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बीते पांच सालों में कितना बना-बिगड़ा बनारस

ग्राउंड रिपोर्ट: 2014 में वाराणसी लोकसभा सीट से सांसद बने नरेंद्र मोदी एक बार फिर यहां से चुनावी मैदान में उतरे हैं. उनके कार्यकाल और बनारस में हुए बदलावों के बारे में क्या सोचती है बनारस की जनता?

Varanasi Ghat Reuters

वाराणसी का दशाश्वमेश घाट (फोटो: रॉयटर्स)

वाराणसी: पांच साल पहले जब नरेंद्र मोदी वाराणसी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने के लिए आए तो उन्होंने वादा किया था कि वो काशी को क्योटो बना देंगे. वाराणसी वालों ने इन वादों पर न सिर्फ नरेंद्र मोदी सिर्फ जिताया नहीं, बल्कि लाखों वोटों के अंतर से जिताया.

अब पांच साल बीत चुके हैं और नरेंद्र मोदी दूसरी बार वाराणसी से चुनाव मैदान में उतर रहे हैं, क्या सोचती है वाराणसी की जनता मोदी सरकार और बनारस में हुए बदलावों के बारे में?

वाराणसी के सबसे मशहूर इलाकों में से एक मलदहिया के हार्डवेयर व्यापारी रतन लाल का कहना है, ‘जब से मोदी सरकार आई है तब से काम होना शुरू हुआ है. बनारस बदल रहा है. ऐसा लग रहा है कि हम किसी बड़े शहर में आ गए हैं. मोदी सरकार के आने के बाद शहर में कितने बदलाव देखने को मिले रहे हैं.’

रतन लाल आगे कहते हैं, ‘कोई भी चीज तुरंत तो होता नहीं है, जब हम कोई बिल्डिंग बनाते हैं उस बिल्डिंग को हमें जितना मजबूत बनाना होता है उसे जितनी ऊंचाई पर बनाना होता है उतना ही गहराई भी बनाते हैं. मोदी सरकार भी काम कर रही है. सब कुछ अचानक तो नहीं दिखने लगेगा. आजकल हर छोटे से छोटे लोग के हाथ में मोबाइल हो गया है. रिक्शा चलाने वाले भी आजकल स्मार्ट फोन और मोबाइल का इस्तेमाल कर रहे हैं. लोग समझदार हो रहे हैं. ऐसा नहीं कि ये सभी लोग पढ़े लिखे हैं लेकिन अब लोग पुराने नहीं रहना चाहते. लोग ज़िंदगी में आगे बढ़ना चाहते हैं. ये सब मोदी जी की ही देन है क्योंकि मोदी जी ने कहा है कि ‘टेक्निक का जमाना’ है.’

रतन लाल पाइप बेल्ट (मशीन के बेल्ट) और लोहे के सामान के भी विक्रेता हैं, सामान की सप्लाई न सिर्फ बनारस बल्कि आसपास के जिले में भी होती है. वे कहते हैं, ‘मोदी सरकार ने जीएसटी शुरू किया है सब काम कागज से हो रहा है. गरीब को कोई दिक्कत नहीं है, बड़े व्यापारी भी सभी काम को जीएसटी के साथ काम कर रहे हैं, अब मैं खुद ही 1% जीएसटी दे रहा हूं. जहां तक बात है घोषणा पत्र की तो, जो भी सरकार आती है केवल बातें करती हैं. घोषणा पत्र तो दिखा देती है लेकिन उसपर कोई भी काम नहीं करता है इससे पहले भी कोई सरकार घोषणा पत्र के हिसाब से काम नहीं की है, मोदी सरकार भी नहीं किए. इससे क्या होता है, कुछ नहीं. फिर भी मोदी जी बनारस में बहुत काम करा दिए.’

भारतीय जनता पार्टी ने अपने पिछले घोषणा पत्र में राम मंदिर निर्माण की बात की थी, वहीं नरेंद्र मोदी ने काशी को क्योटो बनाने का वादा किया था. इस बारे में बात करने पर वाराणसी के हरिश्चंद्र डिग्री कॉलेज के छात्र और एडवोकेट अमित सिंह कहते हैं कि भाजपा ने लगातार काम किया है. बस उसे थोड़ा समय चाहिए. बनारस की सड़कें, यहां की स्थिति में काफी बदलाव आया है. उनका कहना है, ‘मोदी जी को आए सिर्फ पांच साल हुए हैं. इतने में क्या हो पाएगा?’

