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क्या बनारस में बुनकरों के लिए प्रधानमंत्री मोदी का अच्छे दिन लाने का वादा जुमला साबित हुआ?

ग्राउंड रिपोर्ट: नरेंद्र मोदी ने बनारस में बुनकरों से जुड़े कई वादे किए थे लेकिन पांच साल बाद स्थानीय बुनकर अच्छे दिनों के नारे और वादे के बीच ख़ुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं.

हथकरघे पर काम करते परवेज अख्तर (फोटो रिज़वाना तबस्सुम)

हथकरघे पर काम करते परवेज अख्तर (फोटो: रिज़वाना तबस्सुम)

वाराणसी: बनारस के नाटी इमली के परवेज़ अख्तर 25 साल के हैं और बचपन से साड़ी बुनाई का काम करते आ रहे हैं. नाटी इमली के बीच मुहल्ले में परवेज़ का एक छोटा-सा घर हैं जहां पर तीन हथकरघे हैं, जिसमें से दो हथकरघे बंद पड़े हुए हैं.

एक हथकरघे पर परवेज़ साड़ी बुन रहे हैं. इस काम में परवेज़ के साथ उनके परिवार वाले भी लगे हुए हैं. परवेज़ बताते हैं कि वे साटन की साड़ी बनाते हैं. इस साड़ी को बनाने में करीब एक सप्ताह का समय लगता है. तैयार होने के बाद यह साड़ी 2800-3000 रुपये की बेची जाती हैं, जिसमें से लगभग दो हज़ार रुपये का मटेरियल लग जाता है और मेहनताना 700 रुपये बचता है. इसी में एक सप्ताह तक पूरे परिवार का खर्च चलाना होता है.

दुनिया भर में बनारसी साड़ी के लिए मशहूर वाराणसी आज अपनी पहचान बचाने में लगी हुई है, लेकिन कहीं से भी कामयाबी मिलती नज़र नहीं आ रही है. सरकारें आती हैं, वादे करती हैं और चली जाती हैं लेकिन बुनकरों की सुध लेने वाला कोई नहीं है.

वाराणसी के बाकराबाद के रहने वाले करीब 47 साल के बुनकर अहमद अंसारी बताते हैं, ‘सरकार कोई भी हो बुनकर लगातार पीछे गए हैं लेकिन भाजपा की सरकार में बुनकर काफी तेज़ी से बर्बाद हुए हैं.’

अहमद कहते हैं कि कांग्रेस की सरकार में बुनकर को स्लो पॉइज़न (धीमा ज़हर) दिया जा रहा था लेकिन मोदी के दौर में घरेलू कारोबार पर बुलडोजर चला दिया गया.

अहमद अंसारी (फोटो रिज़वाना तबस्सुम)

अहमद अंसारी (फोटो: रिज़वाना तबस्सुम)

अहमद आगे बताते हैं, ‘बुनकर जितनी मेहनत कर रहे हैं उन्हें उतना मेहनताना नहीं मिल रहा है. काफी मुश्किल से वो अपना पेट पाल रहे हैं. जीएसटी की वजह से धागा महंगा हुआ है लेकिन साड़ी की बिक्री कम हुई है. साड़ी का दाम मिलना कम हुआ है. इसका सीधा असर मजदूरी पर ही पड़ा है.’

वाराणसी के रसूलपुरा के नुरुलहोदा की उम्र करीब 55 साल है. अपने घर के दरवाजे के बाहर कुछ लोगों के साथ बैठे नुरुलहोदा पीढ़ियों से साड़ी का कम करते आए हैं. वे कहते हैं कि जब से ये भाजपा सरकार आई तब से सब कुछ बर्बाद हो गया है.

नोटबंदी को लेकर उनका कहना है, ‘पहले कारोबार कुछ ऊपर नीचे होता था, तो घर की औरतें जो पैसा बचाकर रखी होती थी उस पैसे से कोई और काम शुरू कर लेते थे, लेकिन नोटबंदी में उनका सारा पैसा खत्म हो गया.’

