भारत

आंबेडकर को जितना अस्वीकार वर्तमान राजनीति ने किया है, उतना किसी और ने नहीं किया

जब कोई फल पक जाता है, तब उसे तोड़ने के लिए सभी लपक पड़ते हैं. उसी तरह आज राजनीति में आंबेडकर चहेते हो गए हैं, लेकिन आंबेडकर दिखने में चाहे जितने आकर्षक हों, अपनाने में उतने ही कठिन हैं. वर्तमान राजनीतिक दल इस बात को जानते हैं इसीलिए वे 14 अप्रैल और 6 दिसंबर पर उनका नाम तो लेते हैं लेकिन उनकी वैचारिक तेजस्विता से डरते हैं.

Modi-Ambedkar-PTI

फोटो: पीटीआई

हमारे समय के सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तनों ने बाबासाहेब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर की प्रासंगिकता बढ़ा दी है. इधर हाल के कुछ वर्षों में डॉक्टर आंबेडकर को पढ़ने और समझने की चेतना विकसित हुई है. अब उन्हें कोई अनदेखा नहीं कर सकता है.

भाजपा हो, कांग्रेस हो या मार्क्सवादी पार्टियां- डॉक्टर आंबेडकर के बिना वे चुनावी वैतरणी नहीं पार कर सकती हैं. लेकिन क्या डॉक्टर आंबेडकर को केवल चुनाव जीतने के लिए याद किया जायेगा? उन्हें एक चुनावी महनायक बनाकर वोट बटोरा जायेगा?

आंबेडकर की एक विचार के रूप में उपस्थिति

कहते हैं जिन समूहों के पास कमजोर जमीन होती है, वहां रचनात्मकता भी सबसे अधिक होती है. बीसवीं शताब्दी के भारत में कई नेताओं ने इसे अलग-अलग पहचाना.

डॉक्टर आंबेडकर ने इसे अस्पृश्यों और कमजोर समूहों, स्त्रियों के लिए पहचाना कि जब तक उनका उत्थान नहीं होगा, भारत एक देश और कौम के रूप में असफल ही रहेगा.

उनका मानना था कि अगर किसी एक चीज ने भारतीय समाज को एक पतनशील समाज में परिवर्तित कर दिया है और उसे जिंदा कौम की जगह मुर्दा कौम में तब्दील कर दिया है तो उस चीज का नाम है: जाति व्यवस्था.

जाति की सर्वव्यापी विनाशक भूमिका के संदर्भ में डॉक्टर आंबेडकर लिखते हैं कि ‘इसमें कोई संदेह नहीं है कि जाति आधारभूत रूप से हिंदुओं का प्राण है’.

अब देखने की बात यह है कि पिछले तीन दशक में डॉ.आंबेडकर का पुनरुद्धार किया जा रहा है. अब जो थोड़ा भी प्रगतिशील दिखाई पड़ना चाहता है, उसे उनका नाम लेना ही पड़ेगा.

दिलचस्प है कि स्वतंत्रता संघर्ष के दिनों में डॉक्टर आंबेडकर की प्रतिभा को जिस एक नेता ने पहचाना था, वे महात्मा गांधी थे. ध्यान देने की बात है कि उन दिनों जिस एक नेता पर आंबेडकर ने जोरदार धावा बोला था, वे भी महात्मा गांधी ही थे.

आंबेडकर को गिला था कि कांग्रेस ने दलितों के लिए कुछ भी नहीं किया. इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार गांधी थे, क्योंकि वे अपने अंतिम दिनों के पहले, वर्ण व्यवस्था और जाति प्रथा का विरोध करने के लिए तैयार नहीं थे, बल्कि अपने सनातनी हिंदू होने को लेकर संतुष्ट थे.

लेकिन आंबेडकर के हमलों का गांधी जी, जिन्हें आंबेडकर जिन्ना की तरह मिस्टर गांधी कहते थे, ने कभी प्रत्युत्तर नहीं दिया; बल्कि उनका कहना था कि दलितों के साथ हमारे पूर्वजों ने जो कुछ किया है, उसे देखते हुए दलित हमारे मुंह पर थूक दें, तब भी हमें बुरा नहीं मानना चाहिए.

इसके प्रायश्चित स्वरूप गांधी जी ने दलित प्रश्न को पूरे एक साल का समय दिया. अस्पृश्यता के कलंक को मिटाने के लिए उन्होंने देश भर में दौरा किया, जगह-जगह गालियां सुनीं, कई स्थानों पर उनकी गाड़ी पर बम फेंका गया और पंडितों ने शास्त्रार्थ करने की चुनौती दी.

