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क्लीन गंगा फंड की 80 फीसदी से अधिक राशि अब तक ख़र्च नहीं हुई

द वायर द्वारा प्राप्त किए गए दस्तावेज़ों से पता चलता है कि वित्त मंत्री अरुण जेटली की अध्यक्षता वाली क्लीन गंगा फंड के बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज की समय पर बैठक नहीं होने की वजह से गंगा सफाई के लिए परियोजनाओं की स्वीकृति और पैसे ख़र्च नहीं हो पा रहे हैं.

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वाराणसी में बहती गंगा नदी. (फोटो: कबीर अग्रवाल/द वायर)

नई दिल्ली: मोदी सरकार द्वारा गठित स्वच्छ गंगा निधि (क्लीन गंगा फंड या सीजीएफ) में प्राप्त की गई कुल राशि का अब तक सिर्फ 18 फीसदी पैसा ही ख़र्च किया गया है. द वायर द्वारा दायर किए गए सूचना का अधिकार आवेदन में इसका खुलासा हुआ है.

सितंबर 2014 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने गंगा सफाई के लिए स्वच्छ गंगा निधि (सीजीएफ) के निर्माण को मंजूरी दी थी और जनवरी 2015 में इसका गठन किया गया था. इसका उद्देश्य है कि आम जनता, निजी कंपनियां, सरकारी कंपनियां, प्रवासी भारतीय (एनआरआई) और भारतीय मूल के व्यक्ति (पीआईओ) इसमें योगदान या चंदा देंगे.

सीजीएफ के गठन से लेकर दिसंबर 2018 तक इसमें कुल 243.27 करोड़ रुपये प्राप्त हुए. लेकिन अभी तक सिर्फ 45.26 करोड़ रुपये ही गंगा सफाई के कामों के लिए ख़र्च किए गए हैं. इस हिसाब से मात्र करीब 18 फीसदी राशि ही ख़र्च की गई है.

जबकि, दिसंबर 2017 में जारी राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) पर नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में इस बात को लेकर सचेत किया गया था कि स्वच्छ गंगा निधि में जितनी राशि प्राप्त हुई है उसका बहुत कम हिस्सा ही ख़र्च किया गया है. कैग ने कहा था कि गंगा सफाई की दिशा में हो रहे कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए सीजीएफ के पैसे ख़र्च करने ज़रूरी हैं.

कैग ने इसके लिए सुझाव दिया था कि एनएमसीजी को स्वच्छ गंगा कोष की वृद्धि और उपयोग के लिए कार्य योजना तैयार करना चाहिए. हालांकि कैग द्वारा चेतावनी दिए जाने के बाद भी सीजीएफ की सिर्फ 18 फीसदी राशि ही ख़र्च की गई है.

बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज की मीटिंग न होना है एक बड़ी वजह

केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली की अध्यक्षता में सीजीएफ के संचालन के लिए एक ट्रस्ट बनाया गया था. वित्त मंत्री के अलावा आर्थिक मामलों के मंत्रालय के सचिव, जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय के सचिव, पर्यावरण मंत्रालय के सचिव, प्रवासी भारतीय मामले विभाग के सचिव और राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के सीईओ इस ट्रस्ट के सदस्य होते हैं.

इस ट्रस्ट का काम गंगा सफाई के कार्यों के लिए सीजीएफ राशि के तहत परियोजनाओं को स्वीकृति देना है. हालांकि आरटीआई के ज़रिये द वायर द्वारा प्राप्त किए गए दस्तावेजों से पता चलता है कि बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज की बैठक नहीं होने की वजह से परियोजनाओं को स्वीकृति देने में देरी हो रही है और पैसे ख़र्च नहीं हो पा रहे हैं.

सीजीएफ के बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज की अब तक सिर्फ दो बैठकें हुई हैं. पहली बैठक 29 मई 2015 को हुई थी, वहीं दूसरी बैठक 4 मई 2018 में सर्कुलेशन के ज़रिये की गई थी.

द वायर द्वारा प्राप्त किए गए इन बैठकों के मिनट्स से ये पता चलता है कि ट्रस्ट के सदस्यों की अनुपलब्धता की वजह से ये बैठकें नहीं हो पा रही हैं. नियम के मुताबिक हर तीन महीने में इसकी कम से कम एक बैठक होनी चाहिए.

