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आज के समय में जाति के विरोध में कोई भी आंदोलन होता नहीं दिखता: आनंद तेलतुम्बड़े

आंबेडकर जयंती के मौके पर लेखक तेलतुम्बड़े ने कहा, ‘आंबेडकर को हर कोई अपने अपने ढंग से समझता है. आज के समय में हर राजनीतिक दल उन्हें अपना बताने की कोशिश में हैं लेकिन आंबेडकर के विचारों पर कोई नहीं चलना चाहता.’

(फोटो: द वायर)

(फोटो: द वायर)

नई दिल्ली: जाने-माने शिक्षाविद, लेखक और भीमा कोरेगांव प्रकरण में आरोपी प्रो. आनंद तेलतुम्बड़े ने आंबेडकर जयंती के मौके पर नई दिल्ली में एक सार्वजनिक सभा को संभोधित किया.

इस मौके पर आनंद तेलतुम्बड़े ने कहा, ‘आंबेडकर को हर कोई अपने अपने ढंग से समझता है. आज के समय में हर राजनीतिक दल उन्हें अपना बताने की कोशिश में हैं लेकिन आंबेडकर के विचारों पर कोई नहीं चलना चाहता.’

मालूम हो कि संविधान के निर्माता, समाज सुधारक और छुआछूत व जातिवाद जैसे सामाजिक भेदभावों के विरुद्ध अभियान चलाने वाले डॉ. भीमराव आंबेडकर की आज 128वीं जयंती है. आंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल, 1891 को हुआ था.

तेलतुम्बड़े ने आंबेडकर को लेकर भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी सहित बहुत से राजनितिक दलों की आलोचना की.

उन्होंने कहा, ‘आज के समय में सही मायने में कोई भी ऐसा आंदोलन या राजनितिक दल नहीं है जो जाति को ख़त्म करना चाहता हो, या आंबेडकर के दिखाए जाति उन्मूलन के रास्ते पर चलना चाहता हो, क्योंकि इन नेताओं को और इन आंदोलनकारियों को डर है कि उसके बाद ये लोग बेरोज़गार हो जाएंगें.’

भीमा कोरेगांव प्रकरण व माओवादियों से कथित संबंध होने के आरोप में बीते कुछ महीनों से आनंद तेलतुम्बड़े कानूनी लड़ाई लड़ रहें हैं. इनके जमानत की मांग वाली अगली सुनवाई 16 अप्रैल को है.

आंबेडकर जयंती पर इस कार्यक्रम का आयोजन इंदिरा जयसिंह और आनंद ग्रोवर जैसे जाने- माने वकीलों के समूह द्वारा चलाई जाने वाली वेबसाइट लीफलेट ने किया था.

तेलतुम्बड़े ने कहा, ‘एक व्यवस्था के रूप में जाति घट रही है लेकिन एक चेतना के रूप में जाति दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है.’

उन्होंने कहा, ‘भाजपा कहती है कि जहां भी आंबेडकर ने अपना पैर रखा उसे स्मारक बनाया जाएगा लेकिन जिस बात के लिए आंबेडकर खड़े थे उसे रौंद दिया जा रहा है.’

साल 1942 में आंबेडकर ने अनुसूचित जाति संघ की स्थापना की थी जो बाद में रिपब्लिकन पार्टी बनी. तेलतुम्बड़े  ने कहा आज आंबेडकर के बनाए हुए सभी संघठन खत्म होते जा रहें हैं. रिपब्लिकन पार्टी, समता दल, भारतीय बौद्ध महासभा सबका हाल वही है.

तेलतुम्बड़े ने कहा, ‘जाति एक अमीबा की तरह है जो सिर्फ बंटना और बांटना जानती है. फिर जाति को ख़त्म करने के लिए लोगों को संगठित किया कैसे जा सकता है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘आंबेडकर ने इतने सालों पहले बताया था कि हमें राजनीतिक बराबरी तो मिल गयी है लेकिन सामाजिक बराबरी नहीं मिली है. बीते कुछ दशकों से हम सिर्फ गैरबराबरी बढ़ते हुए देख रहें हैं. अब गैरबराबरी इस स्थिति पर आ पहुंची है कि एक फीसदी अमीरों के पास देश की 73 फीसदी दौलत है. ऐसे में लोकतंत्र की कल्पना भी नहीं हो सकती.’

वहीं सुप्रीम कोर्ट की जानी-मानी अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने  कहा, ‘आंबेडकर की पहचान को मात्र संविधान के निर्माता तक सीमित कर दिया जाता है. आंबेडकर के जीवन के संघर्ष और उपलब्धियों को नजरअंदाज किया जाता है. आंबेडकर ने दलितों के प्रति होने वाले छुआछूत जैसे सामजिक भेदभाव से लेकर संवैधानिक आरक्षण तक की लड़ाई लड़ी.’

उन्होंने कहा, ‘हमारे सुप्रीम कोर्ट में बहुत सी तस्वीरें शुरू से ही लगी हैं लेकिन डॉ. आंबेडकर की तस्वीर को लगाने में बहुत साल लग गए. अनुसूचित जाति के वकीलों के विद्रोह के बाद साल 2015 में आंबेडकर की तस्वीर लगी. आंबेडकर के विचारों और उनके आंदोलन को जिंदा रखने की हमें जरुरत है.’

मशहूर फिल्म ‘कोर्ट’ के अभिनेता, दलित आंदोलनों में सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता वीरा साथीदार ने कहा, ‘देश में इस समय जब जाति पर और आंबेडकर के नाम पर इतनी राजनीति हो रही हो तो ऐसे में आंबेडकर को और उनके विचारों को लोगों के सामने रखने की बहुत जरूरत है. ऐसे समय में मीडिया की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है. लेकिन मेनस्ट्रीम मीडिया तो पूरा बिक चुका है. उसके पास ऐसे मुद्दे उठाने का कोई समय नहीं है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘ऑल्टरनेटिव मीडिया (वैकल्पिक मीडिया) के भरोसे ही बहुत सी बातें लोगों के सामने आ पाती हैं. भीमा कोरेगांव प्रकरण में जस्टिस चंद्रचूड़ का एक डिसेंट जजमेन्ट है जो कि किसी भी लोकतंत्र में बहुत महत्वपूर्ण है. इस तरह के डिसेंट जजमेंट को भी लोगों तक पहुंचाने की जरूरत है.’