भारत

मकराना के मार्बल की चमक के बीच तबाह होती मज़दूरों की ज़िंदगी

ग्राउंड रिपोर्ट: राजस्थान में नागौर ज़िले के मकराना की मार्बल खदानों में काम करने वाले मज़दूरों की स्थिति बहुत दयनीय है. हर दिन हज़ारों मज़दूर अपनी जान जोखिम में डालकर 250-400 फीट नीचे मार्बल की खदानों में उतरने को मजबूर हैं.

मकराना की मार्बल खानों में लोहे की ट्राली से उतरते मज़दूर. (फोटो: माधव शर्मा/द वायर)

मकराना की मार्बल खानों में लोहे की ट्राली से उतरते मज़दूर. (फोटो: माधव शर्मा/द वायर)

जयपुर: ये साल 1631 के जून महीने के एक गर्म दिन की सात तारीख़ थी और जगह थी बुरहानपुर. इसी दिन हिंदुस्तान के बादशाह शाहजहां की बेगम अर्जुमंद बानो यानी मुमताज़ अपने 14वें बच्चे को जन्म देते हुए ज़न्नत को रुख़सत हो गईं.

बीवी की मौत से टूट चुका बादशाह उसे बुरहानपुर में ही दफ़न कर अकबराबाद यानी आज के आगरा आ गया. तारीख़ें बढ़ती गईं और 1631 की गर्म जून से सर्द नवंबर का महीना आया.

शाहजहां ने तय किया कि अकबराबाद में यमुना किनारे एक इमारत बनाई जाए जिसमें उसके महबूब की अस्थियां रखी जा सकें.

…और फिर शुरू हुआ दुनिया के सबसे ख़ूबसूरत मक़बरे का निर्माण. दुनियाभर का प्रसिद्ध मार्बल और पत्थर आगरा में नदी किनारे जमा होने लगा. राजस्थान में जोधपुर रियासत के मकराना गांव से टनों मार्बल लेकर निकले सैकड़ों हाथियों का रैला भी इसमें शामिल था.

काम शुरू हुआ और करीब 20 हज़ार मज़दूरों ने 1648 में लगभग 52 लाख रुपये की लागत से मुमताज़ के इंतकाल के तकरीबन 17 साल बाद दुनिया का सबसे महंगा और ख़ूबसूरत मक़बरा ताजमहल बनाकर तैयार कर दिया.

इतिहास से वापस 21वीं सदी में आ जाते हैं. महीना अप्रैल का है, तारीख़ है 30 और साल 2018. ताजमहल के लिए 387 साल पहले जिस मकराना की पहाड़ कुआं माइंस से मार्बल पहुंचाया गया वो अब राजस्थान राज्य के नागौर ज़िले का एक कस्बा बन चुका है.

क़रीब 250 फीट गहरी मार्बल की एक खान में रोज़ की तरह 32 साल का मुकेश कुमार मार्बल का एक बड़ा ब्लॉक तोड़ रहा है कि अचानक तेज आवाज़ के साथ ब्लॉक दरक जाता है और 5 से 6 टन वज़नी मार्बल के ब्लॉक के नीच दबकर मुकेश की मौत हो जाती है.

मुकेश साल 2018 में मकराना की मार्बल खानों में दबकर मारे गए 11 मज़दूरों में से एक था. ये 11 वे मज़दूर हैं जिनके मरने की रिपोर्ट मकराना पुलिस थाने तक आई है. एक साल में 20-25 मज़दूरों की मौत इसी तरह खान खिसकने या खानों के अंदर अन्य वजहों से हो जाती है.

ज़्यादातर मौत खान दरकने और उसके मलबे में दबने से होती हैं जो बहुत कम संख्या में ही रिपोर्ट हो पाती हैं क्योंकि खान मालिक ग़रीब मज़दूरों को समझौता करने के लिए मुआवज़े के रूप में 17-18 लाख रुपये की मोटी रकम देते हैं.