चार मई 2018 को हुई दूसरी बैठक के मिनट्स में लिखा है, ’29/05/2015 को हुई बैठक के बाद 13 फरवरी और 28 फरवरी को वित्त मंत्री अरुण जेटली की अध्यक्षता में क्लीन गंगा फंड से परियोजनाओं की स्वीकृति के लिए बैठक कराने की कोशिश की गई थी, लेकिन प्रशासनिक कारणों से ये नहीं हो सका.’

इसमें आगे लिखा है, ‘बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज के सदस्यों के कारण और वित्त मंत्री की व्यस्तता की वजह से बैठक कराने में मुश्किल हो रही है. खासतौर से मीटिंग के लिए ज़रूरी उपयुक्त स्तर पर न्यूनतम सदस्यों की उपस्थिति नहीं होने के कारण भी बैठक नहीं हो पा रही है. चूंकि क्लीन गंगा फंड में अच्छी खासी मात्रा में पैसे इकट्ठा हो गए हैं इसलिए गंगा सफाई और इसके संरक्षण के लिए परियोजनाओं की स्वीकृति और पैसे ख़र्च करने ज़रूरी हैं.’

चार मई 2018 को हुई बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज की दूसरी बैठक के समय क्लीन गंगा फंड से सिर्फ 29.99 लाख रुपये ही ख़र्च किए जा सके थे. साल 2017 में जारी कैग ने अपनी रिपोर्ट में इस बात को लेकर चिंता जताई थी कि सीजीएफ के बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज की बहुत कम बैठकें हो रही हैं और इसके पैसै ख़र्च नहीं किए जा रहे हैं.

इस मामले में द वायर द्वारा सवाल पूछे जाने पर राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के संचार विभाग की सीनियर कंसल्टेंट संजम चीमा ने कहा कि चूंकि राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के महानिदेशक अभी आधिकारिक दौर पर हैं, इसलिए अभी जवाब नहीं दिया जा सकता है.

क्लीन गंगा फंड में सबसे कम योगदान विदेश में रहने वाले भारतीयों का रहा

जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय की ओर से मिली जानकारी के मुताबिक, सीजीएफ में सबसे ज़्यादा 202.31 करोड़ रुपये का योगदान सरकारी कंपनियों (सार्वजनिक उपक्रम या पीएसयू) ने किया है, जो कि कुल योगदान का 83 फीसदी से भी ज़्यादा है. वहीं निजी कंपनियों ने 26.12 करोड़ रुपये का योगदान दिया है और ये कुल योगदान का 10.73 फीसदी है.

क्लीन गंगा फंड में सबसे कम योगदान विदेशों में रहने वाले भारतीय (एनआरआई व पीआईओ) ने किया है. इन्होंने कुल मिलाकर 3.89 करोड़ रुपये दिए हैं, जो कि कुल योगदान का मात्र 1.6 फीसदी है. वहीं, व्यक्तिगत रूप से भारतीय लोगों ने 10.93 करोड़ का योगदान गंगा सफाई के लिए क्लीन गंगा फंड में दिया है.

क्लीन गंगा फंड का एक मुख्य उद्देश्य यह भी है कि इसमें विदेश में रहने वाले भारतीय भी योगदान दे सकेंगे. हालांकि आंकड़े दिखाते हैं कि सबसे कम इसी वर्ग का योगदान रहा है.

कैग ने साल 2017 की अपनी रिपोर्ट में कहा था कि चूंकि एनएमसीजी ने विदेश में इस कोष या फंड को स्थापित नहीं किया है इसलिए एनआरआई/पीआईओ का योगदान न के बराबर रहा है. उस समय एनएमसीजी ने कैग को जवाब दिया था कि विदेश मंत्रालय के साथ मिलकर विदेश में फंड स्थापित करने की संभावनाओं को तलाशा जा रहा है.

गंगा नदी (फोटो: रॉयटर्स)

गंगा नदी (फोटो: रॉयटर्स)

10 जुलाई 2014 को अपने बजट भाषण में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि सरकार एक एनआरआई फंड का गठन करेगी ताकि गंगा के संरक्षण में योगदान देने के लिए एनआरआई और पीआईओ के उत्साह को बढ़ावा मिल सके.

हालांकि आरटीआई के तहत मिली जानकारी से पता चलता है कि सरकार ने अभी तक विदेश में इस फंड को स्थापित नहीं किया है, जबकि सरकार ने अपने पांच साल का कार्यकाल भी पूरा कर लिया है और लोकसभा चुनाव 2019 की तैयारियां चल रही हैं.

