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आधार पर सरकार: नागरिकों का अपने शरीर पर पूरा अधिकार नहीं

आयकर जमा करने और पैन कार्ड के लिए आधार अनिवार्य बनाने को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा है.

Aadhaar Reuters

(फोटो: रॉयटर्स)

आधार कार्ड अनिवार्य बनाने संबंधी सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि कोई भी नागरिक अपने शरीर पर पूर्ण अधिकार होने का दावा नहीं कर सकता.

सरकार ने यह भी कहा कि आधार नामांकन के लिए कोई भी नागरिक अपने उंगलियों के निशान और आंख की पुतली (आइरिश) का डिजिटल सैंपल लेने से इंकार नहीं कर सकता है.

केंद्र सरकार की ओर से यह बात उन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान कही गई जिनमें इस साल एक जुलाई से आयकर अधिनियम की नई धारा 139AA के तहत आयकर रिटर्न दाख़िल करने और पैन कार्ड के लिए आधार अनिवार्य बनाने के फैसले को चुनौती दी गई थी.

इस धारा के तहत एक जुलाई से आयकर जमा करने या फिर पैन कार्ड बनवाने के लिए आधार का ब्योरा देना अनिवार्य होगा.

मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति एके सीकरी और न्यायमूर्ति अशोक भूषण की पीठ के समक्ष केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा, ‘किसी का ख़ुद के शरीर पर पूर्ण अधिकार होने की धारणा एक भ्रम है. ऐसे बहुत सारे कानून हैं जो इस तरह के किसी भी अधिकार को प्रतिबंधित करते हैं.’

रोहतगी ने आगे कहा, ‘किसी का भी उसके शरीर पर पूर्ण अधिकार इसलिए नहीं है क्योंकि कानून के तहत आत्महत्या करने पर प्रतिबंध है. साथ ही एक ख़ास समयसीमा के बाद महिलाओं द्वारा ख़ुद का गर्भ हटाने पर भी रोक है. अगर ऐसा नहीं होता तो लोगों को आत्महत्या करने की छूट होती और वे अपने शरीर के साथ जो चाहते कर सकते थे.’

इस पर शीर्ष अदालत ने कहा कि अटॉर्नी जनरल ने जो दलीलें दी हैं वे उचित नहीं हैं क्योंकि जिन मामलों की सुनवाई हो रही है वे अपराध से नहीं बल्कि टैक्स कानूनों से जुड़े हैं. अदालत ने यह भी कहा कि नागरिक के अधिकारों और राज्य की कार्यप्रणाली के बीच एक संतुलन होना चाहिए.

रोहतगी ने दलील दी कि आपराधिक मामलों में खून की जांच और उंगलियों के निशान लेने के लिए सहमति की ज़रूरत नहीं होती. कर चोरी और काला धन रोकने के लिए अगर आधार को पैन कार्ड से जोड़ दिया जाता है तो इसमें कोई भी बुराई नहीं है.