इतनी बड़ी रकम पाकर मज़दूर और उनके परिजन खान मालिकों की लापरवाही और लालच का शिकार बनकर भी जान गंवाने के बाद भी पुलिस थाने नहीं जा पाते.

मकराना की मार्बल खदानों में उतरते मज़दूर. (फोटो: माधव शर्मा/द वायर)

मकराना की मार्बल खदानों में उतरते मज़दूर. (फोटो: माधव शर्मा/द वायर)

इतिहासकार और प्रोफेसर रामनाथ ने जून 1969 में ‘द मार्ग’ पत्रिका में लिखा है कि मुमताज़ की मौत से आहत शाहजहां ने दो साल तक न तो शाही लिबास पहना और न ही किसी जलसे में शिरकत की.

लेकिन मुकेश न तो मुमताज़ जैसे किसी के अज़ीज़ थे और न ही किसी शाही खानदान से उसका ताल्लुक था इसीलिए उसकी मौत के कुछ घंटों बाद ही मकराना के मार्बल खदानों में सब सामान्य हो गया.

मज़दूर फिर से पहले की तरह काम करने लगे. परिजनों ने कुछ दिन शोक मनाया लेकिन पेट भरने के लिए उन्हें फिर से मज़दूरी शुरू करनी थी. मुकेश मकराना से पांच किमी. दूर गुनावती गांव में रहता था.

वह अपने पीछे परिवार में 5 साल दो जुड़वां बेटे, मां और बीवी छोड़कर गया है. 50 साल की मां लिछमा देवी दिहाड़ी मज़दूरी कर अब इस परिवार का पेट पाल रही हैं.

मां ने मुआव़जे के रूप में मिले 18 लाख रुपये में से 15 लाख रुपये का क़र्ज़ चुका दिया जिसे चुकाने की कोशिश मुकेश कई सालों से सैकड़ों फीट गहरी मार्बल खान में उतर कर रहा था.

मज़दूर खान में रस्सी के सहारे उतरते हैं और दिहाड़ी पाते हैं 400 रुपये

मकराना में हज़ारों ज़िंदगियां रोज़ 250-400 फीट नीचे उतरती हैं और अगर सही सलामत ऊपर लौटते हैं तो बदले में महज़ 400 रुपये मज़दूरी मिलती है.

साल में 15-20 घटनाएं खान ढहने की होती हैं जिनमें 25-30 मज़दूरों की मौत होती है. मकराना और आसपास के इलाकों से यहां 50 हज़ार से ज़्यादा मज़दूर काम करते हैं, लेकिन 90 प्रतिशत मज़दूरों का बीमा तक नहीं है. मज़दूर इतनी गहरी खान में लोहे की सीढ़ी, रस्सी के सहारे उतरते हैं या फिर उन्हें मार्बल ढोने वाली ट्रोली में बिठाकर नीचे उतार दिया जाता है.

चूंकि मकराना की मार्बल खानें 60 डिग्री के कोण पर काटी जाती हैं इसीलिए ट्रोली पत्थर से टकराते हुए नीचे उतरती है. यहां मज़दूरों को खान मालिकों की ओर से सुरक्षा का कोई साधन भी नहीं दिया जाता.

इतनी गहराई में उतरने के लिए नियमानुसार बेल्ट, हेलमेट, ग्लव्स, प्रोटेक्टिव ग्लासेज और अच्छे जूते दिए जाने चाहिए लेकिन जितनी महंगी यहां मार्बल है उससे कहीं ज़्यादा सस्ती मज़दूरों की ज़िंदगी है.

दिखाने के लिए खान में लोहे की सीढ़ियां लगी हैं लेकिन वे कुछ फीट नीचे जाकर ख़त्म हो जाती हैं और जो लगी हुई हैं वे भी कब धोखा दे जाएं कोई नहीं जानता.

मज़दूर सिर्फ एक रस्सी के सहारे 250 से 400 फीट के पाताल जैसी गहरी खानों में रोज़ाना उतरते हैं. खान के अंदर भी मज़दूर बिना किसी ख़ास सुरक्षा के मार्बल के ब्लॉक तोड़ने के लिए बारूद का इस्तेमाल करते हैं.