यहीं के रहने वाले पैगम्बर हसन बताते हैं, ‘हम जो साड़ी बना रहे हैं उसकी लागत भी नहीं मिल पा रही है. जितना पैसा लगेगा उतना भी नहीं मिलेगा तो हम कैसे अपने काम को आगे बढ़ा पाएंगे?’

वे कहते हैं कि 2014 से इस सरकार के आने के बाद सब कुछ तहस-नहस हो गया. अपनी बात आगे बढ़ाते हुए वे सवालिया लहजे में कहते हैं, ‘पांच साल पहले सब लोग कहते थे न कि मुस्लिम क्यों भाजपा को नहीं वोट देते हैं. अब समझ में आ गया सबको. एक बार हम लोगों ने वोट देकर भारी बहुमत से जिताकर उनको देश का बादशाह बनाया, लेकिन वो तो हमें फकीर बना दिए.’

हसन आगे कहते हैं, ‘जब से ये सरकार आई है तब से मुस्लिमों का जीना मुहाल हो गया है. कभी गाय को लेकर, कभी गोश्त को लेकर, कभी मॉब लिंचिंग को लेकर, हर तरह से ये सरकार डराने की कोशिश की. इन सबके साथ-साथ इस सरकार ने हमारी रोजी हमसे छीन ली और लोग कहते हैं कि मुस्लिम भाजपा को वोट क्यों नहीं देते. आप ही बताइए क्या हम ऐसे लोगों को अपने देश का रहनुमा बना सकते हैं?’

बाकराबाद के शिवलाल पहले बनारसी साड़ी का काम करते थे लेकिन दो साल पहले वो काम बंद हो गया. शिवलाल अब कोन (बुनाई के लिए धागा) भरने का काम करते हैं. शिवलाल बताते हैं, ‘बुनकरों की स्थिति कभी अच्छी नहीं थी. बड़े आदमी ने हमेशा छोटे आदमी को दबाया है. ये लगातार हुआ है. इस सरकार में भी यही हुआ है.’

1995 से साड़ी का काम करने वाले मन्नूलाल मौर्य बताते हैं कि पिछले पांच साल में बुनकरों की स्थिति काफी खराब हुई है. वे बताते हैं, ‘मैं मजदूर हूं, साड़ी बुनाई का काम करता हूं. पहले कहीं और काम करता था लेकिन जब भाजपा की सरकार आई, उसके बाद साड़ी की बिक्री पर इतना असर हुआ कि जहां मैं कई सालों तक साड़ी का काम किया था, वहीं साड़ी का कारोबार खत्म हो गया.’

Varanasi Weaver Mannulal Mourya

मन्नूलाल मौर्या (फोटो: रिज़वाना तबस्सुम)

मौर्य बताते हैं, ‘हमारे घर की महिलाएं चूड़ी बनाने का काम करती हैं लेकिन जब से नोटबंदी हुई है तब से चूड़ी का काम काफी ठप हुआ है, जहां पर रोज चूड़ी बनाने के लिए ऑर्डर मिलता था अब दस या पंद्रह दिन में एक बार मिलता है. मोदी सरकार के आने बाद न केवल साड़ी बुनाई कमजोर हुआ है बल्कि और भी छोटे-छोटे रोजगार बंदी की कगार पर हैं.’

हालांकि मोदी सरकार का दावा है कि बुनकरों के लिए बहुत कुछ किया गया है. 2017 सितंबर में वाराणसी के दूसरे छोर पर बसे बड़ा लालपुर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 200 करोड़ रुपये की लागत से तैयार हुए ट्रेड फैसिलिटेशन सेंटर (पंडित दीनदयाल उपाध्याय ट्रेड सेंटर) का उद्घाटन किया था.

