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जब राजमाता सिंधिया के ‘धर्मपुत्र’ ने उनके समर्थन के बावजूद उनके बेटे से शिकस्त खाई

चुनावी बातें: 1984 में भाजपा से अटल बिहारी वाजपेयी और कांग्रेस से माधवराव सिंधिया ग्वालियर से मैदान में थे, जिससे विजयाराजे सिंधिया के सामने पार्टी व पुत्र के बीच चुनाव का धर्मसंकट आ खड़ा हुआ था. उस पर अटल बिहारी ने ख़ुद को उनका धर्मपुत्र बताकर इस दुविधा को और बढ़ा दिया था.

विजयाराजे सिंधिया के साथ अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मदनलाल खुराना और अन्य नेता (फाइल फोटो: पीआईबी)

विजयाराजे सिंधिया के साथ अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मदनलाल खुराना और अन्य नेता (फाइल फोटो: पीआईबी)

1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के अटल बिहारी वाजपेयी मध्य प्रदेश की ग्वालियर सीट से उम्मीदवार थे और कांग्रेस ने उनके खिलाफ उन्हीं की पार्टी की राजमाता विजयाराजे सिंधिया के पुत्र माधवराव सिंधिया को खड़ा कर रखा था.

इस चुनाव में कांग्रेस सहानुभूति की लहर पर सवार थी, तो राजमाता के सामने पार्टी व पुत्र के बीच चुनाव का धर्मसंकट आ खड़ा हुआ था. अटल ने खुद को उनका धर्मपुत्र बताकर इस संकट को और बढ़ा दिया था, जबकि ग्वालियरवासियों का कहना था कि राजमाता के लिए पुत्र और धर्मपुत्र में से एक का चुनाव आसान नहीं होगा.

लेकिन 1980 के लोकसभा चुनाव में रायबरेली जाकर श्रीमती इंदिरा गांधी को उनके गढ़ में चुनौती दे चुकी राजमाता इस धर्मसंकट से जल्दी ही उबर गईं और धर्मपुत्र का प्रचार करने निकल पड़ीं.

यह लगभग वैसी ही बात थी जैसे इलाहाबाद के ऐतिहासिक उपचुनाव में विश्वनाथ प्रताप सिंह और सुनील शास्त्री आमने-सामने हुए तो दिवंगत प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की पत्नी श्रीमती ललिता शास्त्री ने अपने बेटे सुनील के बजाय पुत्रवत विश्वनाथ प्रताप सिंह को आशीर्वाद दिया था.

अलबत्ता, वे यह जोड़ना भी नहीं भूली थीं कि बेटों को माताओं को ऐसे जलते हुए क्षणों से नहीं गुजारना चाहिए.

खैर, विपरीत राजनीतिक हवा के बावजूद अटल खुश थे कि उन्होंने सिंधिया राजघराने के प्रति लोगों की निष्ठा को मां और बेटे के बीच बांटने में सफलता पा ली है, जिसका लाभ उन्हें मिलेगा लेकिन चुनाव नतीजे ने उन्हें बेहद निराश किया और मतगणना में माधवराव सिंधिया ने उन्हें बड़े अंतर से हरा दिया.

लेकिन ‘लखनऊ के दामाद’ को हराया

जो अटल 1984 में राजमाता के धर्मपुत्र बनकर भी उनके ‘राजकुमार’ यानी पुत्र के खिलाफ ग्वालियर का दिल नहीं जीत सके, वही 1966 में लखनऊ में उसके दामाद से कड़ी टक्कर में फंसे तो शानदार विजय पायी.

दरअसल 1991 में राममंदिर की लहर पर चढ़कर लखनऊ के सांसद बने अटल दुबारा वहीं से उम्मीदवार बने तो भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार भी बन गये थे. इस कारण उनकी जीत बहुत आसान समझी जा रही थी.

भला कौन-सा शहर है जिसे प्रधानमंत्री चुनने का मौका मिलेगा तो वह सांसद चुनकर रह संतोष कर लेगा? लेकिन समाजवादी पार्टी ने अंतिम क्षणों में उनके खिलाफ लोकप्रिय फिल्म अभिनेता राजबब्बर को प्रत्याशी बनाकर पेंच फंसा दिया और अटल की बेहद आसान नजर आ रही जीत को कांटे के मुकाबले में बदल दिया.

प्रसंगवश, लखनऊ से राजबब्बर का एक रिश्ता दामाद का भी है. स्वतंत्रता सेनानी सज्जाद जहीर के घर की बेटी नादिरा के पति होने के कारण वे ‘लखनऊ के दामाद’ के रूप में पहचाने जाते हैं. अटल के समर्थकों ने उनकी काट के लिए अटल को ‘लखनऊ का लाडला’ कहना शुरू कर दिया.

फिर भी हार का अंदेशा कम होता नहीं दिखाई दिया तो सलाह दी गई कि अटल को किसी और सुरक्षित सीट से भी चुनाव लड़वा दिया जाये. अटल ने सलाह मान ली और गुजरात जाकर वहां की बहुचर्चित गांधीनगर सीट से भी परचा भर आये.

लखनऊ की सीट उनके लिए फिर भी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनी रही. इसलिए उन्होंने स्टार प्रचारक के तौर पर देशभर से आ रही अपनी मांग की उपेक्षा करके प्रचार के आखिरी चार दिन लखनऊ में ही जमे रहने का फैसला किया और कोई सवा लाख वोटों से राजबब्बर को हराने में सफल हुए.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

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