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लोकसभा चुनाव में बिहार में सारे मुद्दे जातीय समीकरण के आगे ढेर

ग्राउंड रिपोर्ट: बिहार में पहले चरण के चार संसदीय क्षेत्रों में चुनाव प्रचार में जातीय समीकरण सारे समीकरणों पर हावी है. चुनाव में न सर्जिकल स्ट्राइक, न पुलवामा और न ही कांग्रेस के 72 हजार (न्याय) की चर्चा है. ओम गौड़ की रिपोर्ट.

नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव, सुशील मोदी और जीतनराम मांझी. (फोटो: पीटीआई)

नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव, सुशील मोदी और जीतनराम मांझी. (फोटो: पीटीआई)

बिहार में पहले चरण के चार संसदीय क्षेत्रों में चुनाव प्रचार में जातीय समीकरण सिर चढ़कर बोल रहा है. यहां न कोई चुनावी मुद्दा है और न ही कहीं विकास की चर्चा. चुनावी हार-जीत के कयास भी जातिगत दम देखकर हो रहे हैं.

चुनाव में न कोई लहर दिखती है न ही कोई उमंग-उत्साह. दो दिन बाद मतदान है लेकिन माहौल नजर नहीं आता. सतारूढ़ दल के प्रत्याशी विकास का मुद्दा नहीं उठाएं, यह बात तो समझ में आती है लेकिन जातीय समीकरण के आगे विपक्ष के लिए भी विकास इस चुनाव में मुद्दा नहीं है.

पहले चरण में गया, औरंगाबाद, नवादा और जमुई में मतदान है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जमुई और गया में सभाएं कर चुके हैं. राहुल गांधी ने मंगलवार को गया में रैली की.

पहली बार लालू मैदान से बाहर:

40 साल में पहली बार लालू प्रसाद यादव मैदान से बाहर हैं. एनडीए के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सबसे बड़ा चेहरा हैं. महागठबंधन के तेजस्वी यादव की हर क्षेत्र में जातिगत आधार पर डिमांड है लेकिन बड़े भाई तेजप्रताप यादव की बगावत से वे हैरान-परेशान हैं.

चारों सीटों पर जातीय समीकरण इस कदर है कि चुनाव साइलेंट मोड पर है. यहां न सर्जिकल स्ट्राइक है न पुलवामा, न ही कांग्रेस के 72 हजार (न्याय) का जिक्र. चारों सीटों के आंकलन के बाद स्थिति एनडीए और महागठबंधन के बीच कड़े मुकाबले की है एनडीए का अपरहैंड (बढ़त) है.

पहले चरण में कांग्रेस किसी सीट से नहीं लड़ रही है तो भाजपा सिर्फ औरंगाबाद से मैदान में है. बाकी सीटों से समर्थित पार्टियां मैदान में हैं. भाजपा ने परंपरागत सीट गया सहयोगी दल जदयू के लिए छोड़ी है. विजय मांझी चुनाव मैदान में हैं.

महागठबंधन से पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी डटे हैं. संसदीय क्षेत्र में 3 लाख मांझी, दो लाख मुस्लिम और इतने ही यादव वोट हैं. गया सीट भाजपा का गढ़ रही है.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसे प्रतिष्ठा की सीट मान रखा है. क्योंकि मुकाबला पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी से है. जातिगत जोड़-तोड़ से यहां रोज राजनीतिक हालात बन-बिगड़ रहे हैं.

जमुई में मुकाबला बेहद रोचक:

जमुई से चिराग पासवान फिर से लोजपा से किस्मत आजमा रहे हैं. उन्हें उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोसपा के भूदेव चौधरी कड़ी टक्कर दे रहे हैं. पिछली बार चिराग बड़े मार्जिन से जीते थे. चौधरी सर्वाधिक वोटरों वाले महादलित समाज से हैं.

कड़े मुकाबले में पिछड़े वोटरों पर सबकी नजर है. नरेंद्र मोदी सभा कर चुके हैं. उपेंद्र कुशवाहा ने इसे प्रतिष्ठा की सीट बना रखा है. मुकाबला रोचक है. चिराग पासवान रेस में आगे हैं.

नवादा में भाजपाई नाखुश:

नवादा सीट भाजपा ने लोजपा के लिए छोड़ी है. लोजपा को सीट दिए जाने से भाजपाई नाखुश हैं. भाजपा के इस गढ़ में लोजपा ने भूमिहार चंदन सिंह को प्रत्याशी बनाया है जो बाहुबली पूर्व सांसद सूरजभान के भाई हैं, तो राजद ने भी इनके मुकाबले जेल में बंद बाहुबली पूर्व विधायक राजवल्लभ यादव की पत्नी विभा देवी को उतारा है.

पिछली बार राजवल्लभ यादव को भाजपा के गिरिराज सिंह ने हराया था. परंपरागत सीट लोजपा को देने से भाजपा कार्यकर्ताओं की नाराजगी बड़ा मुद्दा है तो आरजेडी को यहां जातिगत वोटों से उम्मीद है. मुकाबला पूरी तरह जातीय समीकरणी मैरिट पर होना है.

मुद्दों के नाम पर जातीय समीकरण के जयकारे:

राजपूत बाहुल्य औरंगाबाद सीट से भाजपा ने मौजूदा सांसद सुशील सिंह को मैदान में उतारा है. सुशील पिछले दो चुनाव से लगातार यहां से जीत रहे हैं. कांग्रेस ने इस बार यह सीट सहयोगी दल जीतनराम मांझी की पार्टी ‘हम’ के लिए छोड़ दी है, जिसने उपेंद्र प्रसाद को प्रत्याशी बनाया है.

कांग्रेस के सीट छोड़ने से कार्यकर्ता अभी खुलकर हम प्रत्याशी के समर्थन में नहीं उतरे हैं. दोनों ही प्रत्याशी जातिगत बलबूते पर मैदान में हैं. यहां सभाएं भी जातिगत मंचों से हो रही हैं.

यहां मुद्दों के नामपर जातीय समीकरण के जयकारे सुनाई पड़ते हैं. मुकाबला कड़ा है लेकिन मैदान में राजपूत बाहुल्य इस सीट से इस बार फिर सुशील बढ़त लेते दिखाई पड़ रहे हैं.

न चेहरा, न चरित्र…जाति पर मिले टिकट:

बिहार की पहले चरण की चारों सीटों पर जातीय समीकरण में सारे मुद्दे छुप गए हैं. पार्टियों ने टिकट बंटवारे में उम्मीदवारों का चेेहरा देखा न चरित्र. बस जातीय समीकरण के सहारे टिकट बांटे गए.

इस बार मुद्दा क्या है- पूछने पर मतदाता कहते हैं- कुशवाहा व मांझी वोट भाजपा से चले गए और महादलितों के वोट भाजपा के साथ हैं.

हर उम्मीदवार के पास जातिगत वोटरों को लुभाने के फॉर्मूले हैं और जोड़-तोड़ के साधन. झंडे-बैनर न लगाकर लोग अपनी पहचान छुपाने का भी पूरा जतन करते हैं.

(दैनिक भास्कर से विशेष अनुबंध के तहत प्रकाशित)