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सभी राजनीतिक दलों को आरटीआई क़ानून को बचाने का संकल्प लेना चाहिए

केंद्र और राज्यों में सूचना आयोग स्वतंत्र होने चाहिए. रीढ़विहीन बाबुओं को यह अनुमति नहीं दी जानी चाहिए कि वे आयोग को भी रीढ़विहीन बना दें. लोकसभा चुनाव में उतर रहे राजनीतिक दलों को केंद्रीय सूचना आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित करनी चाहिए.

Right to Information. Illustration-The Wire

प्रतीकात्मक फोटो: द वायर

मैं सभी राजनीतिक दलों से कहता रहा हूं कि वे वोट मांगने से पहले यह वादा करें कि सत्ता में आने के बाद वे सूचना के अधिकार कानून को मजबूती से लागू करेंगे. अब तक केवल कांग्रेस ने मेरी बात का जवाब दिया है.

अपने घोषणापत्र में कांग्रेस ने ‘आरटीआई कानून को मजबूत करने’ का वादा करते हुए कहा है कि वह आरटीआई अधिनियम की मूल भावना के अनुरूप समाज के विभिन्न वर्गों के शिक्षित व्यक्तियों को सूचना आयुक्तों के तौर पर नियुक्त करेगी.

एक ऐसी पार्टी होने के नाते, जिसने इस क्रांतिकारी सुशासन कानून को लागू किया था, कांग्रेस पार्टी से यह अपेक्षा की जानी चाहिए कि वह अपने वादे को निभाएगी, क्योंकि इस कानून का अस्तित्व खतरे में है.

घोषणा पत्र के ‘शासन, पारदर्शिता और जवाबदेही’ अध्याय के तीसरे पैराग्राफ में कांग्रेस ने कहा कि पार्टी आरटीआई अधिनियम की पूरी तरह से समीक्षा करेगी, उन प्रावधानों को हटाएगी, जो अधिनियम को कमजोर करने वाले हैं और अधिनियम को मजबूत करने वाले नए प्रावधान जोड़ेंगी.

यूपीए सरकार ने केंद्रीय सूचना आयोग में गैर-नौकरशाही सदस्यों की अधिक संख्या में नियुक्ति की, बल्कि कुछ सेवानिवृत्त नौकरशाह अधिकारियों ने आरटीआई अधिनियम के कार्यान्वयन के लिए ठोस नींव भी रखी.

उदाहरण के लिए, प्रथम मुख्य सूचना आयुक्त, वजाहत हबीबुल्लाह ने आरटीआई कानून को लागू करने वाली नोडल एजेंसी, कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) के साथ फाइल नोटिंग के मुद्दे पर काफी संघर्ष किया, जिसे आने वाले दिनों में भी याद किया जाएगा.

हबीबुल्ला कामयाब रहे और डीओपीटी को फाइल नोटिंग दिखाने से रोकने वाली गाइडलाइंस, हैंडबुक या आदेश अपनी वेबसाइट से हटाने पड़े. कई आयुक्तों ने आरटीआई कानून के उद्देश्यों को सही मायने में हासिल करने के लिए कई महत्वपूर्ण आदेश दिए लेकिन कानून के कार्यान्वयन में उन आयुक्तों ने बाधा पहुंचाई, जिनका मानना था कि अच्छी तरह से शासन चलाने के लिए कई बातों को छिपाना जरूरी होता है.

वे मानते थे कि गैर प्रशासनिक आयुक्त ही ऐसे आदेश देते हैं, जिससे सब बातें सामने आ जाएं क्योंकि उन्हें ‘प्रशासन’ की जानकारी नहीं है.

आरटीआई विरोधी मानसिकता

मैं शिक्षक से सूचना आयुक्त बना, जबकि मुझे सरकारी प्रशासन का अनुभव नही था, मैं परिणामों के डर के बिना कह सकता हूं कि कुछ प्रमुखों और आयुक्तों ने सार्वजनिक प्राधिकरणों व नौकरशाहों के बारे में सूचना देने से साफ तौर पर इनकार कर दिया, जिससे इस पारदर्शिता कानून को काफी नुकसान पहुंचा.