मकराना में खनन क्षेत्र में मज़दूरों के लिए न तो शुद्ध पीने के पानी की व्यवस्था है और न ही शौचालय की. हल्की चोट लगने पर प्राथमिक स्वास्थ्य की भी कोई व्यवस्था खनन स्थल पर नहीं है.

इसके अलावा यहां ज़्यादातर खानें उत्तर से दक्षिण दिशा में कई किलोमीटर तक फैली हैं इसीलिए बारिश के दिनों में इनमें पानी भर जाता है और हज़ारों मज़दूर बेरोज़गार हो जाते हैं.

मार्बल मज़दूर यूनियन, मकराना के पवन भार्गव कहते हैं, ‘हम कई दशकों से मज़दूरों के हितों की बात कर रहे हैं लेकिन कहीं कोई सुनवाई ही नहीं होती. 20-25 मज़दूरों की मौत इसी तरह खान मालिकों और सरकारी बदइंतज़ामी की वजह से होती है. आज भी हमारी 21 फाइलें राजस्थान हाइकोर्ट में हैं जिनमें मज़दूरी से लेकर मुआवज़ा नहीं मिलने के केस हैं. कई बार यूनियन ने खान मालिकों, श्रम और खान विभाग के साथ मज़दूरों के हितों को लेकर मीटिंग की हैं लेकिन कुछ दिन बाद सब पुराने ढर्रे पर आ जाता है.’

मकराना की मार्बल खदान. (फोटो: माधव शर्मा/द वायर)

मकराना की मार्बल खदान. (फोटो: माधव शर्मा/द वायर)

भार्गव आगे कहते हैं, ‘मकराना के मार्बल व्यवसाय का अपना एक इतिहास है लेकिन जो इतिहास मज़दूरों के शोषण और दुर्दशा को लेकर अब बन रहा है उसे कोई दर्ज नहीं कर रहा. यह कितने दुख की बात है कि जब ताजमहल के लिए मकराना से मार्बल सप्लाई हो रहा था तब मज़दूरों ने छेनी-हथोड़े से ही टनों मार्बल तोड़ कर वहां पहुंचा दिया लेकिन आज इतनी टेक्नोलॉजी होने के बाद भी मज़दूर खानों में दब कर ही मर रहे हैं.’

वे कहते हैं, ‘मकराना के खनन उद्योग में 50 हज़ार से ज़्यादा मज़दूर काम कर रहे हैं और इनमें से 90 प्रतिशत से अधिक मज़दूरों का बीमा नहीं है और ना ही कोई नियम यहां लागू होता है. श्रम विभाग, खान विभाग और खान मालिकों की मिलीभगत इस कदर है कि हज़ारों मज़दूर जो इस व्यवसाय की पहली इकाई हैं उनकी समस्याएं भी नहीं सुनी जा रही.’

भार्गव बताते हैं, ‘खानों में काम करने वाले मज़दूरों के पास अपने मज़दूर होने का प्रमाण तक भी नहीं है. इसीलिए मज़दूरी नहीं मिलने जैसी शिकायतें यहां सबसे ज़्यादा आती हैं और जो रजिस्टर्ड मज़दूर योजनाओं का लाभ लेने के लिए आवेदन करते हैं, उनकी सुनवाई नहीं होती. खानों में कटाई के लिए वैज्ञानिक तरीकों का भी अभाव है इसीलिए खान खिसकने की घटनाएं यहां आम हैं.’

मकराना में 4 साल में 1075 मज़दूरों ने ही किया योजनाओं में आवेदन, 690 पेंडिंग

भार्गव की बात की तस्दीक राजस्थान श्रम विभाग के तहत आने वाले भवन एवं अन्य संनिर्माण श्रमिक कल्याण मंडल के आंकड़े करते हैं.

नागौर ज़िले के मकराना ब्लॉक में कुल 12,343 मज़दूर ही रजिस्टर्ड हैं जबकि हक़ीक़त में यहां 50 हज़ार से ज़्यादा मज़दूर काम करते हैं. इसका मतलब यह है कि यहां हज़ारों की संख्या में मज़दूर असंगठित हैं.

