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अयोध्या विवाद: केंद्र की भूमि अधिग्रहण की अर्ज़ी के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट पहुंचा निर्मोही अखाड़ा

केंद्र सरकार ने अपनी याचिका में विवादित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद स्थान के आसपास 67.390 एकड़ ग़ैर-विवादित अधिग्रहित ज़मीन मूल मालिकों को लौटाने की अपील की थी.

सुप्रीम कोर्ट (फोटो: पीटीआई)

सुप्रीम कोर्ट (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली : राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद मामले में निर्मोही अखाड़ा ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में एक और याचिका दाखिल की. इस याचिका में केंद्र सरकार की अयोध्या में अधिग्रहित की गई अतिरिक्त जमीन को उसके मूल मालिकों को वापस देने की अर्जी का विरोध किया है.

एनडीटीवी खबर के मुताबिक, निर्मोही अखाड़ा ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट को पहले भूमि विवाद का फैसला करना चाहिए. केंद्र के जमीन अधिग्रहण करने से निर्मोही अखाड़ा द्वारा संचालित कई मंदिर नष्ट हो गए. ऐसे में केंद्र को ये जमीन किसी को भी वापस करने के लिए नहीं दी जा सकती.

निर्मोही अखाड़ा ने ये भी कहा है कि रामजन्म भूमि न्यास को अयोध्या में बहुमत की जमीन नहीं दी जा सकती.

निर्मोही अखाड़ा द्वारा ये याचिका केंद्र सरकार की जनवरी में दाखिल याचिका के खिलाफ दायर की है, जिसमें केंद्र द्वारा विवादित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद स्थान के आसपास 67.390 एकड़ ‘अविवादित’ अधिग्रहीत भूमि को मूल मालिकों को लौटाने की अपील की गई है.

केंद्र सरकार ने अपनी अर्जी याचिका में कहा है कि उसने रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद की 2.77 एकड़ विवादित जमीन के आसपास 67 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया था. जबकि जमीन का विवाद सिर्फ 0.313 एक़ड़ का है. ऐसे में अविवादित जमीन को इसके मूल मालिकों को वापस किया जाना चाहिए.

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की अर्जी पर सुनवाई नहीं की है.

निर्मोही अखाड़े ने अपनी नई अर्जी में केंद्र की याचिका का विरोध किया है, जिसमें उसने सुप्रीम कोर्ट के 2003 के फैसले में संशोधन की अपील की है.

2003 के फैसले में अयोध्या में विवादित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद स्थल के आसपास 67.390 एकड़ ‘अविवादित’ अधिग्रहीत जमीन को मूल मालिकों को लौटाने की अनुमति दी गई है.

याचिका में कहा गया है कि केंद्र ने राम जन्मभूमि न्यास को अधिग्रहीत भूमि लौटाने का प्रस्ताव दिया है और अधिग्रहीत जमीन पर कई मंदिर हैं. अगर जमीन किसी एक पक्ष को दी गई तो इससे उनके अधिकार प्रभावित होंगे.

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में इस भूमि विवाद का मैत्रीपूर्ण हल निकालने के लिए मध्यस्थतों को नियुक्त किया था.

गौरतलब है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने 30 सितंबर, 2010 को फैसला दिया था कि राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद स्थल पर 2.77 एकड़ विवादित भूमि तीन बराबर हिस्सों में बांटी जाएगी और उसे निर्मोही अखाड़ा, सुन्नी वक्फ बोर्ड और रामलला को दिया जाएगा.

इस फैसले के खिलाफ दायर 14 अपील पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता के माध्यम से विवाद सुलझाने की संभावना तलाशने का सुझाव दिया था.

उसके बाद 8 मार्च, 2019 को अदालत ने  इस मामले को सुलझाने के लिए तीन सदस्यीय मध्यस्थता पैनल को सौंप दिया. उस पैनल की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज एफएम खलीफुल्ला कर रहे हैं.  इस समिति में श्री श्री रविशंकर और वरिष्ठ वकील श्री राम पंचू भी शामिल हैं.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)