शहर की मौजूदा स्थिति के बारे में वाराणसी के महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के छात्रसंघ के महामंत्री दिगवंत पाण्डेय कहते हैं, ‘पांच साल बीत गया लेकिन बनारस की कोई सड़क अभी तक ठीक से नहीं बन पाई है. हर सड़क पर खुदाई का काम लगा हुआ है. सिगरा, महमूरगंज, लंका सभी रोड पर हर छह महीने में खुदाई का काम लग जाता है.’

वे कहते हैं, ‘अभी छह महीने पहले मेरे घर के पास (महमूरगंज) में खुदाई का काम हुआ था, अब फिर वहीं पर खुदाई का काम शुरू हो गया है. आखिर ऐसा काम क्यों हो रहा है कि बार-बार एक ही काम करना पड़ रहा है?’

वे रोजगार की कमी पर भी सवाल उठाते हैं. उनका कहना है, ‘हर साल बच्चे पढ़ाई करके निकल रहे हैं लेकिन ये सरकार रोजगार दी नहीं है. बच्चे आखिर क्या करें, कहां जाएं? इस सरकार में बच्चे बेरोजगार हो रहे हैं. आखिर ये (सरकार) कैसे काम कर रहे हैं. कुछ सरकारी कंपनियों को प्राइवेट सेक्टर में दे दिया जा रहा है तो सरकारी नौकरी कैसे लगेगी?’

स्वतंत्र रूप से सामाजिक कार्य करने वाले और आरजीलाइन ब्लॉक के पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य राजुकमार गुप्ता कहते हैं, ‘जब से भाजपा की सरकार आई है तब से सड़कों की हालत काफी खराब हो गई है.’

राजातालाब के रहने वाले करीब 32 साल के राजुकमार यहीं का उदाहरण देते हुए बताते हैं, ‘जब से ये सरकार आई है तब से यहां की जितनी भी अच्छी-ख़ासी सड़कें थी उन्हें भी खोदकर गड्ढायुक्त कर दिया गया है. सड़क पर नाले बनाए जा रहे हैं, जो कि छह महीने से अधूरे पड़े हैं. नाले और सड़क के गड्ढों में पानी सड़कर बजबजा रहा है. लोग बीमार हो रहे हैं. 24 घंटे दुर्घटना की आशंका बनी रहती है, लोग गिरते-पड़ते इस सड़क से गुजरते हैं. इस सड़क पर कई दुर्घटनाएं भी हो चुकी हैं. ट्रक की पहिए धंसने से लेकर एक महिला की मौत तक हो चुकी है.’

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राजातालाब की सड़क (फोटो: रिज़वाना तबस्सुम)

बता दें कि यह सड़क पीएम मोदी के गोद लिए गांव जयापुर जाने के लिए प्रमुख सड़क है. यही सड़क स्थानीय सेवापुरी विधायक नील रतन पटेल नीलू के गांव शहंशाहपुर को जाती है.

एक साल पहले इसी सड़क से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पंचकोशी यात्रा कर चुके हैं, वहीं प्रदेश के उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा ने ‘रन फॉर यूनिटी’ कार्यक्रम के दौरान यहीं से पदयात्रा की थी.

सीएम के यहां आने से एक दिन पहले इस सड़क को पूरी तरह चमका दिया गया था लेकिन सड़क दूसरे दिन ही उखड़ गई, जिसके बाद स्थानीय लोगों ने इसे बनाने के लिए कई बार प्रदर्शन किया.

एसडीएम राजातालाब, डीएम वाराणसी, पीएमओ वाराणसी (रविंद्रपुरी), जनसुनवाई केंद्र पर शिकायत करने के अलावा, मुख्यमंत्री योगी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मेल और ट्वीट किया गया. उसके बाद भी कोई सुनवाई नहीं हुई तो हाईकोर्ट में मुकदमा दाखिल कर दिया गया.

