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अगर मोदी मुस्लिम महिलाओं को उनका हक़ दिलाना चाहते हैं तो बिलकिस को इंसाफ क्यों नहीं दिलाया?

बिलकिस बानो को इंसाफ मिल पाया क्योंकि शेष भारत और देश की अन्य संस्थाओं में अभी अराजकता की वह स्थिति नहीं है, जिसे नरेंद्र मोदी ने अपने गृह राज्य गुजरात में प्रश्रय दिया था. पर अब धीरे-धीरे यह अराजकता प्रादेशिक सीमाओं को तोड़कर राष्ट्रीय होती जा रही है.

BilkisModi Reuters

बिलकिस बानो और नरेंद्र मोदी (फोटो: रॉयटर्स)

पिछले महीने एक भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि वे चाहते हैं कि मुस्लिम महिलाओं को उनके वे सब हक़ मिलें जो भारतीय संविधान उन्हें देता है. पर बिलकिस बानो के साथ जो हुआ वो याद दिलाता है कि मोदी हमेशा से ऐसा नहीं चाहते थे.

जैसे ही प्रधानमंत्री को लगा कि 2002 की कड़वी यादें उनका पीछा छोड़ चुकी हैं, तब ही बॉम्बे हाईकोर्ट ने 2002 में गोधरा दंगों के समय बिलकिस बानो के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के मामले में अपना फैसला सुना दिया.

कोर्ट ने बिलकिस के बलात्कार और लिमखेड़ा में 14 मुसलमानों की हत्या के मामले में 11 दोषियों की उम्रक़ैद की सज़ा बरक़रार रखी. साथ ही कोर्ट ने उन पुलिसवालों और डॉक्टरों को भी दोषी माना है, जिन्होंने इस अपराध को छुपाने की कोशिश की थी. उस साल गोधरा में हुई हिंसा के बाद हुए अपराधों में यह सबसे नृशंस अपराध था.

यहां यह जान लेना भी ज़रूरी हो जाता है कि बिलकिस के मामले की जांच सीबीआई द्वारा की गई थी न कि गुजरात पुलिस द्वारा, साथ ही इस मामले की सुनवाई भी मुंबई में हुई क्योंकि सुप्रीम कोर्ट का यह मानना था कि गुजरात में इस मामले की निष्पक्ष सुनवाई संभव नहीं है.

यहां भाजपा का सवाल होगा कि सिवाय इस तथ्य के कि यह घटना मोदी के मुख्यमंत्री रहते हुई, इस बात का मोदी से क्या लेना-देना है? आख़िर मुस्लिमों के ख़िलाफ़ हिंसा करवाने के जो आरोप मोदी पर लगे थे, सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित की गई विशेष जांच समिति (एसआईटी) को इस मामले में उनका हाथ होने के कोई प्रमाण नहीं मिले.

हालांकि एसआईटी के इस विवादित जांच-परिणाम पर ज़किया जाफ़री ने अपील की है पर इससे यह सच नहीं बदल जाता कि 2013 में एसआईटी ने मोदी को इस मामले में क्लीन चिट दी थी. सिर्फ गुजरात हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट ही इस सच को बदल सकते हैं.

भाजपा अगर ऐसा मानती है तो वह सही है, लेकिन एक तरह से यह ग़लत भी है.

मोदी वो पहले भारतीय नेता नहीं हैं जिस पर सामूहिक हत्या में हाथ होने जैसे संगीन आरोप लगे हैं. 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़के दंगों के समय दिल्ली पुलिस प्रधानमंत्री राजीव गांधी और गृहमंत्री नरसिम्हा राव के सीधे नियंत्रण में थी, पर उन्होंने राष्ट्रीय राजधानी में मारे गए हज़ारों सिखों को बचाने का कोई प्रयास नहीं किया.

दिल्ली और गुजरात में हुई बर्बादी में बहुत-सी समानताएं हैं- शीर्ष पर बैठे लोगों सहित नेताओं का भड़काऊ बयान देना, ग़ुंडों का राजनीति से जुड़ना, हमले के समय पुलिस का अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी से बचना, इन हत्याओं में शामिल नेताओं को इनाम के रूप में कैबिनेट में जगह मिलना (चाहे वो एचकेएल भगत हों या माया कोडनानी).

हालांकि इस हिंसा में मोदी की आपराधिक सहभागिता का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण तो मौजूद नहीं है पर उन्होंने कई बार अपने इस अपराध की पुष्टि की है. कैसे? वे लगातार एक ऐसी सरकार के प्रमुख थे, जिसने इस अपराध के दोषियों को बचाने के लिए हरसंभव प्रयास किया, जिसकी लगातार कोशिश रही कि पीड़ितों को इंसाफ न मिले. कोई नेता जिसके पास कुछ छुपाने को नहीं होता, इस तरह का व्यवहार नहीं करता.

