राजनीति

ओडिशा में नवीन पटनायक और नरेंद्र मोदी के बीच ही मुख्य मुक़ाबला

वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष मिश्रा बता रहे हैं कि ओडिशा में मुख्य मुक़ाबले से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी दूर नज़र आ रहे हैं. गांवों में भी लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की संभावनाओं की चर्चा कर रहे हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक. (फोटो: पीटीआई)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक. (फोटो: पीटीआई)

ओडिशा के हाई वोल्टेज चुनावी समर में केंद्र का राज्य से और नरेंद्र मोदी का नवीन पटनायक से मुक़ाबला ही मुद्दा है. ये दोनों नेता ही भाजपा और बीजद के पोस्टर-बैनरों पर छाए हुए हैं.

इनके मुक़ाबले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के पोस्टर भुवनेश्वर व कटक में काफी कम हैं. गांवों में भी लोग मोदी व पटनायक की संभावनाओं की चर्चा कर रहे हैं.

राहुल इन बहस से दूर हैं. 19 सालों से मुख्यमंत्री बीजू जनता दल (बीजद) के अध्यक्ष नवीन पटनायक 2014 में मोदी लहर को ओडिशा में रोकने में क़ामयाब रहे थे.

बीजद ने यहां की 21 में से 20 लोकसभा सीट जीती थी. एक सीट भाजपा को मिली थी और कांग्रेस खाता भी नहीं खोल सकी थी. पटनायक फिर इस प्रदर्शन को दोहराना चाहते हैं, लेकिन इस बार भाजपा भी ओडिशा में कमल खिलाने के लिए प्रतिबद्ध है.

दोनों दलों के बीच पहले से ही आरोप-प्रत्यारोप शुरू थे और अब ये और तेज़ हो रहे हैं. बीजद ने मोदी पर जान-बूझकर राज्य को नज़रअंदाज़ करने और विशेष दर्जे की मांग पूरा नहीं करने का आरोप लगाया है. जबकि भाजपा मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को झूठा क़रार देते हुए केंद्र के साथ सहयोग नहीं करने का हवाला दे रही है.

पटनायक ने राज्य को वित्तीय स्वायत्तता देने की मांग भी रख दी है. बीजद सचिव बिजय नायक कहना है कि केंद्र हमारी मदद नहीं कर सकता तो उसे हमें वित्तीय स्वायत्तता देनी चाहिए. हम अपने पैसे से अपना काम चला लेंगे.

राज्य सरकार और केंद्र विभिन्न मसलों को लेकर टकरा भी रहे हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल के दौरे में केंद्रीय आयुष्मान भारत योजना की बजाय बीजू स्वास्थ्य कल्याण योजना लागू करने पर पटनायक सरकार की आलोचना की है.

बीजद नेताओं का कहना है कि उनकी योजना केंद्रीय योजना की तुलना में ज़्यादा बेहतर है और उसकी पहुंच भी ज़्यादा है.

भाजपा नेता और पदमपुर के विधायक प्रदीप पुरोहित का कहना है कि ओडिशा सरकार केंद्र की योजनाओं को नज़रअंदाज़ कर रही है. इससे राज्य के लोगों का ही नुकसान होगा.

(ग्राफिक्स साभार: दैनिक भास्कर)

(ग्राफिक्स साभार: दैनिक भास्कर)

नवीन पटनायक ने किसानों के लिए कृषक असिस्टेंस फॉर लाइवलीहुड एंड ऑगमेंटेशन (केएएलआईए) योजना शुरू की है. इसमें बंटाई पर खेती करने वाले व भूमिहीन कृषि मज़दूर भी शामिल हैं. लेकिन, वह केंद्र की पीएम किसान योजना को लागू करने में हिचकिचाते रहे और कई बार कहने के बाद ही लाभान्वित किसानों की सूची केंद्र को भेजी.

केंद्र व राज्य के बीच बढ़ते मतभेद ही इस चुनाव का मुख्य मुद्दा है. बीजद इसे राज्य के सम्मान से जोड़ रही है.

बिजय नायक कहते हैं कि नवीन पटनायक के पिता बीजू पटनायक ने उड़िया सम्मान की लड़ाई लड़ी थी. मुख्यमंत्री भी पिता के पदचिह्नों पर चल रहे हैं. लोग उन्हें फिर समर्थन देंगे.

राज्य में क्षेत्र आधारित मुद्दे हैं. पश्चिम ओडिशा के पांच पश्चिमी संसदीय क्षेत्र कालाहांडी, बोलनगीर, संभलपुर, बारगढ़ और सुंदरगढ़ लगातार सूखे से प्रभावित हैं. यहां किसानों की आत्महत्याएं प्रमुख मुद्दा है.

सरकार ने ख़ुद माना है कि 2013 से 2018 के बीच 227 किसानों ने आत्महत्या की है. ज़्यादातर पश्चिमी इलाके से हैं, जहां सिंचाई के संसाधन बहुत ही कम हैं.

कालाहांडी के कुछ हिस्सों को छोड़ दें तो यहां सिंचाई योजना नहीं है. 1340 करोड़ रुपये की गंगाधर मेहर लिफ्ट सिंचाई परियोजना शुरू नहीं हुई है. 15 ज़िलों में पानी देने वाला हीराकुंड बांध का जलस्तर महानदी पर छत्तीसगढ़ में बांध व बैराज बनने से प्रभावित हुआ है. दोनों राज्यों के बीच पानी के बंटवारे का विवाद पंचाट के सामने है.

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार आने से विकट स्थिति हो गई है. कांग्रेस के पूर्व विधायक लतेंदु महापात्रा कहते हैं कि हमारी सरकार मसले को हल करने की कोशिश करेगी.

कटक समेत नौ तटीय लोकसभा क्षेत्रों में महानदी विवाद मुद्दा रहेगा. जाति ओडिशा में चुनावी मुद्दा नहीं रही. इस बार माओवादियों के प्रभाव वाले कंधमाल और कोरापुट के कुछ क्षेत्रों में जनजातियां सरकार के ख़िलाफ़ हो सकती हैं.

सड़क संपर्क न होने और विकास की कमी की वजह से लोग नाराज़ हैं. उनकी ज़िंदगी मुश्किल हुई है, वे माओवादियों की हिंसा का भी शिकार हो रहे हैं. कांग्रेस के प्रभाव वाले इस आदिवासी क्षेत्र में कांग्रेस को फायदा हो सकता है.

राजनीतिक विश्लेषक प्रो. आनंद मिश्रा कहते हैं कि चुनाव बीजद और भाजपा के बीच प्रतिष्ठा की लड़ाई है. यह दो व्यक्तियों (नरेंद्र मोदी और नवीन पटनायक) और उनके विकास के एजेंडे का संघर्ष भी है.

पिछले चुनाव की तुलना में इस बार बालाकोट हमले के बाद मोदी यहां ज़्यादा पॉपुलर हुए हैं, लेकिन नोटबंदी व जीसएटी को आम लोगों ने पसंद नहीं किया है. जहां तक मुद्दों और प्रसिद्धि का सवाल है तो अभी पटनायक आगे दिखते हैं.

(दैनिक भास्कर से विशेष अनुबंध के तहत प्रकाशित)