राजनीति

प्रधानमंत्री से लेकर मंत्रियों और नेताओं के ‘चौकीदार’ बन जाने के मायने क्या हैं?

बाबा साहब भीमराव आंबेडकर ने कहा था कि नाम लेबल होते हैं. लेबल से आप वस्तु के बारे में जान सकते हैं, इसीलिए सभी विज्ञापनबाज़ एक अच्छे नाम की खोज में रहते हैं. अगर नाम आकर्षक नहीं है तो जनता आपके माल को पूछेगी भी नहीं.

Prime Minister Narendra Modi gestures during "Main Bhi Chowkidar" Programme in New Delhi on March 31.(PTI Photo)

(फोटो: पीटीआई)

जो हुआ, असल में उसके होने में कोई अनहोनी नहीं थी.

मार्च की 15 तारीख़ की रात, जब चुनावों के शुरू होने में महीने भर से भी कम समय बचा था, देश के प्रधानमंत्री ने अपने ट्विटर हैंडल पर अपने नाम में चौकीदार जोड़ दिया और ऐलान किया: ‘मैं अकेला नहीं हूं…हर व्यक्ति जो भ्रष्टाचार, गंदगी, सामाजिक बुराइयों से लड़ रहा है, चौकीदार है.’

इस बात को उठाना शायद ज़रूरी नहीं है कि गांवों में अंधेरी रातों में गूंजती हुई चौकीदार की आवाज़ भरोसा नहीं जगाती, डराती है. इस बात को उठाना भी ज़रूरी नहीं है कि हिंदी फिल्में चौकीदार की पुकार का उपयोग अगले दृश्य में होने वाली चोरी या डाके का रोमांच बुनने के लिए करती हैं.

फिर ऐसी ख़बरें भी आईं, और वाजिब ही आईं कि देश में चौकीदारी का काम करने वाले लोग सचमुच कितने बेहाल हैं. वे यह काम न सिर्फ़ मजबूरी में कर रहे हैं, बल्कि उनके पास इस काम को करने के लिए ज़रूरी सुविधाएं और प्रशिक्षण भी नहीं है.

लेकिन ऐसा लगता है कि असल में चौकीदार का होना या न होना मायने नहीं रखता. जो बात मायने रखती है वह है चौकीदार का नाम. क्योंकि प्रधानमंत्री द्वारा नाम बदलने के बाद पूरे देश में भाजपा के मंत्रियों और नेताओं कार्यकर्ताओं द्वारा अपने नाम में चौकीदार जोड़ने का सिलसिला चल पड़ा.

घूसखोर मंत्री, कामचोर सांसद, महिलाओं के यौन उत्पीड़न और शोषण के आरोपी नेता, आपराधिक मामलों में संदिग्ध कार्यकर्ता… सभी एकाएक चौकीदार बन गए हैं. बेहतर यही होगा कि यह न पूछा जाए कि वे चौकीदारी किस बात की करेंगे.

लेकिन यह पूछना वाजिब है कि नाम बदलने की इस कीमियागरी में कौन सी फिटकरी और कैसी हींग लगी है.

बात 1936-37 की है. बाबासाहेब डॉ. भीम राव आंबेडकर ने एक लेख में नामों की ज़रूरत, अहमियत और उनको बदलने की पद्धति पर गंभीरता से ग़ौर किया था. शेक्सपीयर के मशहूर हवाले से अपनी असहमति पेश करते हुए उन्होंने लिखा था,

‘बदकिस्मती से नाम एक बहुत ही अहम मक़सद पूरा करते हैं. वे सामाजिक अर्थव्यवस्था में एक बड़ी भूमिका अदा करते हैं. नाम, प्रतीक होते हैं. हरेक नाम के साथ किसी एक वस्तु के बारे में कुछ निश्चित विचार और अवधारणाएं जुड़ी होती हैं. नाम लेबल होते हैं. लेबल से आप वस्तु के बारे में जान सकते हैं… इसीलिए सभी विज्ञापनबाज़ एक अच्छे नाम की खोज में रहते हैं. अगर नाम आकर्षक नहीं है तो जनता आपके माल को पूछेगी भी नहीं.’

