कमेटी में शामिल संयुक्त सचिव प्रियंका शुक्ला ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, ‘हमने रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है. इसके अलावा मैं अन्य मामले में कोई टिप्पणी नहीं करना चाहूंगी.’ वहीं रायपुर के एसएसपी आरिफ शेख ने बताया कि मामले की जांच चल रही है.

वहीं, डॉ. पुनीत गुप्ता ने इंडियन एक्सप्रेस के फोन कॉल और संदेशों का कोई जवाब नहीं दिया.

पैनल की रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य सरकार के मंजूरी के बिना बैंकों से ऋण प्राप्त करने लिए एक व्यापक परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) डीकेएस अधीक्षक द्वारा उपलब्ध कराई गई थी.

रिपोर्ट में यह भी बताया है कि उपयुक्त अधिकारी के अनुमोदन के बिना अस्पताल के रिकॉर्ड का हवाला दिया गया है कि चार्टर्ड अकाउंटेंसी फर्म ‘पीआर संचेती एंड कंपनी, देवेंद्र नगर’ द्वारा ऑडिट किया गया था. फर्म ने इस ऑडिट के संचालन से इनकार किया है.

डीकेएस अस्पताल के ऑडिटर, पीआर संचेती एंड कंपनी ने सूचित किया है कि उनके संगठन द्वारा ऐसा कोई ऑडिट नहीं किया गया था. डीकेएस अस्पताल द्वारा बैंक ऋणों के लिए प्रपत्रों में संलग्न ऑडिट रिपोर्ट उनके द्वारा तैयार नहीं किया गया है. यह रिपोर्ट उनके लेटरहेड पर किसी दूसरे के द्वारा तैयार और हस्ताक्षर किया गया है. इसलिए डीकेएस संस्थान ने बैंक ऋण प्राप्त करने के लिए जाली ऑडिट रिपोर्ट का इस्तेमाल किया.

एसएसपी आरिफ शेख ने बताया, ‘हमने जांच समिति का बयान ले लिया है. साथ ही चार्टर्ड अकाउंटेंसी फर्म से बात की है. हमने बैंकों से भी बात की है और उनसे आधिकारिक बातचीत की प्रतीक्षा कर रहे हैं.’

रिपोर्ट में बताया गया है कि कई विभागों में दिए गए टेंडर अनुमानित बजट से कहीं ज्यादा है. जैसे सुरक्षा सेवाओं के लिए रिपोर्ट में कहा गया है कि अनुमानित निविदा बजट 6.66 करोड़ रुपये का था, जबकि नियुक्त एजेंसी को 21.19 करोड़ रुपये का टेंडर दिया गया.

रिपोर्ट में बताया है कि वित्त विभाग ने उन मुद्दों को भी हरी झंडी दिखा दी थी, जिसमें निविदा के मुद्दे को मंजूरी नहीं दी गई थी. कपड़े धोने की सेवाओं के लिए अनुमानित निविदा राशि 5 करोड़ रुपये थी, जबकि निविदा वाली कंपनी को 17.28 करोड़ रुपये का भुगतान किया जाना है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि कंपनी की तुलना में एल-1 (सबसे कम बोली लगाने वाला) या बाजार दरों की तुलना से भी ज्यादा दरों को स्वीकृत किया गया.

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सरकारी नियमों का उल्लंघन करते हुए कर्मचारियों को अन्य पदों से डीकेएस अस्पताल में स्थानांतरित किया गया था और उन्हें वेतन श्रेणी से बाहर वेतन दिया गया.

‘आहार और अन्य संबंधित सेवाओं’ के लिए स्वीकृति उन शर्तों पर आधारित थी,  जिसके लिए कंपनी को 2 करोड़ रुपये का शुद्ध मूल्य और 6 करोड़ रुपये का वार्षिक कारोबार होना चाहिए. लेकिन टेंडर जिस कंपनी को जारी किया गया, उसकी कुल संपत्ति 1.6 करोड़ रुपये और 5 करोड़ रुपये का कारोबार था.

रिपोर्ट में कहा गया है कि तत्कालीन अधीक्षक उचित अधिकारियों से बिना मंजूरी के संबंधित कंपनियों को आशय पत्र जारी करते थे.

अस्पताल के निविदा समिति के सदस्यों से पूछताछ से पता चला है कि निविदाओं की शर्तों या उनमें परिवर्तन कथित तौर पर खुद अधीक्षक द्वारा किए गए थे. समिति ने दावा किया है कि सुरक्षा सेवा निविदाओं के लिए कोई अनुमोदन नहीं था और न ही उन्हें फार्मेसी सेवाओं के लिए जारी किए गए लोगों के बारे में पता था.

मालूम हो कि छत्तीसगढ़ में 2003 से 2018 तक भाजपा की सरकार रही और इस दौरान रमन सिंह सूबे के मुख्यमंत्री थे. 2018 में विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार के बाद रमन सिंह के दामाद गुप्ता का डीकेएस अस्पताल से तबादला कर दिया गया था.