राजनीति

मोदी-शाह को ममता बनर्जी के रूप में उनकी टक्कर का नेता मिला है

उत्तर प्रदेश के किसी शहर में अमित शाह का रोड शो लोगों के मन में डर और ख़ौफ़ पैदा कर सकता है, लेकिन पश्चिम बंगाल यूपी नहीं है.

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समाज सुधारक ईश्वर चंद्र विद्यासागर की प्रतिमा तोड़े जाने के विरोध में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बुधवार को मार्च निकाला. (फोटो: पीटीआई)

सत्ता भ्रष्ट करती है और असीमित सत्ता पूरी तरह से भ्रष्ट करती है. नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी के ममता बनर्जी के आमने-सामने से यह तो स्पष्ट हो गया है कि किसके पास पूरी ताकत है. कम से कम इस तथ्य पर तो कोई संदेह नहीं रहना चाहिए.

असीमित या निरंकुश ताकत खतरनाक होती है क्योंकि यह आपको लगातार इसका इस्तेमाल करने का इशारा देती रहती है. एक कुशल राजनीतिज्ञ ताकत को हल्के ढंग से प्रयोग करना सीखता है, लेकिन कम अनुभवी नेता इसे हथौड़े की तरह इस्तेमाल करने की गलती कर बैठते हैं, जिसका प्रभाव अपने आप ही बड़े पैमाने पर लोगों तक पहुंच जाता है.

भला हो चुनाव आयोग के अप्रत्याशित आदेश का, जिसने पश्चिम बंगाल की लोकसभा सीटों पर एक दिन पहले (हालांकि मोदी की तयशुदा रैलियों के होने के बाद) चुनाव प्रचार पर रोक लगा दी, जिसकी बदौलत ममता बनर्जी मतदाताओं की कुछ सहानुभूति बटोरने में कामयाब रहीं.

अमित शाह के उनकी बेगुनाही के ऐलान के बावजूद यह साफ है कि इस मामले में पश्चिम बंगाल के मतदाताओं की हमदर्दी ममता बनर्जी के साथ होगी, भले ही भाजपा अपने टीवी चैनलों के जरिये इसे कोई भी शक्ल दे.

इससे यह भी दिखता है कि जनता निरंकुश ताकत के उपयोग/दुरूपयोग को कैसे देखती है. भगवा पहने, ‘जय श्री राम’ चिल्लाते युवाओं से भरा अमित शाह का रोड शो उकसाने वाला था- उत्तर प्रदेश  के किसी शहर में यह लोगों के मन में डर और खौफ भर देता, लेकिन पश्चिम बंगाल उत्तर प्रदेश नहीं है.

और ममता बनर्जी ने भी सड़कों की कठिन राजनीति सीखी हुई है. इस तरह भाजपा को तृणमूल कांग्रेस में अपना मेल मिल गया है. शाह को पता था कि उन्हें प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा और स्पष्ट रूप से उकसावा दोनों ओर से था, जो अब सामने आए वीडियो में भी दिखाई देता है.

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अमित शाह के रोड शो के बाद हुई तोड़फोड़ और हिंसा (फोटो: पीटीआई)

शाह के रोड शो में हिंसा कैसे भड़की, इसे विस्तार से बताने की ज़रूरत नहीं है. महत्वपूर्ण यह है कि पश्चिम बंगाल में नरेंद्र मोदी और अमित शाह किसी भी कीमत पर एक रणनीति के तहत काम कर रहे हैं, जिससे हिंदी पट्टी में रही कमियों की पूर्ति बंगाल में हो सके.

पार्टी की रणनीति का हिस्सा सत्ता के विभिन्न तरीकों के माध्यम से ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के खिलाफ एक मनोवैज्ञानिक युद्ध शुरू करना था. शाह ने बार-बार यह कहकर कि चुनाव आयोग बनर्जी का पक्ष ले रहा है, आयोग पर दबाव बनाए रखा.

ऐसा तब हो रहा था जब जनसभाओं में दिए भाषणों में तमाम तरीके के उल्लंघनों पर मोदी और शाह को एक के बाद एक क्लीनचिट मिलीं और आयोग के तीन में से एक सदस्य द्वारा इसका प्रतिरोध किया गया.

चुनाव आयोग के ऊपर पश्चिम बंगाल में कुछ करने का बेहद दबाव था. आखिरकार, अमित शाह के रोड शो में हुई हिंसा के बाद आयोग ने चुनाव प्रचार को समय से पहले रोकने के लिए संविधान के अनुच्छेद 324 का इस्तेमाल किया.

दिलचस्प है कि आयोग ने अपने इस असाधारण आदेश में लिखा है कि ‘कोई भी जनता को फिल्म और टेलीविजन के माध्यम या म्यूजिकल कॉन्सर्ट, नाटक या कोई मनोरंजक कार्यक्रम आयोजित कर चुनाव प्रचार संबंधी सामग्री नहीं दिखा सकता.’ हालांकि अनुच्छेद 324 के इस असाधारण आदेश के दायरे में नमो टीवी आता है या नहीं, यह देखने वाली बात होगी.

आयोग ने पश्चिम बंगाल में फैले डर के माहौल का भी ज़िक्र किया है, जहां ऊपर से सब सामान्य दिखता है लेकिन जिसका असर डरावना हो सकता है. यही तर्क उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों के लिए भी दिया जा सकता है, जहां ऊपरी तौर पर भले ही सब सामान्य लग रहा हो लेकिन हिंदुत्व ब्रिगेड और जाने-माने बाहुबली चुनाव के दौरान डर का माहौल सुनिश्चित करते हैं.

क्या देश के चुनावी इतिहास में पहली बार अनुच्छेद 324 को लागू करने के लिए यह पर्याप्त आधार हैं? यह सवाल लोगों के मन से इतनी आसानी से नहीं जायेगा.

सिर्फ उम्मीद की जा सकती है कि इस बार मतदाता ऐसा फैसला सुनाएं, जिससे किसी भी सत्तारूढ़ दल को इस तरह की निरंकुश ताकत न मिले.

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