बात तब की है जब बाबा साहेब ने धर्मांतरण का ऐलान कर दिया था और नए धर्म के विकल्पों पर ग़ौर कर रहे थे. इस लेख में वे धर्मांतरण के फैसले की आलोचनाओं का जवाब देते हैं और दिखाते हैं कि किस तरह दलित समुदाय छुआछूत और दलित होने के अभिशाप से बचने के लिए जो तरीके अपनाता रहा है, वो नाकाम रहे हैं.

नाम बदल लेना इन्हीं नाकाम तरीकों में से एक था. बाबा साहेब इसका ज़िक्र करते हैं कि कैसे दलित जातियों के लोग अपनी जातीय पहचान छुपाने के लिए ख़ुद को चोखामेला, रविदास, जाटव, आदि-द्रविड़ आदि नामों से बुलाते हैं.

इन नामों की ओट में वे सामाजिक ताने-बाने में इस तरह घुलने-मिलने की कोशिश करते हैं कि उनको अलग से, ‘अछूत’ के रूप में पहचानना नामुमकिन हो जाए. वे इसे ‘प्रोटेक्टिव डिस्कलरेशन’ का नाम देते हैं.

बाबा साहेब पाते हैं कि इसमें मुख्यत: दो समस्याएं थीं; इस तरह नामों में किया जाने वाला बदलाव, शोषण और उत्पीड़न के जातीय ढांचे को बनाए रखता है और उसे किसी भी तरह चुनौती नहीं देता.

दूसरी समस्या थी, कि ये नाम दलितों की पहचान को छुपाने में कोई मदद नहीं करते. क्योंकि जातीय समाज में, सिर्फ़ नाम बताना काफ़ी नहीं होता, यहां साफ़-साफ़ जाति भी बतानी पड़ती है.

इसकी जगह, आंबेडकर सुझाव देते हैं कि नामों को बदलने के बजाय, नए नामों की एक ऐसी व्यवस्था अपनाई जाए, जो दलितों को न सिर्फ़ एक नई पहचान दे, बल्कि उन्हें जातीय ढांचे से ही अलग कर दे.

Narendra Modi

उनके मुताबिक धर्मांतरण एक ऐसी ही पद्धति थी, जो न सिर्फ नामों और उपनामों का एक पूरा नया और पहले से बिल्कुल अलग ढांचा मुहैया कराती थी, बल्कि वह दलितों को जातीय ढांचे से अलग करने में मददगार होती.

ऐसा करने के बाद, दलितों को माहौल में छुपने के लिए अपना रंग बदलने की ज़रूरत नहीं पड़ती, बल्कि वे माहौल में अलग दिखते हुए अपनी नई पहचान स्थापित कर पाते.

यह प्रसंग विस्तार से लिखने के पीछे मक़सद यह नहीं है कि दलित समुदाय के नाम बदलने और मौजूदा सरकारी अमले के नाम बदलने की आपस में तुलना की जाए. यह संभव भी नहीं है. बल्कि यह हवाला देने का मक़सद यह था कि दिखाया जा सके कि नामों को बदलने के पीछे बाबा साहेब का नजरिया, राजनीति और पद्धति क्या थी.

भारतीय सियासत में यह एक अनोखा और शायद अपनी तरह का इकलौता पल था, जब नामों को लेकर एक सैद्धांतिक नज़रिया अपनाने की कोशिश की गई.

लोकप्रियता के आम चलन से उलट, बाबा साहेब के लिए नाम महज़ पहचान के संकेत नहीं थे, वे एक कहीं अधिक बड़े ढांचे का हिस्सा थे. इसलिए उनमें होने वाला कोई भी बदलाव एक आमूलचूल और गंभीर बदलाव से बुनियादी तौर पर जुड़ा हुआ था.