मुझे आश्चर्य है कि कुछ लोगों ने अपने सहकर्मियों को बचाने की पूरी कोशिश की, जबकि उनका उन सहकर्मियों से कोई संबंध तक नहीं था. आरटीआई के खिलाफ कुछ की मानसिकता ऐसी थी कि अगर उनके ईमानदार सहकर्मी भी जानकारी मांग रहे थे, तो भी उन्होंने आरटीआई अधिनियम के प्रावधानों की परवाह किए बिना सूचना देने से इनकार कर दिया.

झूठे मामलों में फंसे अधिकारियों को अपने ऊपर चल रही जांच की रिपोर्ट की प्रति लेने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ी थी. जब किसी आयुक्त ने निर्देश दिया कि जांच रिपोर्ट साझा की जाए तो उसके खिलाफ सरकार ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी और सूचना आयोग पहला प्रतिवादी बन गया और उस सूचना पर कई सालों के लिए रोक लग गई.

सरकार को केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) और आरटीआई का बचाव करने के लिए वकीलों को भुगतान करने की जरूरत है जबकि यही सरकार अपने अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरलों सहित वकीलों की फौज के साथ इनसे लड़ती है. 1,000 से अधिक मामले हैं, जहां सीआईसी अपने सूचना देने के आदेशों की रक्षा करने के लिए मजबूर हैं.

कुछ मुख्य सूचना आयुक्तों ने अपने ‘टॉप बॉस’ के दबावों का जोरदार विरोध किया और सूचना आयुक्तों को अपने दम पर काम करने की अनुमति दी लेकिन लंबे समय तक इस तरह के लगातार दबावों का विरोध करना मुश्किल है, क्योंकि ये मुख्य सूचना आयुक्त भी पहले उसी बॉस के अधीनस्थ रह चुके थे और उनकी ही मेहरबानी से रिटायरमेंट के बाद यह लाभ का पद मिला था.

ख़राब नियम

सरकार नियुक्ति के स्तर से ही सीआईसी को नियंत्रित करने की कोशिश करती है, वह 99 फीसदी आयुक्तों के पदों पर अपने ईमानदार नौकरशाहों का चुनाव कर इसे नियंत्रित करने की कोशिश करती है. अभी भी, सरकारें नियमों में बदलाव कर, संशोधन प्रस्तावित कर और बाबू शासित समितियां बनाकर सीआईसी को कमजोर करने की कोशिश कर रही है.

वास्तविकता यह है कि जहां पारदर्शिता के बारे में मंत्री मीठी-मीठी बातें करते हैं, वहीं उनके अधिकारियों की योजना इसे कमजोर करने की है. 2017-18 में, डीओपीटी ने सीआईसी के आंतरिक कामकाज के लिए आरटीआई नियमों का मसौदा पेश करने की कोशिश की, ताकि सीआईसी को नियंत्रित किया जा सके.

सीआईसी को अपने विचार प्रस्तुत करने के लिए तो कहा गया, लेकिन मसौदा तैयार होने से पहले नहीं. इनमें एक क्रूर नियम यह था कि इसके प्रमुख अपने किसी भी सूचना आयुक्त को कभी भी हटा या नियुक्त कर सकता है.

मेरे सहयोगी यशोवर्धन आजाद ने इसका खुलकर विरोध किया, जबकि अन्य ने गुपचुप तरीके से इन नियमों की आलोचना की. लोगों और मीडिया द्वारा इसका इतनी दृढ़ता से विरोध किया गया, जिससे उन नियमों को पहले संशोधित किया गया और फिर उन्हें हटा दिया गया.

उससे भी ख़राब संशोधन

दूसरा क्रूर प्रयास आरटीआई (संशोधन) विधेयक 2018 है, जो कहता है कि सूचना आयुक्तों की शर्तें, स्थिति और वेतन केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित किए जाएंगे. वास्तविक अधिनियम में प्रावधान था कि आयुक्तों का कार्यकाल पांच साल और 65 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो) तक होगा.

इसमें सूचना आयुक्तों को चुनाव आयुक्तों के बराबर का दर्जा दिया गया था, जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के बराबर होते हैं. इसका मतलब है कि शर्तें और स्थिति अनिश्चित होगी और वे पदों को भरने के लिए प्रत्येक अधिसूचना में बदलाव कर सकते हैं.