इसका पहला प्रमाण बिलकिस बानो हैं.

इंसाफ का लंबा संघर्ष

27 फरवरी 2002  को गोधरा के ट्रेन हादसे में 47 हिंदू यात्रियों की मौत के बाद गुजरात के कई हिस्सों में मुस्लिमों के ख़िलाफ़ सामूहिक हिंसा शुरू हुई. इसी हिंसा से बचने के लिए 3 मार्च को बिलकिस और उनका परिवार घर छोड़कर जा रहे थे, जब उन्हें हमलावरों ने घेर लिया.

बिलकिस उस वक़्त 5 माह की गर्भवती थीं, फिर भी उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया. उनके साथ जा रही परिवार की अन्य महिलाएं भी इसी दरिंदगी का शिकार बनीं. उनकी 3 साल की बच्ची सहित उनके परिवार के 13 लोगों को मार डाला गया.

जैसे-तैसे बिलकिस पुलिस थाने पहुंचीं, तो पुलिस ने उनकी एफआईआर में हमलावरों के नाम लिखने से मना कर दिया. इसके साल भर बाद, मार्च 2003 में लिमखेड़ा की स्थानीय अदालत ने उनकी शिकायत यह कहते हुए बंद कर दी कि इसमें ‘विसंगतियां’ हैं.

इसके बाद बिलकिस राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग पहुंचीं, जिसने उनकी आवाज़ सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचाई. मामला जैसे ही सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, वैसे ही गुजरात पुलिस एक्शन में आ गई… दोबारा जांच शुरू करके बिलकिस की मदद के लिए नहीं, बल्कि उन्हें और उनके परिवार को डराने-धमकाने के लिए.

पुलिस की यह ज़्यादती इतनी बढ़ी कि 25 सितंबर 2003 को सुप्रीम कोर्ट गुजरात पुलिस को पीड़ित परिवार से दूर रहने का आदेश देने के लिए मजबूर हो गया. फिर आख़िरकार, दिसंबर 2003 में सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की एक बेंच ने गुजरात सरकार और पुलिस के प्रति अविश्वास ज़ाहिर करते हुए सीबीआई से इस मामले की जांच करने के लिए कहा.

‘कहीं भी पर गुजरात नहीं’

सीबीआई ने तेज़ी से और पेशेवर तरीके से मामले की जांच शुरू की. उन्होंने 19 अप्रैल 2004 को गुजरात पुलिस के 6 अधिकारियों और 2 सरकारी डॉक्टरों सहित 20 लोगों के ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर की.

12 मई 2004 को सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट को अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपी, जिसमें मार्च 2002 में हुए अपराध के बाद इसे छुपाने की लीपापोती में गुजरात सरकार की भागीदारी की बात कही गई थी.

इस रिपोर्ट में कही गई सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि इसमें मामले की सुनवाई गुजरात से बाहर करवाए जाने के बारे में कहा गया था.

सीबीआई के मुताबिक इस मामले की सुनवाई के लिए गुजरात सरकार, जिसकी कमान उस वक़्त नरेंद्र मोदी के हाथ में थी, पर भरोसा नहीं किया जा सकता था.

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर अपनी सहमति व्यक्त की और 6 अगस्त 2004 को मामले की सुनवाई गुजरात की बजाय महाराष्ट्र में करने का आदेश दिया. इसके बाद 18 जनवरी 2008 में कोर्ट ने 20 अभियुक्तों में से 13 को दोषी ठहराया, (इस समय तक एक अभियुक्त की मृत्यु हो गई थी) पर पांच पुलिस अधिकारियों और दोनों डॉक्टरों को बरी कर दिया गया.

इसके ख़िलाफ़ सीबीआई ने बॉम्बे हाईकोर्ट में अपील की, जहां 4 मई 2017 को दिए गए फ़ैसले में कोर्ट ने न केवल 11 अभियुक्तों की सज़ा बरक़रार रखी बल्कि पांचों पुलिस अधिकारियों और दोनों डॉक्टरों को बरी करने के फ़ैसले को भी पलट दिया.

फ़ैसले के बाद 4 मई को बिलकिस ने कहा, ‘मुझे खुशी है कि सरकार और इसके अधिकारी, जिन्होंने दोषियों की हिम्मत बढ़ाई, उन्हें बचाया, उन्हें अब निर्दोष नहीं कहा जाएगा. उन्होंने एक पूरे समुदाय की ज़िंदगी बर्बाद कर दी. आज यह भी साबित हो गया कि उन्होंने सबूतों के साथ भी छेड़छाड़ की थी. सरकार के जिन अफसरों पर लोगों की सुरक्षा और उन्हें इंसाफ़ दिलाने की ज़िम्मेदारी होती है, उनके लिए ये बेहद शर्म की बात है, जिसका बोझ उन्हें हमेशा उठाना होगा.’

