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निर्भया मामले के बाद बनी दिल्ली सरकार की महिला हेल्पलाइन की कर्मचारी दो हफ़्तों से धरने पर

बीते दिनों दिल्ली महिला आयोग की 181 हेल्पलाइन का ज़िम्मा एक निजी कंपनी को सौंप दिया गया, जिसके बाद यहां काम करने वाली महिला कर्मचारियों ने आयोग पर बिना क़ानूनी प्रक्रिया के मनमाने ढंग से यह फैसला लेने का आरोप लगाया है. वहीं आयोग का कहना है कि हेल्पलाइन में ठीक से काम न होने के चलते यह कदम उठाना पड़ा.

(फोटो साभार: फेसबुक)

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दिल्ली महिला आयोग द्वारा आयोग की हेल्पलाइन 181 के निजीकरण किए जाने के बाद इस हेल्पलाइन से जुड़ी महिलाएं दिल्ली सचिवालय के सामने बीते पंद्रह दिनों से प्रदर्शन कर रहीं हैं.

महिलाओं का आरोप है कि उनको बिना भरोसे में लिए, बिना नोटिफिकेशन जारी किए और बिना क़ानूनी प्रक्रिया का पालन किए इस हेल्पलाइन को अचानक एक निजी कंपनी केयरटेल के हाथों में सौंप दिया है.

बता दें साल 2012 में दिल्ली में हुए निर्भया बलात्कार मामले के बाद इस हेल्पलाइन को शुरू किया गया था. इस हेल्पलाइन का उद्देश्य था कि देश भर से महिलाएं अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न के मामलों को कॉल के जरिये साझा करें, जिससे उनकी मदद की जा सके.

इस प्रक्रिया में महिलाओं की शिकायत मिलने के बाद हेल्पलाइन 181 की महिला कर्मचारियों को स्थानीय पुलिस थाने को सूचना देनी होती थी, एमएलसी (मेडिकल सर्टिफिकेट) से लेकर प्राथमिकी दर्ज कराने की प्रक्रिया में पीड़िताओं के साथ रहना होता था. कई बार मानसिक रूप से परेशान पीड़िताओं को इन कर्मचारियों द्वारा काउंसिलिंग भी दी जाती थी.

अब इन महिलाओं का कहना है कि जिस उद्देश्य से दिल्ली सरकार ने इस हेल्पलाइन को शुरू किया था वो उद्देश्य इस केयरटेल में ख़त्म होता नज़र आ रहा है.

इस हेल्पलाइन की कर्मचारी गीता पांडेय कहती हैं, ‘यह हेल्पलाइन 181 लगभग तीन सालों से दिल्ली महिला आयोग से चल रही है. दिल्ली महिला आयोग ने हमें अचानक 23 मार्च बताया कि आप सब को अगले दिन से केयरटेल कंपनी को जॉइन करना है. इसका ऑफिस पश्चिमी दिल्ली में नारायणा इंडस्ट्रियल एरिया में हैं. उन्होंने उस वक़्त हमसे कहा था कि आप महिला आयोग के ही कर्मचारी रहेंगें बस आपको काम केयरटेल कंपनी से करना होगा. हमने वहां जाकर तीन दिन काम किया और वहां हमें बताया गया कि अब हम केयरटेल के कर्मचारी हैं और हमें दिल्ली महिला आयोग से इस्तीफ़ा देना होगा. हमारी सैलरी भी यहीं से बनेगी और सभी की शुरूआत ज़ीरो से की जाएगी. इसका सीधा मतलब है हमारी सैलरी घटाई भी जाएगी.’

उन्होंने बताया, ‘मीटिंग में यह भी कहा गया कि हम सबका पुराना जॉब स्टेटस बदला जाएगा और अब हम केयरटेल के कर्मचारी होंगे और बतौर कॉलर काम करेंगें. किसी भी प्रकार की कोई छुट्टी नहीं मिलेगी, जो लोग पहले से ही मैटरनिटी लीव पर हैं उनकी जॉब नहीं रहेगी, कैब सुविधा भी अब नहीं दी जायेगी, हमारी शिफ़्ट टाइम भी बदली जाएगी. वहां के सीनियर्स ने हमसे अभद्र व्यायवहार किया और कहा, तुम लोगों को आता क्या है. इन छह सालों में तुम लोगों ने कुछ नहीं सीखा.’

वहीं महिलाओं ने तीन दिन केयरटेल कंपनी में काम करने के अपने अनुभव को बताते हुए कहा कि उनको उस जगह बहुत असहज लगा. उनका कहना है कि नारायणा का ऑफिस बहुत सुनसान जगह पर है जहां पर रात में ड्यूटी करना बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं है.