गांधी जी व्यर्थ की सिर-फुटव्वल से बचकर चलने वाले आदमी थे. उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि अगर कोई साबित कर दे कि वेद या शास्त्र में अस्पृश्यता का समर्थन है, तो मैं उस अंश को प्रक्षिप्त मानूंगा.

गांधी और डॉक्टर आंबेडकर के बीच का फर्क

कांग्रेस के दूसरे नेताओं जैसे जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आदि को डॉक्टर आंबेडकर कतई पसंद नहीं थे.

नेहरू ने तो कई बार अपनी अप्रसन्नता व्यक्त की थी कि इधर स्वाधीनता संघर्ष तेज हो रहा है, उधर गांधी जी दलितों के लिए देश भर में दौरा कर रहे हैं.

स्पष्टत: नेहरू को दलित प्रश्न की अहमियत का कोई व्यापक एहसास नहीं था. गांधी जी के कहने पर ही कांग्रेस पार्टी की सदस्यता के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया था कि कोई किसी को अछूत नहीं समझेगा.

वास्तव में गांधी और डॉक्टर आंबेडकर के बीच मुख्य फर्क यही था कि डॉक्टर आंबेडकर अस्पृश्यता और जाति प्रथा के प्रश्न को पहले हल करना चाहते थे, और तब आजादी के लिए संघर्ष करना चाहते थे, और गांधी आजादी और अस्पृश्यता के प्रश्नों को एक साथ ले कर चल रहे थे.

आंबेडकर की प्रतिभा और योग्यता के प्रति गांधी जी के मन में कितना सम्मान था, इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि गांधी जी के प्रयास से ही आंबेडकर संविधान सभा में पहुंच सके और उन्हीं के सुझाव पर नेहरू मंत्रिमंडल में कानून मंत्री बने.

यह सब याद करने का अभिप्राय यह दिखाने के लिए नहीं है कि आंबेडकर पर गांधी जी का कितना एहसान था या दलितों को गांधी जी का ऋण स्वीकार करना चाहिए.

इसका मकसद सिर्फ यह साबित करने का है कि हमारे स्वाधीनता संघर्ष में जो कुछ भी उत्कृष्ट था, उसी का प्रतिनिधित्व गांधी और डॉक्टर आंबेडकर, दोनों कर रहे थे.

डॉक्टर आंबेडकर को कांग्रेस से नहीं, गांधी से उम्मीद थी और गांधी जानते थे कि आंबेडकर एक विशेष व्यक्ति है.

इस परिदृश्य में नेहरू कहीं नहीं आते, डॉ. राममनोहर लोहिया ने जरूर गंभीर कोशिश की थी कि आंबेडकर की रिपब्लिकन पार्टी का लोहिया की समाजवादी पार्टी में विलय हो जाए. बातचीत कोई शक्ल ले सके, इसके पहले ही डॉक्टर आंबेडकर का महापरिनिर्वाण हो गया.

इस तरह से आज़ाद भारत में आंबेडकर और लोहिया, यही दो नेता ऐसे थे जिन्होंने भारतीय समाज में जाति के महत्व को पहचाना था और जातिविहीन समाज के लिए संघर्ष किया था. यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि यह वह समय था, जब डॉक्टर आंबेडकर के नाम पर कोई वोट बैंक नहीं बना था.

आंबेडकर के बारे में गांधी ने कहा था-‘‘भविष्य में चाहे उन्हें किसी भी विशेषण से जोड़ा जाए परंतु डॉ. आंबेडकर ऐसे व्यक्ति नहीं हैं, जो समाज द्वारा भुलाए जा सकेंगे.’

गांधी की यह बात पूरी तरह से सही साबित हुई. हिंदुस्तान की समस्याओं की भीतरी तहों को जानने वाला कोई भी व्यक्ति इस बात से इनकार नहीं कर पाएगा कि भविष्य के किसी भी खूबसूरत भारत की रचना का रास्ता आंबेडकर से गुजर कर जाएगा.

डॉक्टर आंबेडकर एक मुकम्मल चिंतक, सामाजिक क्रांतिकारी के साथ-साथ राजनेता भी रहे. राजनीतिक व्यवस्था के तौर पर उदारवादी लोकतंत्र के समर्थक हैं, आर्थिक व्यवस्था के तौर पर राज्य नियंत्रित पूंजीवाद के समर्थक हैं, या राजकीय समाजवाद के समर्थक हैं.