अगर नाम में कोई बदलाव होना है, तो यह लोकप्रियता या समर्थन हासिल करने के लिए नहीं होना है. ख़ुद को स्वीकार्य बनाने के लिए भी नहीं ऐसा नहीं किया जाना चाहिए. बल्कि नए नाम (या उनका पूरा ढांचा), ज़मीनी हक़ीक़त में उस बदलाव की सच्ची अभिव्यक्ति होने चाहिए.

समाज और सियासत में नामों में बदलाव का महत्व सजावटी या सांकेतिक नहीं हो सकता. क्योंकि ‘नाम मायने रखते हैं… नाम क्रांति ला सकते हैं…’ उन्होंने लिखा था.

अगर बाबा साहेब की इस कसौटी पर प्रधानमंत्री, सत्ताधारी दल के नेताओं और मंत्रियों द्वारा अपने नाम में चौकीदार जोड़ लेने को कसें तो हम क्या पाएंगे?

क्या यह रंग बदलने की गिरगिटी चाल है या हमारा समाज सियासत के नतीजे में एक ऐसे आमूलचूल बदलाव से गुज़र रहा है, जिसकी निशानदेही इन बदले हुए नामों में होती है?

ये नए नाम, क्या व्यवस्था में किसी नएपन की निशानी हैं? प्रधानमंत्री से लेकर मंत्रियों, नेताओं और कार्यकर्ताओं तक के चौकीदार बन जाने का क्या मतलब है?

अगर नामों में होने वाला यह बदलाव सचमुच में किसी ज़मीनी बदलाव की अभिव्यक्ति होता तो हम यह उम्मीद करते कि व्यवस्था इतनी बदल गई है और कारगर हो गई है कि भ्रष्टाचार की ज़रूरत और संभावना ही ख़त्म हो गई है.

सत्ता में बैठे लोग जनता और व्यापक समाज के हितों से इस तरह जुड़ गए हैं कि कोई उन्हें भ्रष्ट नहीं कर सकता. और अगर भ्रष्टाचार की नौबत आती भी है तो चौकीदारी के काम में लगे लोग इतने चौकस हैं कि भ्रष्टाचारी का बचकर निकल पाना मुमकिन नहीं है.

लेकिन हालात इसके एकदम उलट हैं. हर स्तर पर सत्ता को ग़ैरक़ानूनी कमाई के ज़रिये संपन्न और ताक़तवर बनने का एक माध्यम माना जाता है. और जो इस तरह से भारी धन जुटा सकते हैं, उनके पास अपने बचने के तरीके भी होते हैं.

जिस व्यवस्था में भ्रष्टाचार की गुंजाइश होती है, उसमें भ्रष्टाचारी के बच निकलने की गारंटी भी होती है. दोनों एक जुड़वां संभावनाएं हैं, एक का होना दूसरे की गारंटी करता है.

अगर आप यह लेख पढ़ रहे हैं तो आपको शायद इसकी मिसाल देने की ज़रूरत नहीं है कि इस देश में किस तरह भ्रष्टाचारी और घोटालेबाज़ पनपते और बचते रहे हैं.

यहां तक कि ख़ुद को चौकीदार बताने वाली सरकार के कार्यकाल में घोटालेबाज़ों ने सरकारी बैंकों को इस तरह लूटा है कि ये बड़े-बड़े बैंक डूबने के कगार पर पहुंच गए हैं.

इस तरह ज़ाहिर है कि अगर सरकार और इसके नेता सचमुच में चौकीदारी की भूमिका नहीं निभा रहे हैं, तो नामों को बदलकर वे एक मिथक खड़ा कर रहे हैं.

मिथक यह कि सरकार और सत्ताधारी दल समाज की चौकीदारी कर रहे हैं; वे इतने सतर्क हैं कि भ्रष्टाचारी बच नहीं सकते, गंदगी पैदा नहीं हो सकती, सामाजिक बुराइयां बनी नहीं रह सकतीं.