दूसरी कर्मचारी रेशमा बताती हैं, ‘तीन दिन हम सबने वहां अपना सहयोग दिया उसके बाद हुई मीटिंग में उनके सारे इरादे सामने आ गये जिसमें बहुत सी सुविधाओं को बंद करने की बात कही गयी. मीटिंग के दौरान 6 साल के हमारे काम की क्वालिटी पर भी सवाल उठाया गया. जो हेल्पलाइन आज बखूबी 6 साल से पूरी दिल्ली ही नहीं पूरे भारत के लिए काम कर रही है उसी के काम पर आज सवाल उठाए जा रहे हैं. नारायणा इलाके में बने इस दफ्तर में महिला सुरक्षा के कोई इंतजाम नही हैं.’

(फोटो साभार: फेसबुक)

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एक अन्य कर्मचारी पूजा माथुर ने बताया, ‘वहां के ऑफिस के बाथरूम में कुंडी तक नहीं थी और स्टाफ में सिर्फ पुरुष थे. फिर भी काम शुरू करने के लिए जब सीआरएम (सॉफ्टवेयर) पर लॉग इन किया तो उसमें बहुत-सी तकनीकी गड़बड़ी थीं. हम कोई भी केस सेव नहीं कर पा रहे थे. हम जब भी कॉल कर रहे थे तो वो कॉल दूसरे नंबर पर डायवर्ट हो रही थी. हमने इसकी शिकायत की तो हमसे कहा गया कि इसी पर काम करना होगा.’

उन्होंने आगे बताया वहां टॉयलेट व गार्ड जैसी सुविधा भी नहीं है, इलाका इतना सुनसान है कि रात 9 बजे के बाद किसी के लिए सुरक्षित नहीं है.

महिलाओं का कहना है कि इस हेल्पलाइन के निजीकरण से महिलाओं का डेटा भी सुरक्षित नहीं रहेगा. सविता ने बताया, ‘अब तक महिला हेल्पलाइन का कॉलिंग एरिया सचिवालय होता था जहां पर बैठकर यह सभी महिला कर्मचारी देशभर से महिलाओं की समस्याओं को सुनती थी. परंतु अब इस हेल्पलाइन को किसी प्राइवेट कंपनी को सौंप दिया गया है. इतनी संवेदनशील महिला हेल्पलाइन को कुछ प्राइवेट हाथों में सौंप दिए जाने का फैसला वास्तव में महिला सुरक्षा के खिलाफ ही दिखाई प्रतीत होता है. इससे काफी हद तक महिलाओं के डेटा का व्यापक तौर पर दुरुपयोग भी हो सकता है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘हम अभी तक कॉल उठाते ही पीड़िता को आश्वस्त कर देते थे कि हमारे और उनके बीच जो भी बात हो रही हम उसकी सुरक्षा की गारंटी लेते हैं और वो गोपनीय ही रहेगी. साथ ही दिल्ली सचिवालय से जब हम हेल्पलाइन को चलाते थे तब वहां सिर्फ़ महिलाएं ही मौजूद होती थीं. ऐसे में पीड़िता भी बेहिचक होकर अपने साथ हुए उत्पीड़न को बता पाती थीं. लेकिन इस केयरटेल कंपनी में पुरुष स्टाफ मौजूद हैं. उनकी उपस्थिति में पीड़िता की कॉल सुनने, उससे बात करने और केस के बारे में बात करने में बहुत ही असहज महसूस हो रहा था.’

साथ ही उन्होंने बताया अब तक जब वो किसी भी पुलिस थाने में फोन करती थीं तो पुलिस तुरंत कार्रवाई करती थी क्योंकि ये महिलाएं दिल्ली सचिवालय की कर्मचारी की हैसियत से कॉल करती थीं लेकिन अब उन्हें आशंका है कि केयरटेल कंपनी से किए  गए फोन का कोई भी असर नहीं होगा.

रेशमा ने बताया केयरटेल कंपनी में उनसे यह भी कहा गया कि पीड़िता से अधिक बात नहीं करनी है और कॉल को जल्द से जल्द निपटाना है.

उन्होंने कहा, ‘यह बिल्कुल मुमकिन नहीं है अगर कोई महिला बहुत हताश है तो हम उसको काउंसिलिंग का पूरा समय देते हैं. हम रोज़ लगभग 1500 कॉल उठाते हैं और हमारी टीम अपने काम की गुणवत्ता के साथ कोई समझौता नहीं करती.’

महिलाओं का कहना है बीते 26 मार्च को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाती मालीवाल को मेल भेजकर पूरी घटना की जानकारी दी गई और निजीकरण के खिलाफ अपना विरोध भी जताया गया, लेकिन सचिवालय के बाहर ही 15 दिनों से धरने पर बैठे होने के बाद भी न तो मुख्यमंत्री और न ही स्वाति मालीवाल उनसे मिलने आये हैं.

रेशमा आगे कहती हैं, ‘दिल्ली महिला आयोग से दस मिनट की दूरी पर ही हम बैठें हैं लेकिन स्वाति मालीवाल के पास हमसे बात करने का कोई समय नहीं है. स्वाति मालीवाल महिलाओं के मुद्दों पर रैली करती हैं, आंदोलन करती हैं लेकिन अपनी ही महिला कर्मचारी से मिलने का समय उनके पास नहीं है. अरविंद केजरीवाल भी इतने धरने कर चुके हैं लेकिन हमसे मिलने आने की उन्होंने ज़रूरत नहीं समझी. ‘

धरने पर बैठी महिलाओं का कहना है कि दिल्ली सचिवालय ने उन्हें पानी से मना कर दिया है. महिलाएं इस समय सचिवालय के बाहर तम्बू लगाकर धरने पर बैठी हैं और उनका कहना है कि दिल्ली सचिवालय द्वारा उन्हें पीने का पानी तक देने से इनकार कर दिया गया.

