भारत

सीजेआई गोगोई को क्लीनचिट देने वाली रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए: पूर्व सूचना आयुक्त

पूर्व सूचना आयुक्त श्रीधर आचार्युलु कहा, ‘जनहित का मामला लोगों को जानने का अधिकार देता है. इसलिए यौन उत्पीड़न के मामले में जो जानकारी सार्वजनिक नहीं की जानी चाहिए, उसे छिपाते हुए आंतरिक समिति द्वारा दिए गए फैसले की रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए.’

सूचना आयुक्त श्रीधर आचार्युलु. (फोटो: धीरज मिश्रा/द वायर)

सूचना आयुक्त श्रीधर आचार्युलु. (फोटो: धीरज मिश्रा/द वायर)

नई दिल्ली: पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त श्रीधर आचार्युलु ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को यौन उत्पीड़न मामले में क्लीनचिट देने वाली आंतरिक समिति की रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए.

उन्होंने कहा कि आंतरिक जांच समिति द्वारा लिए गए निर्णय को सार्वजनिक न करने का कोई कारण या कानून आधार नहीं है.

आचार्युलु ने कहा, ‘इस देश के लोगों को सूचित किया जाता है कि तीन न्यायाधीशों वाली सुप्रीम कोर्ट की आंतरिक समिति ने भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर एक पूर्व कर्मचारी द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों में कोई दम नहीं होने का दावा करते हुए क्लीनचिट दे दी.’

उन्होंने कहा कि मुख्य न्यायाधीश और अन्य लोगों के मुताबिक इन आरोपों के पिछे एक बड़ा षड्यंत्र है.

पूर्व सूचना आयुक्त ने कहा, ‘जनहित का मामला लोगों को जानने का अधिकार देता है. इसलिए यौन उत्पीड़न के मामले में जो जानकारी सार्वजनिक नहीं की जानी चाहिए, उसे छिपाते हुए आंतरिक समिति द्वारा दिए गए फैसले की रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए.’

मालूम हो कि बीते सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की आंतरिक जांच समिति ने भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को यौन उत्पीड़न के आरोप पर क्लीनचिट दे दी. सुप्रीम कोर्ट के दूसरे वरिष्ठतम जज जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस इंदु मल्होत्रा इस जांच समिति की सदस्य थे.

सुप्रीम कोर्ट के महासचिव द्वारा जारी विज्ञप्ति में कहा गया है कि आंतरिक समिति ने पांच मई 2019 को इस मामले में जांच रिपोर्ट सौंपा था. पत्र में कहा गया, ‘आंतरिक समिति ने पाया कि 19 अप्रैल 2019 को सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व कर्मचारी द्वारा लगाए गए आरोपों में कोई दम नहीं है.’

महासचिव ने ‘इंदिरा जयसिंह बनाम सुप्रीम कोर्ट एवं अन्य’ के एक मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए कहा कि ये जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की जा सकती है.

पूर्व सूचना आयुक्त ने कहा कि रिपोर्ट का प्रकाशन इस मामले में किसी भी आरोपी या किसी अन्य व्यक्ति की जांच या अभियोजन को प्रभावित करेगा और न ही इसे सूचना के अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत छिपाया जा सकता है.

उन्होंने कहा, ‘जब बलात्कार के मामले में अदालतों द्वारा दिए गए फैसले को पीड़िता के नाम का उल्लेख किए बिना, गवाहों की जांच के सभी विवरणों और उनकी जिरह के साथ सार्वजनिक किया जा सकता है, तो आंतरिक जांच समिति की रिपोर्ट को रोकने का कोई कारण या कानूनी आधार प्रतीत नहीं होता है.’

मालूम हो कि सुप्रीम कोर्ट की एक पूर्व कर्मचारी ने सुप्रीम कोर्ट के 22 जजों को पत्र लिखकर आरोप लगाया था कि सीजेआई जस्टिस रंजन गोगोई ने अक्टूबर 2018 में उनका यौन उत्पीड़न किया था.

35 वर्षीय यह महिला अदालत में जूनियर कोर्ट असिस्टेंट के पद पर काम कर रही थीं. उनका कहना है कि चीफ जस्टिस द्वारा उनके साथ किए ‘आपत्तिजनक व्यवहार’ का विरोध करने के बाद से ही उन्हें, उनके पति और परिवार को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है.

(समाचार एजेंसी पीटीआई की इनपुट के साथ)