भवन एवं अन्य संनिर्माण श्रमिक कल्याण मंडल के आंकड़ों के मुताबिक, मकराना विधानसभा क्षेत्र में मार्च 2015 से 16 मार्च 2019 तक विभाग द्वारा चलाई जा रही योजनाओं का लाभ लेने के लिए सिर्फ 1075 मज़दूरों ने ही आवेदन किया है और इनमें से 690 आवेदन विभाग की तरफ से पेंडिंग पड़े हुए हैं.

इसी दौरान रजिस्ट्रेशन के लिए 6,360 मज़दूरों ने आवेदन किया इसमें से सिर्फ़ 3,489 आवेदन ही अप्रूव हुए, विभाग में 16 मार्च तक 1683 आवेदन पेंडिंग पड़े हैं. राजस्थान में भवन एवं अन्य संनिर्माण श्रमिक कल्याण मंडल में 23 लाख मज़दूर रजिस्टर्ड हैं.

मकराना की मार्बल खदानों में मज़दूरों की स्थिति पर भारतीय जनता पार्टी से स्थानीय विधायक रूपाराम कहते हैं, ‘मज़दूर मकराना में हों या पूरे देश में, सब जगह एक ही स्थिति में हैं. यहां की खानों की तिरछी कटाई होती है इसीलिए जब कभी दुर्घटना होती हैं तो मलबा हटाने और लाशें निकालने में भी कई दिन यहां तक कि महीनों लग जाते हैं.’

उन्होंने कहा, ‘मेरे अकेले के प्रयास से कुछ नहीं होगा, ये एक सम्मिलित ज़िम्मेदारी है जिसे खान मालिकों को भी समझना होगा लेकिन यहां कोई ज़िम्मेदारी लेना ही नहीं चाहता. न सरकार और न ही खान मालिक.’

रूपाराम आगे कहते हैं, ‘सौ बातों की एक बात है जब तक आदमी ख़ुद ईमानदार और ज़िम्मेदार नहीं बनेगा तब तक यूं ही लुटते रहेंगे, गरीब मरते रहेंगे और बेईमान मौज करते रहेंगे.’

रेखाराम, जिनकी खान में एक चिंगारी ने आंखें छीन लीं

मकराना से 16 किमी. दूर किनसरिया गांव के रहने वाले दलित रेखाराम (55) संवत 2044 से मज़दूरी करने लगे थे यानी साल 1988 से. 2005 में एक दिन रेखाराम करीब 200 फीट गहरी खान उतरे और इसके बाद वे अपनी आंखों से सूरज उगता नहीं देख सके हैं.

रेखाराम. (फोटो: माधव शर्मा/द वायर)

रेखाराम. (फोटो: माधव शर्मा/द वायर)

रेखाराम बताते हैं कि उस दिन मार्बल ब्लॉक तोड़ने के लिए ब्लॉक में किए छेद में 500 ग्राम बारूद भर रहा था. बारूद को अंदर घुसाने के लिए लोहे की रॉड से दबा रहा था कि एक चिंगारी निकली और ब्लास्ट हो गया. हादसे में मेरी दोनों आंखों की रोशनी चली गई और शरीर के कई हिस्से जल गए.

रेखाराम कहते हैं, ‘मेरे काम की वजह से आए ज़ख़्म तो समय के साथ भर गए लेकिन खान मालिकों की असंवेदनशीलता ने उससे भी गहरी चोट पहुंचाई. मैंने इलाज के लिए सालों तक अजमेर के चक्कर लगाए और इलाज का ख़र्च भी ख़ुद उठाया. मेरे खान मालिक ने उस वक़्त मुआवज़े के तौर पर मुझे एक लाख रुपये देकर अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कर ली जबकि इलाज में इससे ज़्यादा ही ख़र्च हुआ था.’