जिस समय यह सेंटर बनकर तैयार हुआ था, लोगों को लगा कि अब बुनकरों के अच्छे दिन आ जाएंगे. पीएम मोदी ने अपने संबोधन में कहा था, ‘ये संकुल मात्र इमारत नहीं है यह भारत के सामर्थ्य का परिचय कराने वाली इमारत है. ये काशी के शिल्पाकारों और बुनकरों के लिए है जो भविष्य के दरवाजे खोलने का ताकत रखती है.’

आज दो साल के बाद स्थिति बिलकुल उल्टी है. ट्रेड फैसिलिटेशन सेंटर में बहुत-सी दुकानें खाली हैं. यहां पर जितनी जनता नहीं है उससे ज्यादा यहां इमारत में विभिन्न तरह के काम करने वाले लोग हैं.

Varanasi Trade facilitation Centre

ट्रेड फेसिलिटेशन सेंटर (फोटो: रिज़वाना तबस्सुम)

यहां काम करने वाले एक कर्मचारी ने नाम न बताने की शर्त पर बताया, ‘जब से ये सेंटर खुला है तब से शायद ही आज तक कोई ऐसा कार्यक्रम हुआ हो, जिसमें बुनकर आए हों. बुनकरों के लिए कार्यक्रम तो होता है लेकिन उसमें बुनकर नहीं होते, सब व्यापारी होते हैं.’

वे आगे बताते हैं, ‘यहां मोहन भागवत जी आते हैं, संघ का कार्यक्रम भी हो चुका है. अमित शाह जब आते हैं तो अक्सर वो अपने कार्यकर्ताओं से यहीं पर मिलते हैं. और भी कई कार्यक्रम होते हैं लेकिन जिस काम के लिए इसे बनाया गया है वो कार्यक्रम तो नहीं दिखता है.’

ट्रेड सेंटर में दुकान लगाने वाले 30 साल के गुलजार अहमद बताते हैं, ‘यहां पर सेंटर तो खुल गया है लेकिन इसका कोई प्रचार नहीं हो रहा है. ये बनारस में ही खुला है लेकिन इसे बनारस के बुनकर ही नहीं जानते हैं. मैं पिछले पांच महीने से यहां हूं और इतने दिन में केवल चार साड़ियां ही बेच पाया हूं. इस दुकान का करीब सात हज़ार रुपये महीना किराया दे रहा हूं और केवल घाटा ही घाटा हो रहा है.’

वे आगे बताते हैं, ‘बीते जनवरी में यहां पर प्रवासी सम्मेलन हुआ था लेकिन उसका कुछ भी फायदा नहीं हुआ. साड़ी खरीदना तो दूर किसी ने एक खिलौना भी नहीं खरीदा. कुछ भी बिक्री नहीं हुई है. भले ही यहां पर सेंटर बन गया है लेकिन इसका कोई फायदा नहीं है. सरकार ने ये सेंटर तो बना दिया है लेकिन इसका प्रचार-प्रसार नहीं होने से पूरी तरह से ये बर्बाद है.’

बड़ा लालपुर सेंटर के बारे में बात करते हुए अहमद अंसारी कहते हैं, ‘वाराणसी में ये सेंटर ऐसी जगह पर बना है जहां पर आम बुनकर का पहुंचना ही मुश्किल है. बनारस के 90 प्रतिशत बुनकर तो उस जगह और सेंटर के बारे जानते ही नहीं है.’

The Prime Minister, Shri Narendra Modi meets the artisans and weavers, at the Deendayal Hastkala Sankul, Varanasi, Uttar Pradesh on September 22, 2017. The Union Minister for Textiles and Information & Broadcasting, Smt. Smriti Irani, the Chief Minister, Uttar Pradesh, Yogi Adityanath, the Minister of State for Textiles, Shri Ajay Tamta and the Deputy Chief Minister, Uttar Pradesh, Shri Keshav Prasad Maurya are also seen.

