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वाजपेयी चाहते थे कश्मीरी उन्हें प्यार करें पर मोदी चाहते हैं कि कश्मीरी उनसे डरें: यासीन मलिक

जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के प्रमुख यासीन मलिक का कहना है कि वर्तमान सरकार कश्मीरियों की एक पूरी पीढ़ी को सशस्त्र संघर्ष के लिए मजबूर कर रही है.

जम्मू कश्मीर लिबरेशन के अध्यक्ष यासीन मलिक (फोटो: ऱॉयटर्स )

90 के दशक के शुरुआती सालों में जब कश्मीर में अशांति की शुरुआत हुई तब यासीन मालिक उग्रवादी थे. फिर कुछ सालों तक क़ैद में रहने के बाद उन्होंने हिंसा का अपना रास्ता बदल लिया. द वायर से इस बातचीत में जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के अध्यक्ष यासीन मालिक ने कश्मीर, यहां के संघर्ष, लोगों की उम्मीदों और उन पर भारतीय सरकार की प्रतिक्रियाओं के बारे में बात की.  

पिछले साल बुरहान वानी की मौत के बाद कश्मीरियों की प्रतिक्रिया को किस तरह देखते हैं?

जनता में पहले से ही सरकार के प्रति गुस्सा था क्योंकि भारत सरकार ने हर तरह के राजनीतिक रास्ते को बंद कर दिया है. किसी को भी अपनी सोच या राजनीतिक राय ज़ाहिर करने की इजाज़त नहीं है. कोई सार्वजानिक मीटिंग करने की इजाज़त नहीं है. तब ये युवा जो बिना किसी हिंसा के प्रदर्शन कर रहे थे, उन्हें पुलिस थानों में बुरी तरह पीटा गया. पुलिस स्टेशन मज़ाक बनकर रह गए हैं. यही कारण है कि इन्होंने हथियार उठा लिए और इस तरह जनता का गुस्सा ज़ाहिर हुआ. और फिर सरकार ने वही ग़लती की. विरोध से निपटने के लिए सुरक्षा बलों को इस्तेमाल किया गया. 100 से ज़्यादा लोग मारे गए, सैंकड़ों ने अपनी आंखों की रोशनी गंवा दी, हजारों अभी जेल में हैं. 1947 के बाद से कश्मीर में यही स्थिति है- लोग सुरक्षा बलों की ताकत और डर के साये में जी रहे हैं.

2016 के विरोध-प्रदर्शन के वक़्त आपने हुर्रियत नेताओं सैय्यद अली शाह गिलानी और मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ के साथ ‘जॉइंट रेज़िस्टेंस मूवमेंट’ (संयुक्त प्रतिरोध आंदोलन) की शुरुआत की थी. इसकी शुरुआत कैसे हुई, इसका क्या भविष्य देखते हैं?

हम 1993-94 से ही साथ थे, फिर हम अलग हो गए. अब हमें लगता है कि हमें साथ मिलकर आवाज़ उठाने की ज़रूरत है क्योंकि भारत सरकार की तरफ से इसके अपने ही लोगों के ख़िलाफ़ लड़ाई छेड़ दी गई. इन मुद्दों के ख़िलाफ़ एक आवाज़ उठनी चाहिए और मुझे लगता है की हम साथ ये आवाज़ उठाते रहेंगे. हम ज़्यादा से ज़्यादा मज़बूत होने की कोशिश कर रहे हैं.

कश्मीर के राजनीतिक भविष्य को लेकर होने वाली कोई भी बात अक्सर चार बिंदुओं पर ही अटक जाती है : रेफेरेंडम या जनमत संग्रह, प्रो-पाकिस्तान (पाकिस्तान समर्थक), प्रो-हिंदुस्तान या स्वायत्त दर्जा. इस पर क्या सोचते हैं?

यह फ़ैसला कौन करेगा? खुद यह फ़ैसला करने का हक़ मिलना एक बेहतर विकल्प हो सकता है. लोग मिलकर यह फ़ैसला ले सकते हैं कि वे पाकिस्तान जाना चाहते हैं या हिंदुस्तान, या फिर वे एक आज़ाद पहचान चाहते हैं. यह फ़ैसला जनता द्वारा लिया जाना चाहिए न कि किसी एक व्यक्ति द्वारा. हमें संयुक्त रूप से लोकतांत्रिक फ़ैसले का सम्मान करना चाहिए.