राजकुमार गुप्ता आगे बताते हैं, ‘मोदी सरकार के आने के बाद स्थिति में सुधार तो नहीं हुआ लेकिन हालात और बदतर जरूर हुए हैं. सीवर, पानी, गंदगी, तालाब सभी जगह प्रदूषण ही प्रदूषण है. ये सरकार वाले केवल वादे करते हैं, जुमले बोलते हैं. विकास के नाम पर आए थे , विकास के नाम पर कुछ नहीं. मोदी सरकार हर मोर्चे पर विफल है. इतनी सारी घोषणाएं और जो वादे किए गए, सब खोखले हो गए हैं.’

काशी विश्वनाथ मंदिर के लिए बन रहे कॉरीडोर को लेकर वहां के स्थानीय निवासी और पूजा पाठ के सामान की दुकान लगाने वाले करीब 35 साल के रमेश गुप्ता की बातों और आंखो में एक अलग तरह का विरोध नज़र आ रहा है.

रमेश गुप्ता पहले काशी विश्वनाथ मंदिर के पास रहते थे लेकिन कॉरीडोर बनाने के लिए तोड़े गए मकानों में एक घर उनका भी था. अब वे परिवार के साथ सारनाथ में रह रहे हैं, लेकिन दुकान यहीं लगाते हैं.

क्या उन्हें दुकान लगाने की अनुमति है, कब तक यहां दुकान लगा सकते हैं? इस सवाल पर वे खामोश रहते हैं. रमेश गुप्ता का कहना है, ‘हम लोग कई पीढ़ियों से भाजपा को सपोर्ट करते आए हैं. लेकिन अब भाजपा ने बिना सोचे हम लोगों को बेरोजगार कर दिया. हमारे घर का मुआवजा मिल गया है लेकिन हम तो बेरोजगार हो गए.’

बता दें कि काशी विश्वनाथ मंदिर के पास कॉरीडोर बनाया जा रहा है जिसका उद्देश्य यह है कि लोगों को काशी विश्वनाथ का दर्शन करने में आसानी हो. करीब 40 हजार वर्गमीटर इलाके में बन रहे इस कॉरिडोर पर 600 करोड़ रुपये की लागत आ रही है.

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काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरीडोर के लिए तोड़े गए मंदिर और घर (फोटो: कबीर अग्रवाल/द वायर)

एक ओर जहां पुराने मंदिर और घर तोड़ने पर लोगों ने नाराजगी जाहिर की है, वहीं कुछ लोग इसके समर्थन में भी दिखते हैं. वाराणसी में परचून के सबसे मशहूर गोला बाजार में दुकान लगाने वाले 25 साल के शिवम सिंह कहते हैं, ‘काशी विश्वनाथजी का दर्शन करने में आसानी हो इसलिए मोदी जी कॉरीडोर बना रहे हैं, क्या ये मोदी जी अपने लिए कर रहे हैं? नहीं… हमारे लिए, इस देश की जनता के लिए, विश्व भर से आने वाले पर्यटकों के लिए.’

वाराणसी के इंगलिशिया लाइन-लहुराबीर सड़क के किनारे ठेला (फल) लगाने वाले अनुज कुमार बताते हैं, ‘इस सरकार के आने से किसका फायदा हुआ किसका नुकसान, ये तो हमें नहीं पता लेकिन हां, हम जैसे लोगों की कोई सुनवाई नहीं है. जब भी कोई नेता-मंत्री आते हैं हमें सड़क के किनारे से हटा दिया जाता है.

नोटबंदी के बारे में बात करने पर अनुज कुमार बताते हैं, ‘जिस समय नोटबंदी हुआ था, उस समय कुछ दिन तक बहुत दिक्कत था लेकिन कुछ दिन के बाद सब ठीक हो गया. मोदी जी बोल रहे थे कि नोटबंदी इसलिए किया गया है ताकि काला धन पकड़ा जा सके, लेकिन कुछ तो नहीं हुआ. बस दो चार दिन के लिए खबर आई कि ऐसा हुआ है लेकिन कुछ दिन बाद सब ठीक. जब कुछ होना ही नहीं था तो मोदी जी ऐसा क्यों किए?’