हस्तकला संकुल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य नेता (फोटो साभार: पीआईबी)

सेंटर के बारे में नुरुलहोदा कहते हैं, ‘ये जो हमारे मुल्क का बादशाह है वो बड़ा झूठा है. वो बस अपनी वाहवाही के लिए कुछ भी करेगा. उनके लिए सब काम केवल दिखावा है. बुनकर केंद्र बना है तो उसका फायदा कैसे होगा, ये भी बताएं. लेकिन इनके लिए सब काम खाली हवाहवाई रहता है.’

बुनकर बिरादिराना तंजीम के अध्यक्ष और गंगा महासभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हाजी मुख्तार अहमद महतो का कहना है कि कि बुनकरों के हालात पहले से ही खराब रहे हैं, भाजपा और मोदी सरकार के आने के बाद हालत और खराब हो गए हैं.

वे कहते हैं, ‘साड़ी के काम में कई लोग लगे होते हैं, कुछ धागा बुनाई करते हैं, कुछ साड़ी कटिंग करते हैं, कुछ लोग तानी (बुनाई में ताना-बाना) रंगाई का काम करते हैं. एक साइकिल (चक्र) में काम होता है. जब नोटबंदी हुई तो बड़े व्यापारियों ने अपना पैसा खींच लिया, इस वजह से नोटबंदी के बाद बुनकरों की कमर टूट गई. बची हुई कसर जीएसटी ने निकाल दी. बुनकर उतना पढ़े लिखे नहीं है कि उन्हें जीएसटी समझ में आ जाए. जितना वो कमा रहे हैं उससे ज्यादा दिमाग उनको जीएसटी जमा करने में खर्च लग जाता है, वो परेशान हो जाते हैं.’

वे आगे बताते हैं, ‘बुनकरों को आज जहां होना चाहिए वहां नहीं हैं. कुछ वजह तालीम की कमी है, कुछ बुनकर के हालात खराब हैं. पहले हथकरघा था, फिर पावरलूम आया और अब रेपियर आया है. हथकरघा तो धीरे-धीरे खत्म हो रहा है. पावरलूम और रेपियर से जितनी साड़ी बन रही है, उनकी मार्केटिंग नहीं है, कोई खरीदने वाला नहीं है. अगर कोई खरीद भी रहा है तो उसके दाम कम मिल रहे हैं.’

उनका कहना है कि बुनकरों के साथ लगातार नाइंसाफ़ी हुई हैं लेकिन पिछले पांच साल में ज्यादा हुई है. वे कहते हैं, ‘कमाई नाम की कोई चीज नहीं है. मोदी सरकार के आने के बाद महंगाई लगातार बढ़ती गई है, साड़ी की बिक्री कम होने लगी, दाम गिरने लगा और जब दाम गिरा तो उसका सीधा असर मजदूर की मजदूरी पर पड़ा, आज एक बुनकर परिवार (हथकरघा) मिलकर मुश्किल से महीने में चार से पांच हजार की कमाई कर पा रहा है.’

हाजी मुख़्तार का यह भी कहना है कि अफसरशाही और नेताशाही इतनी ज्यादा है कि बुनकरों को कोई सुविधा नहीं मिल रही है. वे कहते हैं, ‘पांच साल पहले बुनकर और व्यापारी (साड़ी खरीदने वाले) के बीच में जो बातचीत थी, जो समझ थी, इस सरकार के आने के बाद से वो माहौल नहीं रह गया है. उन लोगों को और भी काम मिल रहे हैं. अब तक मोदी जी करीब बीस बार बनारस आ चुके हैं लेकिन कभी किसी मुसलमान को करीब किए? और जब बुलाया भी तो केवल दिखाने के लिए? बुनकरों के नाम से बहुत से लोगों की दुकान चल रही है, बहुत सारे लोग लूट रहे हैं.’

