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महाराष्ट्र: कपास किसानों की कब्रगाह बन चुके पश्चिमी विदर्भ का चुनावी हाल

महाराष्ट्र के पश्चिमी विदर्भ की चार यवतमाल-वासिम, अकोला, बुलढाणा और अमरावती सीटों की स्थिति. महाराष्ट्र का यह वो क्षेत्र, जहां बुलेट ट्रेन की कोई चर्चा ही नहीं. नाराज काश्तकारों में किसान सम्मान योजना के प्रति भी ज़्यादा रुचि नहीं. भंवर जांगिड़ की रिपोर्ट.

Cotton Farmers Reuters

(प्रतीकात्मक तस्वीर: रॉयटर्स)

शाम सात बजे का वक्त. जगह-अकोला घंटाघर. चाय की एक दुकान. मैंने बात शुरू की ही थी कि चुनाव बीच में आ गया.

कॉलेज से इसी साल डिग्री लेकर निकला सागर सबसे ज्यादा उत्तेजित था. बोला- शिवसेना 5 साल भाजपा से लड़ती रहती है. चुनाव आता है तो एक हो जाती है. और करती क्या है? बड़े भाई को तो नौकरी मिली नहीं है, मैं डिग्री लेकर कहां जाऊं?

अचानक एक शख्स सचिन मंडवाले बोला- सबको नौकरी कहां से देगी सरकार? सचिन ने सोचा नहीं था कि उसके कहते ही सब फट पड़ेंगे. कपास उगाने वाला नीलकंठ गरजकर बोला- बड़े आए हिमायती. सरकार जुबान हिला देती है. कपास का पैसा (न्यूनतम समर्थन मूल्य) दिया किसी को?

पश्चिमी विदर्भ पर कॉटन सुसाइड बेल्ट का दाग लगा हुआ है. यहां अकोला सीट त्रिकोणीय मुकाबले में फंसी है. संजय धोत्रे भाजपा सांसद हैं और इस बार भी टिकट उन्हीं को मिला है.

कांग्रेस ने पिछली बार हारे हिदायतउल्ला को फिर उतारा है. वंचित बहुजन आघाड़ी से प्रकाश आंबेडकर खुद यहीं से चुनाव लड़ रहे हैं. उन्होंने पिछली बार भी 14% वोट लेकर कांग्रेस को 15% वोटों पर रोक दिया था.

भाजपा की जीत में लोग उनका हाथ भी मानते हैं. इस बार भी शायद वही कहानी यहां दोहराई जाने वाली है. कॉटन सुसाइड बेल्ट की सबसे प्रभावित सीट यवतमाल-वाशिम है.

विदर्भ के किसानों के मुद्दे उठाने वाले किशाेर तिवारी से हमने बात की. तिवारी कहते हैं, जैसे राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में किसानों ने सरकार बदल दी…वैसा गुस्सा यहां भी दिख सकता है. महाराष्ट्र की 48 में से कम से कम 25-26 सीटों पर बड़ा असर पड़ेगा.

यहां शिवसेना की सांसद भावना गवली पांचवीं बार चुनाव मैदान में उतरी हैं. वे वाशिम से आती हैं इसलिए यवतमाल के लोग भेदभाव का आरोप लगाते हैं.

पड़ोसी सीट बुलढाणा पर भी शिवसेना है. प्रतापराव जाधव दो बार से सांसद हैं पार्टी ने उन्हीं पर भरोसा जताया है. एनसीपी ने यहां इस बार डाॅ. राजेंद्र सिंगणे को उतारा है. सिंगणे कुणबी जाति से हैं जिसका यहां बड़ा प्रभाव है.

कुणबी-मराठों में एंटी इन्कम्बेंसी नजर आती है. अमरावती एजुकेशन व बिजनेस हब है.

विदर्भ के राजनीतिक विश्लेषक प्रो. जवाहर चरड़े बताते हैं, ‘मुस्लिम बाहुल्य एरिया होने तथा संघ का असर कम होने के कारण भाजपा यहां कमजोर ही रही है, जिन्हें टिकट नहीं मिलता है वे शिवसेना में चले जाते हैं.’

अभी यहां चार सीटों में से तीन पर शिवसेना मुद्दे क्या हैं?

किसान: कॉटन सुसाइड बेल्ट की बदनामी सबसे बड़ा इश्यू. तीन साल से अकाल है.

बेरोजगारी: इंडस्ट्रीज नहीं है इसलिए युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा. कपास की खेती करने वालों के खेत सूखे हैं, उन्हें भी मजदूरी नहीं मिल रही.

रेल मार्ग: पुलगाव-आरवी लाइन और यवतमाल-परतवाड़ा लाइन 10 साल से बंद है. वर्धा- यवतमाल-नांदेड़ रेल लाइन सरकार ने मंजूर की मगर काम बहुत धीमा. बुलढाणा में रेल ही नहीं है.

सीटों की स्थिति

अमरावती- शिवसेना

यवतमाल- शिवसेना

बुलढाणा- शिवसेना

अकोला- भाजपा

जातीय समीकरण: कुणबी चारों सीटों पर सबसे ज्यादा निर्णायक हैं. इनकी आबादी करीब 12 लाख है. बंजारा व वंजारी यह गोपीनाथ मुंडे की जाति भी है, दोनों मिलाकर 5 लाख है जो भाजपा-कांग्रेस में बंटे हुए हैं. मुस्लिम करीब 6 लाख हैं.

(दैनिक भास्कर से विशेष अनुबंध के तहत प्रकाशित)