रेशमा कहती हैं, ‘हमने कदम-कदम पर महिला आयोग का साथ दिया चाहे प्रशासनिक कार्य हो या स्वाति मालीवाल का कोई आंदोलन और आज हमारे साथ ऐसा बर्ताव हो रहा है.’

इन महिलाओं के आरोपों पर जब दिल्ली महिला आयोग को संपर्क किया गया तो उन्होंने एक वरिष्ठ अधिकारी गौतम से संपर्क करने को कहा.

गौतम ने इस बारे में कहा, ‘हमें कई बार सूचना मिली कि इस हेल्पलाइन में काम ठीक से नहीं हो रहा है, कॉल उठाई नहीं जाती थी और ड्रॉप कर दी जाती थी. हमने इस संबंध में इन्हें कई बार चेताया पर कोई भी परिवर्तन देखने को नहीं मिला. हमने सीसीटीवी कैमरा भी लगवाए और पाया ये महिलाएं कॉल नहीं उठाती थीं, घंटों तक लंच करती थीं, अपने पर्सनल मोबाइल पर बात करती हैं और रात की ड्यूटी पर सो जाती थीं. सुपरवाइज़र तक इसमें शामिल हैं और इन गलतियों पर कॉलर का पक्ष लेते हुए टालमटोल कर जवाब देती थीं.’

उन्होंने आगे बताया, ‘परेशान होकर हमें यह कदम उठाना पड़ा और प्रोफेशनल हेल्पलाइन केयरटेल का सहारा लिया. केयरटेल एक ऐसी कंपनी है जो भारत सरकार की बहुत सी महत्वपूर्ण हेल्पलाइन चलाती है, जैसे नशा मुक्ति. साल 2013 में इस हेल्पलाइन 181 की शुरूआत केयरटेल ने ही की थी और स्टाफ को प्रशिक्षित भी किया था. ’

गौतम ने कहा कि महिलाएं दिल्ली महिला आयोग और केयरटेल पर झूठे आरोप लगा रही हैं. उनका कहना है कि ये महिला कर्मचारी झूठ बोल रहीं है कि उन्हें इस प्रक्रिया के बारे में नहीं बताया गया था.

वहीं केयरटेल कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी राजेश ने इन महिलाओं के आरोपों पर कहा, ‘हमारे लिए सारे कर्मचारी बराबर हैं. यहां बहुत-सी महिलाएं काम करती हैं. हमारे लिए यह अनिवार्य नहीं था कि हमें उन्हें रखना ही है फिर भी हमने इन सबको नौकरी पर रखा. अगर कोई परेशानी थी तो कम से कम हमसे बात की जा सकती है. इन लोगों न इतना संवेदनशील काम अचानक छोड़ दिया और ड्यूटी पर नहीं आयी. यह एक कॉल सेंटर है और किसी न किसी को काम करना ही है, ये नहीं तो कोई और करेगा.’

इससे पहले यह हेल्पलाइन तब ख़बरों में आई थी जब दिल्ली महिला आयोग ने साल 2016 में बनी महिला हेल्पलाइन सेवा 181, रेप क्राइसिस सेंटर, मोबाइल हेल्पलाइन सहित बाकी सभी कार्यक्रमों को बंद करने का फैसला किया था. आयोग ने हेल्पलाइन में काम करने वाले संविदाकर्मियों को दो महीने का वेतन न मिलने के कारण यह फैसला लिया था.

आयोग का कहना था कि इस कारण इन सेवाओं को जारी रखना मुश्किल हो रहा था. तब आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने सदस्य सचिव अलका दीवान पर संविदाकर्मियों का वेतन रोकने का आरोप लगाया था. उन्होंने दीवान की नियुक्ति को भी अवैध बताया था.

उस समय आयोग का कहना था कि कि बीते छह महीनों में आयोग और हेल्पलाइन का काम कई गुना बढ़ गया है और महिला हेल्पलाइन 181 पर 2.16 लाख कॉल्स को सुनते हुए लगभग बारह हज़ार शिकायतों का समाधान किया गया है.

यह भी कहा गया था कि रेप क्राइसिस सेल के वकीलों ने अदालतों में 5,733 मामलों में पीड़ितों की मदद की है. इसी तरह क्राइसिस इंटरवेंशन सेंटर के सलाहकारों ने यौन शोषण के 1,869 मामले निपटाए हैं. तब मालीवाल ने यह भी बताया था कि यह आयोग एसिड अटैक, दहेज उत्पीड़न और यौन उत्पीड़न के कामों को देखता है.