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(फोटो: पीटीआई)

लेकिन मिथक की एक ख़ासियत होती है. इसे समझने के लिए हम एक कहानी की मिसाल लेते हैं; फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘तीसरी कसम’ उर्फ मारे गए गुलफाम का हीरामन गाड़ीवान एक बैलगाड़ी चलाता है.

उसके बैल उसकी भाषा समझते हैं. वह जब उनसे कहता है कि वे बाघ तक से नहीं डरते. उन्हें बचाने के लिए हीरामन अपनी लगभग नई बैलगाड़ी को छोड़कर भाग निकलता है. और ज़रूरत पड़ने पर वह अपनी दुआली (कोड़े) से उन्हें पीटने में भी नहीं हिचकता. लेकिन वह कभी बैलों के बारे में बात नहीं करता.

वह अपनी बैलगाड़ी के बारे में भी बात नहीं करता. क्योंकि उसके नाम में लगा गाड़ीवान शब्द किसी मिथक की वजह से नहीं है. वह सचमुच का गाड़ीवान है. वह बैलों, गाड़ी, सवारियों की बातें करता है. लेकिन उनके बारे में बातें नहीं करता.

मिथक भाषा का एक ऐसा ख़ास रूप है, जिसमें विषय के बारे में इस तरह बात की जाती है कि उसके इतिहास से उसको वंचित कर दिया जाए. यह भुला दिया जाएगा कि चौकीदारी का अपना एक इतिहास है, इसकी अपनी ज़रूरतें हैं.

यह भुला दिया जाएगा कि चौकीदार के लिए तटस्थ और चौकस रहना ज़रूरी है, उसके नाकाम रहने और चोरी हो जाने पर उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए. सिर्फ़ यह याद रहेगा कि किसी का चौकीदार होना भर काफी है. इसके पीछे की ज़िम्मेदारियां और इसका इतिहास बेमानी हो जाएंगे.

मिथकों के फ्रांसीसी विशेषज्ञ रोलां बार्थ के पास जाएं तो वे कहेंगे कि चौकीदार का मिथक खड़ा करके, हमने इस शब्द को एक ‘बोलती हुई लाश’ में बदल दिया है.

यह लाश तब तक बोलेगी, जब तक चुनाव नहीं हो जाते. चाहे इसकी बात पर कोई भरोसा करे या न करे, चाहे इसका खोखलापन उजागर ही क्यों न हो जाए.

मिथकों की बुनियादी भूमिका होती है कि वे फौरन एक छाप छोड़ते हैं. एक झटके में वे आप तक अपना संदेश पहुंचा देते हैं. इसके बाद उनका क्या होता है, यह अहम नहीं है.

इस तरह चौकीदार शब्द ने अपना काम कर दिया है. लोगों के बीच में यह नाम सत्ताधारी दल और सरकार के साथ जुड़ गया है. भले ही यह बात साबित होती रहे कि यह एक झांसा था.

आप कहेंगे, क्या सियासत इस तरह होती है? क्या सभी दल अपनी क़ामयाबियों और अपने वादों को लेकर इसी तरह के मिथक खड़े करते हैं?

इसमें कोई संदेह नहीं है कि जिस तरह की सियासत हम देख रहे हैं, उनमें अधिकतर काम मिथकों के ज़रिये चलाया जाता है. इसमें वादे साकार नहीं किए जाते, सच्चाई के रूप में पेश किए जाते हैं जो आगे चलकर मिथक बना दी जाती है. इस तरह सियासत की भूमिका महज़ भाषा का खेल खेलने तक सिमट जाती है.

ज़ाहिर है, इससे ज़मीनी तौर पर कुछ भी नहीं बदलता. इसलिए कि (जैसी फ्रांसीसी दार्शनिक अलां बादिऊ की समझ कहती हैं) सचमुच के बदलाव लाने वाली सियासत की पहचान यह है कि वह बदलाव के वादे नहीं करती, अपने कामकाज से उस बदलाव को अमल में लाती है. वह रंग नहीं बदलती, वह बदलाव के रंग लेकर आती है.