रेखाराम अब मनरेगा में दिव्यांग कोटे से मज़दूर हैं और नरेगा में छोटे-मोटे काम करके अपना गुज़ारा कर रहे हैं. परिवार में एक बेटा और बेटी है. बेटी की शादी कर दी और बेटा भवन निर्माण क्षेत्र में मज़दूरी करता है. रेखाराम ने अपने बेटे को मकराना की मार्बल खानों में काम करने नहीं भेजा.

छह साल में 25 मौतें ही रजिस्टर हुईं

मकराना पुलिस थाने में मार्बल खदानों में काम के दौरान हुई मौतें कम संख्या में दर्ज होती हैं. वजह मौत के बाद परिजनों और खान मालिकों का तुरंत समझौता होना ही है.

मकराना पुलिस थाने से मिले आंकड़ों के अनुसार, 2013 और 2014 में आठ, 2015 में दो, 2016 में तीन, 2017 में दो और 2018 में 11 मज़दूरों की मौत खानों में हुई है.

पुलिस के अनुसार, 2019 में खानों में किसी मज़दूर की मौत की सूचना नहीं आई है जबकि मकराना से 20 किमी दूर निमड़ी गांव के सवाई राम (35) 19 फरवरी को खान में काम के दौरान ही मौत हो गई.

खान मालिकों ने करीब 18 लाख रुपए परिवार को मुआवज़ा दिया और थाने में इस मामले की कोई शिकायत तक दर्ज नहीं हुई.

सवाई राम के 13 साल का एक बेटा और 10 साल की एक बेटी है. सवाई करीब 15 बरस की उम्र से खान मज़दूर था. सवाई राम एक उदाहरण है साल में ऐसे कितने ही मामलों में थाने में कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई जाती. 19 फरवरी को ही दो अन्य मज़दूरों की मौत भी खदान में काम करते हुए हुई थी.

पवन भार्गव के मुताबिक जितनी मौत 2013 से थाने में दिखाई गई हैं उतनी तो यहां एक साल में ही हो जाती हैं. केस दर्ज नहीं होने से खान मालिकों की लापरवाही उजागर नहीं हो पाती.

महिलाओं को पुरुष मज़दूरों से कम मज़दूरी

मकराना में खानों के बाहर काम करने वाली महिला मज़दूरों की स्थिति भी काफी चिंताजनक है. अक्सर महिलाओं को खान से निकलने वाले छोटे पत्थरों को तोड़ने का काम दिया जाता है. बाकी मज़दूरों की तरह इनके भी काम के घंटे तय नहीं हैं जबकि मज़दूरी पुरुष मज़दूर के मुक़ाबले कम मिलती है.

पुरुष मज़दूर को जहां पत्थर तोड़ने के 300-350 रुपये दिहाड़ी मिलती है वहीं, स्वस्थ महिला मज़दूर को 200-250 रुपये ही मज़दूरी दी जाती है.

19 साल की रामोड़ी की मज़दूरी का ये पहला ही दिन है. इसके साथ में राम अवतार (40), गरू (17) और शंकर (24) भी काम कर रहे हैं लेकिन इन तीनों को शाम को 300 रुपये मज़दूरी दी गई और रामोड़ी को सिर्फ 250 रुपये ही मज़दूरी मिली.

कम मज़दूरी देने के पीछे तर्क ये है कि महिलाओं में पुरुषों की तुलना में श्रम शक्ति कम होती है जबकि श्रम कानूनों के मुताबिक ऐसा नहीं किया जा सकता.

खान विभाग मकराना में माइंस इंजीनियर पीके खत्री सभी समस्याओं को स्वीकारते हैं, लेकिन इनकी वजह भी गिनवाते हैं.