वे कृषि भूमि के पूर्ण राष्ट्रीयकरण और बुनियादी एवं बड़े उद्योग-धंधों के राष्ट्रीयकरण का समर्थन करते हैं. एक अनीश्वरवादी, समतावादी धर्म के रूप में बौद्ध धर्म की पैरवी करते हैं लेकिन उनकी मुख्य चिंता का विषय और केंद्रीय सरोकार जाति है.

जाति के संदर्भ में उन्होंने कहा था कि जिस चीज ने भारतीय समाज तथा भारतीय आदमी विशेषकर हिंदुओं के अधिकांश हिस्से को भीतर से संवेदनहीन, न्यायपूर्ण चेतना से रहित और अमानवीय बना दिया है, वह है जातियों पर आधारित भारतीय सामाजिक व्यवस्था.

यह हमें रोज-ब-रोज अतार्किक, विवेकहीन, कायर, पाखंडी-ढोंगी और आत्मसम्मानहीन बनाती है तथा व्यक्ति के आत्म गौरव और मानवीय गरिमा को क्षरित करती है.

A vendor sells portraits of BR Ambedkar on a pavement in New Delhi. (Photo: Reuters)

फोटो: रॉयटर्स

आज जाति के नाम पर गोलियां चल रही हैं. धर्म के आधार पर लोग मारे जा रहे हैं. ऐसे में जरूरत है कि डॉक्टर आंबेडकर को पढ़ा जाए, उनके जीवन को याद किया जाए.

वे समाज के निर्माता, देश के निर्माता और दुनिया के बड़े मानवतावादी हैं. उन्हें जाति का नेता, किसी एक समाज का नेता कहना उनके कामों के साथ अन्याय होगा. बाकी दूसरे महापुरुषों की जयंती पर देश के तमाम जाति, समुदाय के लोग शामिल होते हैं. होना भी चाहिए,

लेकिन आधुनिक भारत के निर्माता बाबा साहेब की जयंती सिर्फ दलित, पिछड़े वर्ग, अल्पसंख्यक और सरकारी विभाग (एक रस्म अदायगी के तौर पर) मनाते हैं. इसे बदलना चाहिए.

आंबेडकर की भौतिक काया के रूप में उपस्थिति

आंबेडकर ने भौतिक रूप से और विचार के रूप में दिल्ली से सुदूर गांवों तक अपनी उपस्थिति दर्ज़ करायी है. उसे तो महत्व दिया जा रहा है लेकिन भूमि सुधार, शिक्षा का सार्वभौमीकरण, सार्वजनिक स्वास्थ्य, आत्मसम्मान के साथ जीवन के सवाल को पीछे धकेल दिया गया है.

आज कोई भी मुर्दा गांधीवाद या मुर्दा आंबेडकरवाद को अपना रहा है लेकिन उनके जीवंत स्वरूप को वही धारण कर सकता है, जिसे संघर्षों पर चलने की चाहत हो.

आज राजनीतिक दलों में आंबेडकर के सम्मान और उनकी भौतिक काया को अपनाने को लेकर एक होड़ सी लगी रहती है. सबके अपने-अपने दावे हैं कि हमने डॉक्टर आंबेडकर का जितना सम्मान किया है, उतना किसी और दल ने नहीं.

वास्तविकता है कि डॉक्टर आंबेडकर का जितना अस्वीकार वर्तमान राजनीतिक मानस ने किया है, उतना किसी और ने नहीं. डॉक्टर आंबेडकर का सम्मान इस बात में है कि आंबेडकर को किसने कितना अपनाया है.

कहते हैं जब कोई फल पक जाता है, तब उसे तोड़ने के लिए सभी लपक पड़ते हैं. यही वजह है कि आज राजनीति में आंबेडकर उतने ही चहेते हो गए हैं, लेकिन आंबेडकर दिखने में चाहे जितने आकर्षक हों, अपनाने में उतने ही कठिन हैं.

आज की राजनीतिक पार्टियां इस बात को जानती हैं, इसीलिए वे भौतिक आंबेडकर के पास तो जाती हैं. इस तरह वह 14 अप्रैल और 6 दिसंबर पर उनका नाम तो ले लेती हैं लेकिन उनकी वैचारिक तेजस्विता से डरती हैं.

डॉक्टर आंबेडकर का सम्मान इसमें नहीं है कि किसने उनकी कितनी बड़ी मूर्ति स्थापित की है, बल्कि इसमें है कि उनके आदर्श को किसने कितना अपनाया है. डॉक्टर आंबेडकर का नाम लेने वालों की संख्या बढ़ती जाती है, पर जिस स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को उन्होंने अपना जीवन दर्शन बतलाया था, उसके ग्राहक कम होते जा रहे हैं.

(लेखक भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान शिमला में फेलो हैं.)