नोटबंदी के बारे में बात करते हुए शक्कर तालाब की रहने वाली 36 साल की शिक्षिका सुमन सोनकर कहती हैं, ‘कोई भी काम जब शुरू होता है तो प्लस-माइनस लगा रहता है. हम मानते हैं कि नोटबंदी से कुछ लोगों को दिक्कत हुई है. लेकिन इस वजह से फ्यूचर कितना ब्राइट होगा इस पर किसी का ध्यान ही नहीं जा रहा है. और सबसे बड़ी बात ये कि काला धन किसी के पास नहीं होगा.’

हालांकि एक सच यह भी है कि नोटबंदी से जमा हुए काले धन को लेकर सरकार की ओर से कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं दिया गया है, साथ ही भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार, नोटबंदी के बाद बंद किए गए 500 और 1000 के नोटों में से 99.3 फ़ीसदी बैंकिंग सिस्टम में वापस लौट आए. इस पर सुमन कहती हैं, ‘ये सब छोटी-मोटी चीज तो लगी रहती है.’

अस्सी घाट पर घूमने के लिए आयी चुरामनपुर (वाराणसी) की करीब 35 साल की गृहिणी शलिनी सिंह मोदी सरकार के बारे में पूछने पर कहती हैं, ‘पुलवामा में जो सैनिक शहीद हुए हैं उसका हमें बहुत दुख है, लेकिन मोदी जी ने पाकिस्तान से बदला लिया है. जिस तरह से बिना किसी को कानों-कान खबर हुए सर्जिकल स्ट्राइक की गई उससे मालूम होता है कि मोदी जी ही इस देश की नैया पार लगा सकते हैं.’

साड़ी का काम करने वाले 27 साल के बुनकर कोटवां के अली सैयद बताते हैं, ‘अभी तक हम लोग केवल दूसरे लोगों से सुनते आ रहे थे कि भाजपा की सरकार थोड़ी मुस्लिम विरोधी है लेकिन अब तो समझ भी आ गया, जब नेता हिंदू-मुस्लिम करेंगे तो आम जनता क्या करेगी? काम की बात करके वोट मांगे तो ठीक लगता है. अब ये सरकार सैनिकों के नाम पर वोट मांग रही है. ये ऐसा कैसे कर सकते हैं?’

अस्सी घाट पर गंगा का नज़ारा देख रहे कुछ लोगों से घाट की सफाई के बारे में बात की, यहां मिली बीएचयू की पोस्ट ग्रेजुएशन की छात्रा प्रिया कहती हैं, ‘पिछले कुछ सालों में यहां बदलाव तो आया है, कुछ हद तक घाट पर साफ-सफाई होने लगी है लेकिन इतनी नहीं हुई कि हम ये कह सकें कि हां घाट साफ हो गए हैं. बस कुछ सुधार हुआ है.’

घाट पर घूमने के लिए आई नरिया (वाराणसी) की रहने वाली 26 साल की संगीता कुमारी कहती हैं, ‘घाट की सफाई तो होती है और कुछ हद तक पहले से स्थिति सुधरी भी है, लेकिन गंगा की सफाई में कोई फर्क नहीं पड़ा है. हमें तो ऐसा लग रहा है कि हर रोज गंगा गंदी ही होती जा रही है.’

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नामांकन दाखिल करने से पहले दशाश्वमेध घाट पर गंगा आरती करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फोटो: पीटीआई)

साथ में खड़े संगीता के दोस्त और एक कॉल सेंटर में काम करने वाले पीयूष वर्मा बताते हैं, ‘जब भाजपा की सरकार बनी तो हमें ऐसा लगा कि बनारस की स्थिति अब सुधरेगी लेकिन वो हमारी गलती थी. पिछले पांच सालों में बनारस सिर्फ तबाह हुआ है.’

गंगा से हाथ मुंह धोकर, आचमन कर निकलती चुनार की करीब 45 साल की उषा जी से जब गंगा सफाई की बात की गई तो उषा जी का कहना है कि पिछले पांच सालों में गंगा की स्थिति काफी बेहतर हुई है. वे कहती हैं, ‘गंगा जी साफ हुई हैं. हम यहां अक्सर आते हैं. घाट बिलकुल चमकने लगे हैं. मोदी जी ने बनारस की तस्वीर बदल दी है.’