कैग और संसदीय समिति समेत कई सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा गंगा सफाई और उसकी अविरलता को लेकर चिंता जताने के बाद भी सरकार द्वारा सीजीएफ राशि को ख़र्च न करना मोदी सरकार के गंगा सफाई के दावे पर सवालिया निशान खड़ा करता है.

स्वच्छ गंगा निधि के तहत स्वीकृत किए गए कार्य

आरटीआई के ज़रिये मिली जानकारी के मुताबिक, स्वच्छ गंगा निधि (सीजीएफ) से प्राप्त की गई राशि में से करीब 87.84 करोड़ रुपये को वित्त वर्ष 2018-19 में उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल में गंगा तट पर वनीकरण के लिए ख़र्च किए जाने हैं. ये कार्य राज्य वन विभाग द्वारा कराए जाने हैं.

इसके अलावा 19 करोड़ रुपये की राशि को पांच नालों के ट्रीटमेंट के लिए आवंटित किया गया है. इसमें से बिहार के पटना का राजपुरा नाला, पटना का दिघा घाट नाला, हरिद्वार का लक्सर नाला, पटना का दानापुर कैंट नाला और इलाहाबाद के नेहरू नाले के उपचार के लिए कार्य कराए जाने हैं.

वहीं सीजीएफ के 98.30 करोड़ रुपये की राशि को घाटों और श्मशान घाटों के पुनर्विकास के लिए ख़र्च किया जाना है. इसके तहत उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर का एक घाट और वाराणसी के दस कुंड/तालाब, बिहार में छपरा और सुल्तानगंज में घाट एवं श्मशान घाट, पश्चिम बंगाल के कटवा, कलना, अग्रद्वीप और दैनहाट में घाट एवं श्मशान घाट और उत्तराखंड में कन्खल एवं खारखारी में श्मशान घाट के लिए कार्य किए जाने हैं.

इनके अलावा, उत्तराखंड पर्यटन विकास बोर्ड द्वारा चलाए जा रहे गौरी कुंड प्रोजेक्ट में भी सीजीएफ राशि को ख़र्च किया जाना है.

मालूम हो कि मोदी सरकार गंगा सफाई की दिशा में किए जा रहे कार्यों को लेकर सवालों के घेरे में है. आलम ये है कि गंगा सफाई के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में बनी सर्वोच्च समिति ‘राष्ट्रीय गंगा परिषद’ की आज तक एक भी बैठक नहीं हुई है. नियम के मुताबिक एक साल में कम से कम इसकी एक बैठक होनी चाहिए.

वहीं, मंत्रालय स्तर की सर्वोच्च समिति ‘एम्पावर्ड टास्क फोर्स ऑन रिवर गंगा’ की अब तक सिर्फ दो बैठकें हुई हैं. नियम के मुताबिक एक साल में इसकी कम से कम चार बैठकें होनी चाहिए. इसके अलावा भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी अध्यक्षता वाली प्राक्कलन समिति ने गंगा सफाई की दिशा में हो रहे कार्यों पर घोर निराशा जताई थी और सरकार द्वारा इस दिशा में तेजी से कार्य करने की सिफारिश की थी.

पिछले साल अक्टूबर में द वायर ने एक रिपोर्ट में बताया था कि पहले की तुलना में किसी भी जगह पर गंगा साफ़ नहीं हुई है, बल्कि साल 2013 के मुक़ाबले गंगा नदी कई सारी जगहों पर और ज़्यादा दूषित हो गई हैं. जबकि 2014 से लेकर जून 2018 तक में गंगा सफाई के लिए 5,523 करोड़ रुपये जारी किए गए, जिसमें से 3,867 करोड़ रुपये ख़र्च किए जा चुके थे.

इसके अलावा पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन संस्था केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने अपने अध्ययन में पाया है कि जिन 39 स्थानों से होकर गंगा नदी गुज़रती है उनमें से सिर्फ एक स्थान पर साल 2018 में मानसून के बाद गंगा का पानी साफ था.

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए सीपीसीबी ने ‘गंगा नदी जैविक जल गुणवत्ता आकलन (2017-18)’ नाम से एक रिपोर्ट जारी की थी जिसमें ये बताया गया था कि गंगा बहाव वाले 41 स्थानों में से करीब 37 पर साल 2018 में मानसून से पहले जल प्रदूषण मध्यम से गंभीर श्रेणी में रहा था.