Smriti Irani Haji Mukhtar Mahto

कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी के साथ हाजी मुख़्तार महतो

हाल ही में नामांकन दाखिल करने वाराणसी पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रोड शो में हाजी मुख्तार ने उन्हें शॉल देकर उनका स्वागत किया था, जिसे मीडिया द्वारा मोदी के मुसलमानों की सौगात स्वीकार करने के रूप में दिखाया गया.

इस बारे में हाजी मुख्तार कहते हैं, ‘वो हमारे प्रधानमंत्री हैं, जब हमारे सामने बड़े लोग आते हैं तो हम उनका इस्तकबाल करते हैं. वैसे भी मुस्लिम और भाजपा के बीच थोड़ी दूरी है अगर हम अपनी तरफ से पहल नहीं करेंगे तो जो थोड़ी दूरी है वो और बढ़ जाएगी. वे हमारे मुल्क के वजीर-ए-आजम हैं, हमने मुल्क के बादशाह की इज्जत की है. मोदी की इज्जत नहीं की है, न ही भाजपा के किसी नेता-मंत्री की इज्जत की है. ये हमारा फर्ज है कि कोई बड़ा हमारे घर के पास गुजरे तो हम उसकी इज्जत करें.’

हालांकि हाजी मुख्तार कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी से खासे नाराज नजर आते हैं. वे कहते हैं, ‘तीन साल पहले स्मृति ईरानी बनारस आई थीं. यहां एक कपड़े की कंपनी में कार्यकम था जहां उन्होंने मुझे बुलाया था. मैं उनसे मिलने के लिए गया. वहां कुछ दूर पैदल चलना था, वहां वे कदम से कदम मिलाकर मेरे साथ चल रही थीं. इस दौरान लगातार फोटोग्राफी हो रही थी. फिर जब वहां जाकर बैठे तो मेरी कुर्सी उनके पीछे थी पर उन्होंने कहकर मुझे अपने साथ बैठाया. वे  इधर-उधर की ही बात कर रही थीं, हालचाल ले रही थीं और कोई बात नहीं हुई. मीडिया वाले फोटोग्राफी में लगे हुए थे और लोगों को लग रहा है कि बड़ी खास बात हो रही है लेकिन बात कुछ भी नहीं हुई, बुनकर से जुड़ी तो कोई बात ही नहीं हुई.’

वे आगे कहते हैं, ‘इसके बाद उन्होंने कार्यक्रम में लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि बुनकरों की जो शिकायत है हम सुनना चाहते हैं लेकिन सभी के दर तक तो हम पहुंच नहीं पाते, हर आदमी से मिल नहीं सकते इसलिए जिसको जो भी शिकायत है वो लिखित में महतो साहब के यहां पहुंचा दे, हम दो या तीन दिन में उस मसले को हल करेंगे. उनके इस ऐलान के बाद मेरे घर पर सैकड़ों लोगों की शिकायतें आ गईं. मैंने स्मृति ईरानी को कई बार फोन किया पर फोन ही नहीं उठा. फिर मुझे कहा गया कि मैं चौक जाकर एक व्यक्ति से मिलूं. मैं उनसे मिलने गया तो उसने किसी और से मिलने की बात की, फिर मैं आगे किसी से नहीं मिला.’

वे झल्लाते हुए कहते हैं, ‘ये कौन सा तरीका है कि मेरे नाम से घोषणा करके, मेरा नाम लगाकर, मुझे फंसाकर भाग गईं, उसके बाद से आई ही नहीं. ये तो नेता लोगों का काम है कि केवल इनको-उनको फंसाना है. ये लोग बहुत झूठे होते हैं. ये नेता हैं ये झूठे वादे कर सकते हैं लेकिन हम लोग किसी से झूठा वादा नहीं करते.’

(रिज़वाना तबस्सुम स्वतंत्र पत्रकार हैं.)