गृहमंत्री मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में कहा कि जनमत संग्रह करवाना आउटडेटेड तरीका है. आप इस बात से कितना इत्तेफाक़ रखते हैं?

1947 में साइन किया गया ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेसशन’ (एक समझौता) ही हिंदुस्तान और कश्मीर के बीच की इकलौती कड़ी है. भारत सरकार ने आश्वासन दिया था कि यह समझौता अस्थायी है, जैसे ही क़ानून और न्याय व्यवस्था सामान्य होगी, कश्मीर के लोगों को उनके भविष्य के लिए विकल्प चुनने का मौका दिया जाएगा. ऐसा देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने श्रीनगर के लाल चौक पर कहा था, ‘मैंने आपको अपना भविष्य तय करने का हक़ देने का वचन लिया है. भले ही यह मेरे ही ख़िलाफ़ क्यों न हो. तब मुझे बहुत दुख होगा. पर मुझे इसे मानना होगा.’ उन्होंने यही बात संसद में कही, फिर वे इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में ले गए.

अब कश्मीरी सामने आकर अपने हक़ के बारे में पूछ रहे हैं, तो भारत सरकार अत्याचार का सहारा ले रही है. युवा लड़कों को जेल में डाला जा रहा है, पीटा जा रहा है, उन पर ज़ुल्म किए जा रहे हैं, मार डाला जा रहा है. कश्मीर में यह सब चल रहा है. यह दिखाता है कि भारत सरकार का लोकतंत्र और न्याय के सिद्धांतों पर कोई भरोसा नहीं है.

हाल ही में भारतीय सेना प्रमुख बिपिन रावत ने कहा कि पत्थर फेंकने वाले आतंकियों को बचाने की कोशिश कर रहे हैं.

देखिए यह राजनीतिक और सार्वजानिक दोनों तरह का आक्रोश है. भारत सरकार अहिंसक प्रदर्शनकारियों पर पेलेट गन और आंसू गैस का प्रयोग करती है. वे केवल पत्थर फेंकते हैं. इन पत्थरों से किसी भी सुरक्षाकर्मी की मौत नहीं हुई है. पर सुरक्षा बलों द्वारा 100 से ज़्यादा आम नागरिकों को मारा जा चुका है. हजारों घायल हुए, सैंकड़ों ने अपनी आंखों की रोशनी गंवा दी. ऐसा लग रहा है जैसे भारत सरकार कश्मीरियों की एक पूरी पीढ़ी को सशस्त्र संघर्ष की ओर धकेलना चाहती है.

कई बार कश्मीर विवाद को एक धार्मिक मुद्दे की तरह पेश किया जाता है और कश्मीरी पंडितो के कश्मीर छोड़ने को इसके सबूत के बतौर पेश किया जाता है. आपकी क्या राय है?

कश्मीर मुद्दा जनता के फैसला लेने के हक़ से जुड़ा है. इस तरह हर किसी को भले ही वो मुस्लिम हो, पंडित हो, सिख, डोगरा या बौद्ध, वोट देने का हक़ है. किसी संयुक्त राज्य के नागरिकों को इस हक़ के तहत अपनी मर्ज़ी के मुताबिक वोट देने का अधिकार मिलता है. हम यही चाहते हैं. जनता को यह फ़ैसला करने दिया जाये की वह किस तरह की व्यवस्था चाहती है.

ग़ैर-चुनावी राजनीति में होते हुए भाजपा के सरकार संभालने का किस तरह आकलन करते हैं?

ऐसा नहीं है कि सिर्फ कश्मीर में लोग असुरक्षित महसूस कर रहे हैं. अल्पसंख्यक- चाहे वो मुस्लिम हैं, ईसाई, दलित, लेखक, कलाकार. बुद्धिजीवी या नागरिक समूह, वे सब अपनी पहचान को लेकर असुरक्षित हैं. कोई भी अगर सरकार के ख़िलाफ़ लिखता है तो उसे निशाना बनाया जा रहा है. कश्मीर में तो हमें हर हफ़्ते उनका कोई न कोई नया आपत्तिजनक बयान सुनने को मिलता रहता है. मैं समझ नहीं पाता कि भाजपा किस तरह की राजनीति चाहती है. एक वक़्त था जब लोगों को लगता था कि वाजपेयी (अटल बिहारी वाजपेयी) अपनी अच्छी भाषा और लहज़े के चलते इस मुद्दे का हल निकाल लेंगे. पर अब भाजपा लड़ना चाहती है, वे कश्मीरियों की इच्छाशक्ति तोड़ना चाहते हैं. तो कश्मीरियों ने भी तय कर लिया है कि वे हम उन्हें ऐसा नहीं करने देंगे.

अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी की तुलना कैसे करेंगे?

वाजपेयी एक कवि थे. वे चाहते थे कि उन्हें ऐसे प्रधानमंत्री के रूप में याद किया जाए, जिसे जनता प्यार करती थी. मोदी का सोचना है कि उन्हें ऐसे नेता के रूप में याद रखा जाए जिससे लोग डरते हैं, जिसके नाम से डर पैदा हो जाता है. बस यही फर्क़ है.

क्या आपको शांति वार्ता की कोई संभावना नज़र आती है?

मुझे ऐसा नहीं लगता क्योंकि भारत सरकार का रवैया बेहद घमंड भरा है. वे ग़ुरूर की भाषा बोल रहे हैं, डराने की भाषा बोल रहे हैं. ऐसे में मैं उनसे कोई उम्मीद कैसे रखूं?

भारत की अवाम से कुछ कहना चाहेंगे?

मैं हिंदुस्तानी अवाम से अपील करता हूं कि कश्मीर को हिंदुस्तानी मीडिया की नज़र से न देखे. अगर आप कश्मीर को देखना-समझना हैं तो यहां आइए. कश्मीरी अमनपसंद लोग हैं. हमारे अपना फ़ैसला लेने का लोकतांत्रिक हक़ भारतीय सरकार द्वारा छीना जा रहा है. हम बस इस हक़ को वापस मांग रहे हैं और इसके बदले में हमें मारा जा रहा है. अगर कोई असल में दक्षिण एशिया में अमन लाना चाहे तो इससे हिंदुस्तान, पाकिस्तान और कश्मीर सबका भला होगा.

आपकी नज़र में कश्मीरी चुनावी प्रक्रिया को किस तरह देख रहे हैं? श्रीनगर उपचुनाव में महज़ 7% मतदान हुआ और अब अनंतनाग में चुनाव अनिश्चितकाल तक स्थगित कर दिया गया है.

सरकार हमेशा चुनावों को यह कहकर इस्तेमाल करती है कि कश्मीरी जनता भारतीय सरकार से संतुष्ट है. चुनावी प्रक्रिया के समय सभी प्रमुख पार्टियां लोगों से कहती हैं कि वोटिंग का कश्मीर विवाद से कोई लेना-देना नहीं है, ये सिर्फ बिजली-पानी-सड़क के लिए है. इस तरह इन लोगों का असली चेहरा लोगों के सामने आ जाता है, जिससे लोगों को पता चल जाता है कि ये असल में भारतीय सरकार के ही साथी हैं. यही वजह है कि उन्होंने उपचुनाव का बहिष्कार करने का फ़ैसला लिया. ये भारत सरकार को सीधा संदेश भी है कि कश्मीरियों को अपनी आज़ादी का यह आंदोलन बहुत प्यारा है और इसे भारत सरकार की इस चुनावी प्रक्रिया से नहीं दबाया जा सकता.

श्रीनगर उपचुनावों के समय शुरू हुई अशांति अब भी कई रूपों में जारी है. कश्मीर के शैक्षणिक संस्थानों में भी आए दिन विरोध-प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं. इसकी क्या वजह है?

यह बदक़िस्मती ही है कि भारतीय सुरक्षा बलों ने छात्रों को भी नहीं बख्शा है. उन्होंने पुलवामा डिग्री कॉलेज में घुसकर कई विद्यार्थियों को बुरी तरह पीटा, जिसकी वजह से पूरे कश्मीर के स्कूलों और कॉलेजों के बच्चे सड़क पर उतर आए. देखिए उन्हें सड़कों पर कितनी बुरी तरह से पीटा गया है! एक छात्रा बुरी तरह से घायल है और आईसीयू में भर्ती है. उसे सीधे सीआरपीएफ के लोगों ने मारा है. 400 से ज़्यादा छात्र घायल हैं. कश्मीर के विद्यार्थियों के साथ भारतीय सुरक्षा बलों ने ये किया है. ये वही राज्य है जिसके बारे में कहा जाता है कि वे (सरकार) कश्मीरियों की शिक्षा को लेकर काफ़ी चिंतित हैं. अब उन्होंने कॉलेज बंद कर दिए हैं, फिर से इंटरनेट और सोशल मीडिया बंद कर दिया गया है.

मागा. तमिज़ प्रभागरण पत्रकार और डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्देशक हैं.

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