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संपादकीयः नफ़रत भरी चुनावी राजनीति पर चुनाव आयोग की चुप्पी भी अपराध है

चुनाव आयोग का संवैधानिक दायित्व केवल आदर्श आचार संहिता ही नहीं बल्कि जनप्रतिनिधि क़ानून को भी बरक़रार रखना है, जिसके तहत प्रधानमंत्री सहित विभिन्न भाजपा नेताओं के नफ़रत भरे भाषण अपराध की श्रेणी में आते हैं.

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(फोटोः रॉयटर्स/अमित दवे)

लोकसभा चुनाव के लिए चुनाव अभियान की शुरुआत होते ही भाजपा ने हिंदू भावनाओं को उभारा है और मुसलमानों को निशाना बनाया है. भाजपा ने जानबूझकर डर और घृणा की भाषा का इस्तेमाल कर ‘बांग्लादेशियों’ को निशाना बनाया है, जो ऐसा लगता है कि मुसलमानों का पूरक बन गए हैं.

सभी बांग्लादेशी प्रवासियों को ‘घुसपैठिया’ बताकर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने असम और बाकी भारत में चिंता के माहौल को और गहरा कर दिया है.  इस तरह की नफ़रत की भाषा अक्सर भीड़ को उकसाती है, जो लगातार देशभर के निर्दोष मुसलमानों पर घातक हमले करते रहे हैं, जिनके होने से लगता है कि केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता.

भाजपा के इस अभियान के पीछे उनकी आक्रामक और अराजकतावादी राष्ट्रवाद के लिए उनकी प्रतिबद्धता है, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अवधारणा के अनुरूप है. बीते दिनों भाजपा ने अपना घोषणा-पत्र ‘संकल्पित भारत-सशक्त भारत‘ जारी किया, जिसमें राष्ट्रवाद को अपनी प्रेरणा बताते हुए संविधान की धारा 370 और जम्मू कश्मीर से धारा 35ए हटाने, सांप्रदायिक नागरिकता (संशोधन) विधेयक को पारित करने, अयोध्या में राम मंदिर बनाने का वादा किया.

इनमें से हरेक वादा संभावित संघर्ष से भरा हुआ है, जो विशेष रूप से भारत के मुसलमानों के लिए हैं.

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अपनी ख़तरनाक विभाजनकारी रणनीति को जारी रखते हुए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने पश्चिम बंगाल के रायगंज की एक रैली में बांग्लादेशी प्रवासियों को ‘दीमक’ कहा था. उन्होंने कहा था, ‘ये अवैध प्रवासी दीमक हैं. ये वो अनाज खा रहे हैं, जो गरीबों को मिलना चाहिए, ये हमारी नौकरियां छीन रहे हैं.’

अमित शाह ने अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने के अलावा सभी बांग्लादेशियों को पश्चिम बंगाल के अवैध प्रवासी करार दिया. यह पहली बार नहीं है, जब हमने बंगाल में अमित शाह का इतना खतरनाक प्रोपेगैंडा सुना.

अमित शाह ने दो महीने पहले सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील जिले मालदा में एक रैली को संबोधित करते हुए कहा कि बंगाल सरकार लोगों को सरस्वती पूजा मनाने की मंजूरी नहीं दे रही. मुहर्रम पर दुर्गा की मूर्तियों के विसर्जन को मंजूरी नहीं देने के ममता बनर्जी के फैसले पर भाजपा अध्यक्ष ने भीड़ से सवाल किया, ‘हमारी दुर्गा की मूर्तियों का विसर्जन करने हम कहां जायेंगे? पाकिस्तान?’

यह सब इशारा करते हैं कि भाजपा चुनावी रूप से महत्वपूर्ण बंगाल और पूर्वोत्तर में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच की खाई को और गहरा करना चाहती है. इसे हासिल करने के लिए पार्टी तीन भावनात्मक मुद्दों का इस्तेमाल कर रही है, जिसमें नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन (एनआरसी), नागरिकता संशोधन विधेयक और बांग्लादेशियों का पलायन शामिल है.

इनमें से हर एक मुद्दा ध्रुवीकरण करने वाला है, जिसका उद्देश्य विभिन्न समुदायों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करना है- फिर चाहे वह हिंदू बनाम मुसलमान या बाहरी बनाम अंदरूनी ही क्यों न हो.

42 लोकसभा सीटों वाला पश्चिम बंगाल उन प्रमुख राज्यों में से है, जहां भाजपा बहुत ध्यान दे रही है. बंगाल में 2014 के चुनाव से पहले भाजपा की चुनावी मौजूदगी बमुश्किल ही थी, लेकिन इन पांच सालों के भीतर पार्टी बंगाल में प्रमुख विपक्षी दल के रूप से उभरी है, जो पार्टी की विभाजनकारी, मुस्लिम विरोधी प्रचार का ही असर है.

केंद्र और राज्य नेतृत्व ने बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर ‘तुष्टिकरण की राजनीति’ करने और ‘अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों’ को पनाह देने पर सवाल खड़ी करती रही है. भाजपा यकीनन इस राज्य में आग से खेल रही है, जिसकी विरासत सांप्रदायिक हिंसा की रही है.

हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि भाजपा की एक संप्रदाय को दूसरे के ख़िलाफ़ भड़काने, बहुसंख्यक समुदाय को अल्पसंख्यक समुदाय के विरुद्ध खड़ा करने की रणनीति किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है. यह पूरी तरह वैचारिक और चुनावी रणनीति है, जिसे पार्टी ने अंगीकार किया है.

जैसे-जैसे हम चुनावों में आगे बढ़ते हैं, भाजपा की यह बयानबाजी हमें सोचने पर मजबूर कर देती है कि पार्टी का एजेंडा क्या है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदर्भ क्षेत्र के वर्धा में हुई रैली में दिए विभाजनकारी भाषण को कौन भूल सकता है, जिसमें ‘पूरी दुनिया के सामने हिंदुओं के अपमान’ की बात कहकर मोदी ने कांग्रेस पर जमकर हमला बोला था.

साथ ही वायनाड से चुनाव लड़ने के राहुल गांधी के फैसले पर उनका यह कहना कि ऐसा इसलिए है क्योंकि वायनाड एक ऐसा निर्वाचन क्षेत्र है, जहां ‘अल्पसंख्यक बहुमत में हैं,’ भारत के संविधान को प्रत्यक्ष ख़तरा तो है, साथ ही इसके मूल्यों को कमज़ोर करने वाला भी है.

चुनाव आयोग का संवैधानिक दायित्व केवल आदर्श आचार संहिता को बनाए रखना ही नहीं बल्कि जनप्रतिनिधि कानून को बनाए रखना भी है, जिसके तहत मोदी के इस तरह के भाषण अपराध हैं. इस निरंतर घृणा-द्वेष भरी चुनावी राजनीति के बीच चुनाव आयोग की चुप्पी वर्तमान आम चुनाव के सबसे खतरनाक पहलुओं में से एक है.

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