सीबीआई नहीं था ‘सरकारी पिंजरे में क़ैद तोता’

इस बात को समझने के लिए थोड़ा पीछे लौटते हैं. जिस समय में सीबीआई ने अपनी जांच की, उस दौरान केंद्र में भाजपा की सरकार थी. सो इस समय इस संस्था पर ‘सरकारी तोता’ होने या यूं कहें कि कांग्रेस के इशारों पर चलने का आरोप भी नहीं लगाया जा सकता.

वैसे हमारे देश में जांच एजेंसियां सत्तारूढ़ दल के हितों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में हिचकती हैं, उस पर राज्य सरकार द्वारा बिलकिस मामले में बाधा डालने के प्रयास जगज़ाहिर ही थे, ऐसे में सीबीआई अगर ऐसा कुछ करना भी चाहती तो यह मुश्किल होता.

इसके अलावा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग यानी वह संस्था जिसने मोदी सरकार के जान-बूझकर किसी नागरिक के संवैधानिक अधिकारों के हनन को सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, की ज़िम्मेदारी इस दौरान जस्टिस जेएस वर्मा (1999-2003) और जस्टिस एएस आनंद (2003-2006) ने संभाली थी.

अध्यक्ष पद पर इन दोनों की ही नियुक्ति अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार द्वारा की गई थी. दिलचस्प यह भी है कि जस्टिस वर्मा वही जज हैं, जिनकी एक फ़ैसले के संदर्भ में कही ‘हिंदुत्व जीवन जीने का एक सलीका है’ (हिंदुत्व इज़ अ वे ऑफ लाइफ) वाली बात भाजपा कहते नहीं अघाती.

यह बताने की वजह बस इतनी है कि कहीं इन तथ्यों को ‘सूडो-सेक्युलर षड्यंत्र’, ‘मोदी के प्रति नफ़रत’ या ‘कांग्रेसी एजेंडा’ कहकर ख़ारिज न कर दिया जाए.

मोदी का हृदय परिवर्तन?

प्रधानमंत्री के रूप में मोदी आज भले ही कुछ भी कहें, पर इतिहास गवाह है कि गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उनके ‘सबका साथ-सबका विकास’ नारे के मायने कुछ और ही थे.

आज गोधरा की घटना के 15 साल बाद यह कहना अच्छा लग सकता है कि मोदी का हृदय परिवर्तन हो चुका है. पर सच यही है कि ऐसा नहीं है.

वे मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक़ के बुरे साये से बचाने के बारे में तो बात करते हैं पर आज तक उनका पहलू ख़ान और मोहम्मद अखलाक़ की बेवाओं से हमदर्दी के दो बोल कहना बाकी है, जिनकी ज़िंदगियां कथित ‘गौरक्षकों’ की हिंसा से बर्बाद हो गईं.

वे बात-बात में संविधान का हवाला देते हैं, पर ऐसे व्यक्ति को देश के सबसे बड़े प्रदेश का मुखिया चुनते हैं, जिसकी महिलाओं और मुसलमानों के प्रति नफ़रत स्पष्ट तौर पर दर्ज है.

वे खुद को ‘पैदाइशी हिंदू’ और ‘राष्ट्रवादी’ कहते हैं पर जब जम्मू कश्मीर के रियासी में ‘जय श्री राम’ और ‘भारत माता की जय’ कहती बेक़ाबू भीड़ तीन बेबस मुस्लिम महिलाओं पर हमला करती है, तब भी वे चुप्पी साधे रहते हैं.

राजस्थान से उत्तर प्रदेश, जम्मू से झारखंड, जहां भी भाजपा सत्ता में है, वहां हिंसा के लिए आतुर लोगों के प्रति वही नरमी और अल्पसंख्यक पीड़ितों की ओर वही उदासीनता देख सकते हैं, जो गुजरात में मोदी राज के समय राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, सीबीआई और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी देखी थी.

बिलकिस बानो को इंसाफ मिल पाया क्योंकि शेष भारत और देश की अन्य संस्थाओं में अभी अराजकता की वह स्थिति नहीं है, जिसे नरेंद्र मोदी ने अपने गृह राज्य गुजरात में प्रश्रय दिया था. पर अब धीरे-धीरे यह अराजकता प्रादेशिक सीमाओं को तोड़कर राष्ट्रीय होती जा रही है.

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