जो आयुक्त इस नए नियम का दृढ़ता से विरोध कर रहे थे कि उन्हें यह बताने की कोशिश की गई कि इससे वर्तमान में तैनात सूचना आयुक्त प्रभावित नहीं होंगे, बल्कि ये नियम भविष्य में भर्ती होने वाले आयुक्तों पर लागू होंगे.

सीआईसी को नियंत्रित करने के लिए बाबुओं के दो पैनल

सबसे खराब प्रयास का खुलासा पिछले सप्ताह हुआ, जब शीर्ष नौकरशाहों के दो पैनल बना दिए गए, जिनमें से एक मुख्य सूचना आयुक्त और दूसरा सूचना आयुक्तों के खिलाफ शिकायतें लेने का अधिकार है.

कैबिनेट सचिव, सचिव डीओपीटी और पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त का पैनल, मौजूदा मुख्य सूचना आयुक्त के खिलाफ शिकायतों पर कार्रवाई करेंगे, जबकि कैबिनेट सचिवालय में सचिव (समन्वय), सचिव डीओपीटी और पूर्व सूचना आयुक्त का दूसरा पैनल सूचना आयुक्तों के खिलाफ शिकायतों पर कार्रवाई करेंगे.

मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त अभी कैबिनेट सचिव की रैंक से ऊपर के पद हैं. कानून उन्हें कैबिनेट सचिव या सचिव डीओपीटी को सूचना जारी करने का निर्देश देने की शक्ति प्रदान करता है.

सीआईसी उन्हें अपने अधीन जनसूचना अधिकारी के तौर पर नियुक्त करता है और ये अधिकारी सूचना देने में आनाकानी करते हैं तो सीआईसी उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा करता है. फिर, मुख्य सूचना आयुक्त के खिलाफ शिकायत सुनने के लिए कैबिनेट सचिव और सचिव डीओपीटी को कैसे सशक्त बनाया जा सकता है?

शायद सरकार ये संशोधन करके सीआईसी को बिना प्रतिष्ठा वाला एक प्रतिष्ठित क्लर्क बनाना चाहती है. यदि ये पैनल अस्तित्व में आते हैं, तो सीआईसी की न केवल स्वतंत्रता, बल्कि अस्तित्व ही निरर्थक हो जाएगा.

सीआईसी का नौकरशाहीकरण

अब तक, सीआईसी के प्रमुख का पद ही केवल एक पूर्व नौकरशाह को दिया जाता है और एक परिपाटी बनाई गई है कि सिर्फ प्रमुख ही पीएमओ, राष्ट्रपति भवन और वित्त जैसे प्रमुख मंत्रालयों के ख़िलाफ़ दूसरी अपील सुनेगा. प्रमुख ही अन्य आयुक्तों के विषयों का निर्धारण करेंगे.

ये कुछ ऐसी व्यावहारिक बाधाएं हैं, जो सूचना आयुक्तों की स्वतंत्रता को प्रभावित करती हैं. इसलिए, वे सीआईसी का पूर्ण नौकरशाहीकरण चाहते हैं. जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने सही कहा, पारदर्शिता के लिए यह एक आपदा होगी. सीआईसी के नौकरशाहीकरण के बाद भी बाबुओं को आरटीआई से डर क्यों लगता है? क्या उनकी अलमारी में इतने रहस्य छिपे हुए हैं?

केंद्र और राज्यों में सूचना आयोग स्वतंत्र होने चाहिए. रीढ़विहीन बाबुओं को यह अनुमति नहीं दी जानी चाहिए कि वे सीआईसी को भी रीढ़ विहीन बना दें. लोकसभा चुनाव में उतर रहे राजनीतिक दलों को सीआईसी की स्वतंत्रता सुनिश्चित करनी चाहिए. कांग्रेस ने इस बात की घोषणा कर दी है. अब सवाल भाजपा के लिए है: क्या आप सीआईसी को स्वतंत्रता का आश्वासन देंगे और आरटीआई को मजबूत करेंगे?

एम. श्रीधर आचार्युलु पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त और बैनेट विश्वविद्यालय में कांस्टीट्श्यूनल लॉ के प्रोफेसर हैं.

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