जब उन्हें गंगा सफाई से जुड़े कुछ आंकड़े बताए जो कहते हैं कि पिछले तीन सालों में गंगा और मैली हुई हैं, तो इस पर उनका कहना था, ‘मोदी जी गंगा के लिए इतना कर रहे हैं, वो अक्सर यहां आते भी हैं और कोई तो नहीं आया. लगातार यहां पर काम हुआ है. साफ-सफाई सब अच्छी हुई है. मोदी जी ने गंगा सफाई में इतना पैसा भी लगाया है, तो सफाई तो हुई ही न.’

बता दें कि केंद्र की मोदी सरकार द्वारा गंगा सफाई के लिए ‘नमामि गंगे’ जैसी महत्वाकांक्षी परियोजना चलाई जा रही है. इसके तहत 2014 से लेकर जून 2018 तक में गंगा सफाई के लिए 5,523 करोड़ रुपये जारी किए गए, जिसमें से 3,867 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं. लेकिन इसके बावजूद गंगा पिछले पांच साल में प्रदूषित हुई हैं.

वाराणसी के तुलसीघाट स्थित एक गैर सरकारी संस्था संकट मोचन फाउंडेशन (एसएमएफ) की रिपोर्ट के अनुसार, गंगा के पानी में कॉलीफॉर्म और बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड में लगातार बढ़ोतरी हुई है, इससे मालूम चलता है कि गंगा में प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ रहा है.

फाउंडेशन के अध्यक्ष विशंभर नाथ मिश्रा ने बताया कि शहर के कई क्षेत्र में गंगा का पानी पीने के लिए सप्लाई किया जाता है. उन्होंने कहा कि पीने योग्य पानी में कॉलीफॉर्म बैक्टीरिया 50 एमपीएन (मोस्ट प्रोबेबल नंबर- सर्वाधिक संभावित संख्या)/100 मिलीलीटर और नहाने के पानी में 500 एमपीएन/100 मिलीलीटर होना चाहिए जबकि एक लीटर पानी में बीओडी की मात्रा 3 मिलीग्राम से कम होनी चाहिए लेकिन हमारी रिपोर्ट के अनुसार, 2016 में फेकल कॉलीफॉर्म (प्रदूषक) की संख्या 4.5 लाख थी जो बाद में बढ़कर फरवरी 2019 में 3.8 करोड़ हो गई. यानी यह पानी अगर यह पानी शहरवासी पी रहे हैं तो वो सेहत के लिए नुकसान देह है.

उन्होंने आगे कहा कि जब तक गंगा में नाला गिरना बंद नहीं होगा तब तक कैसे गंगा साफ हो पाएंगी. मालूम हो कि अगस्त 2018 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि 15 दिसंबर से कोई भी नाला गंगा नदी में नहीं गिरेगा लेकिन आज भी अस्सी नाला गंगा नदी में ही जा के गिरता है, इसके अलावा खिड़किया नाला भी गंगा में ही गिराया जा रहा है.

संकट मोचन फाउंडेशन के अध्यक्ष के अलावा विशंभर नाथ मिश्रा आईआईटी बीएचयू में प्रोफेसर और संकट मोचन मंदिर में महंत भी हैं. काशी विश्वनाथ कॉरीडोर के बारे में वे कहते हैं, ‘जो वास्तविक बनारसीपन है, वो वहां (काशी विश्वनाथ कॉरीडोर) से समाप्त हो गया है. गलियों के शहर से गलियां ही उजाड़ दी गईं.’

उनका यह भी कहना है कि जितना काम भाजपा सरकार ने किया है, उससे कोई विकास नहीं हुआ है, बल्कि काशी ने अपने को बहुत क्षति पहुंचाई है. वे प्रधानमंत्री मोदी पर तंज़ करते हुए कहते हैं, ‘आपकी मन की बात से आप बनारस डेवलप कर रहे हो, काशी के मन में क्या है उससे कुछ लेना देना नहीं है. तो, ऐसा विकास यहां किस काम का, जिसमें हम सहमत ही न हों.’

(रिज़वाना तबस्सुम स्वतंत्र पत्रकार हैं.)