मकराना के मज़दूर रामोड़ी, राम अवतार, गरू और शंकर (बाएं से दाएं). (फोटो: माधव शर्मा/द वायर)

मकराना के मज़दूर रामोड़ी, राम अवतार, गरू और शंकर (बाएं से दाएं). (फोटो: माधव शर्मा/द वायर)

खत्री कहते हैं, ‘समस्याएं तो बहुत हैं और हम अपने स्तर पर उन्हें दूर करने की कोशिश भी करते हैं. ऐसा नहीं है कि खान मालिकों के पास मज़दूरों की सुरक्षा के उपकरण नहीं हैं लेकिन जागरूकता की कमी के कारण मज़दूर जूते-बेल्ट पहनते नहीं हैं. अगर इन्हें जागरूक किया जाए तो इस तरह की घटनाओं में कमी लाई जा सकती है. हालांकि मकराना में मैंने मार्च में ही जॉइनिंग ली है इसीलिए अगली बार जब भी निरीक्षण के लिए जाऊंगा इन सभी बिंदुओं पर विशेष तौर से ध्यान दूंगा.’

खत्री आगे कहते हैं, ‘यहां खानों की लंबाई-चौड़ाई के लाइसेंस दिए जाते हैं लेकिन गहराई को लेकर कोई नियम नहीं हैं. ज़्यादा गहराई में अच्छी किस्म का मार्बल मिलता है इसीलिए यहां आमतौर पर खानें 250-300 फीट गहरी हैं. मेरी कोशिश रहेगी कि यहां खनन का सारा काम नियमानुसार हो और सुरक्षित हो.’

मकराना संग-ए-मरमर व्यापार मंडल के संरक्षक अब्दुल अज़ीज़ गहलोत इस सब का दोष मज़दूरों के ऊपर डालते हुए कहते हैं, ‘हम लोग मज़दूरों को सारी चीज़ें उपलब्ध कराते हैं लेकिन मज़दूर पहनते नहीं हैं.’

अज़ीज मकराना मार्बल व्यवसाय के बारे में तफ़्सील से जानकारी देते हैं लेकिन जैसे ही मज़दूरों की बात आती है वे कहते हैं, इसे आप ‘हाईलाइट’ मत कीजिएगा.

खैर! इतिहास में एक बार फिर लौटते हैं. मुमताज़ की सबसे बड़े ओहदे पर नौकरानी थी सती-उन-निस्सा. बेग़म की मौत के करीब एक साल बाद ही सती-उन-निस्सा का भी इंतकाल हो गया.

लेखक जादूनाथ सरकार अपनी किताब ‘स्टडीज़ इन मुगल इंडिया’ में लिखते हैं, ‘जब बादशाह को अगले दिन (24 जनवरी, 1932) को सती-उन-निस्सा की मौत की ख़बर लगी तो वो बहुत दुखी हुआ. शाहजहां ने ससम्मान उसे दफ़नाने के आदेश दिए. ताजमहल के पास ही सती-उन-निसा को दफ़नाया गया और उस समय उसकी अंतिम क्रिया में 10 हजार रुपए खर्च किए. जिस जगह सती-उन-निस्सा को दफ़नाया गया वहां सरकारी ख़र्चे पर 30 हज़ार रुपये की लागत से मकबरा बनाया गया.’

सबा अफ़गानी का शेर है ‘पत्थर तराश कर न बना ताज इक नया, फ़नकार की जहान में कटती हैं उंगलियां’ ये बात उस मिथ्या से निकलकर आती हैं कि ताजमहल के पूरा होने का बाद शाहजहां ने बनाने वालों के हाथ कटवा दिए थे. ये ग़लत है.

शाहजहां मोहब्बत की निशानी बनाने वालों के साथ ऐसा क्यूं करता? उसने तो मुमताज़ महल की बांदी सती-उन-निस्सा को मरने के बाद बड़ी इज़्ज़त के साथ ताजमहल के नज़दीक ही दफ़नाया था.

पर विडंबना देखिये, ताज के लिए मकराना की खदानों से पत्थर निकालकर और उसे लकड़ी के पहियों से बनी हाथी गाड़ियों से आगरा भेजने वालों के वंशज आज भी उन खदानों में यूं ही मर रहे हैं. उन मज़दूरों के ‘शाहजहां’ यानी उनके मालिक उनके ऐसे ही ही मर जाने के लिए रोज़ उन्हीं खदानों में उतार रहे हैं.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)