भारत

कॉन्फ्रेंस हॉल में प्रधानमंत्री का दिखना ही अब प्रेस कॉन्फ्रेंस कहलाएगा

मोदी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की. यह तथ्य है. यह भी एक तथ्य है कि मोदी से पूछने वाला प्रेस ही नहीं है. होता तो उसे प्रेस कॉन्फ्रेंस की ज़रूरत नहीं होती. वह अपनी ख़बरों से मोदी को जवाब के लिए मजबूर कर देता.

New Delhi: Prime Minister Narendra Modi with BJP President Amit Shah during a press conference at the party headquarter in New Delhi, Friday, May 17, 2019. (PTI Photo/Manvender Vashist) (PTI5_17_2019_000094B)

नई दिल्ली में बीते शुक्रवार को भाजपा मुख्यालय पर हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह. (फोटो: पीटीआई)

जगह-जगह पहली बार पहुंचने का इतिहास बनाने के शौकीन प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी पार्टी के मुख्यालय में ही पहली बार का इतिहास बना दिया. प्रधानमंत्री के नाम पर हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रधानमंत्री ने एक भी सवालों का जवाब नहीं दिया.

यह पहली बार हुआ है. यह भी पहली बार हुआ कि दर्शकों ने प्रधानमंत्री मोदी को 22 मिनट तक चुप देखा और 22 मिनट तक दूसरे को सुनते देखा. अमित शाह 22 मिनट तक बोलते गए. लगा कि अमित शाह जल्दी माइक प्रधानमंत्री को सौंप देंगे और सवाल-जवाब का सिलसिला शुरू होगा.

अमित शाह ऐसा कुछ भी नहीं बता रहे थे जो भाजपा कवर करने वाले पत्रकारों को पता नहीं था. जो जानकारियां चुनाव शुरू होने से पहले की थीं उसे ख़त्म होने के बाद बता रहे थे.

प्रधानमंत्री इस तरह से सुन रहे थे जैसे उन्हें भी पहली बार पता चल रहा हो. इस तरह इंटरव्यू के बाद दोनों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की गरिमा भी समाप्त कर दी. बता दिया कि प्रधानमंत्री दिख रहे हैं आपके सामने, यही बहुत है और यही न्यूज़ है.

चैनलों पर चला भी कि यह प्रधानमंत्री की पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस है. पांच साल में उन्होंने एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की. कॉन्फ्रेंस हॉल में प्रधानमंत्री का दिखना अब प्रेस कॉन्फ्रेंस कहलाएगा. हिंदी में इसे प्रेस-दर्शन कहा जाएगा.

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रेस प्रधानमंत्री को कवर करने गया था, लेकिन अमित शाह प्रधानमंत्री को कवर करने आए थे. अमित शाह ने पहले 22 मिनट और बाद में 17 मिनट बोलकर प्रधानमंत्री को ख़ूब कवर किया.

अपने नोट्स से लगातार 22 मिनट तक बोल कर उन्होंने बता दिया कि उनके दिमाग में राजनीति की रेखाएं कितनी स्पष्ट हैं. उन्होंने राजनीति को निर्जीव बना दिया है जिसमें सिर्फ संख्या प्रमुख है.

अमित शाह ख़ुद को प्रमाणित कर रहे थे कि उन्होंने एक अच्छे प्रबंधक की भूमिका निभाई है. जिस तरह से बूथों की संख्या गिना रहे थे, मुझे उम्मीद हो गई थी कि वे शामियानों और उनमें लगी बल्लियों की संख्या भी बता देंगे. पंखे कितने लगे और कुर्सियां कितनी लगी, ये भी बता देंगे. मैं थोड़ा निराश हुआ. उन्होंने यह नहीं बताया कि प्रधानमंत्री की सभाओं में गेंदे की माला पर कितना ख़र्च हुआ.

अमित शाह जो जानकारी दे रहे थे, वो नई नहीं थीं. भाजपा कवर करने वाले पत्रकार यही सब तो रिपोर्ट करते रहे हैं. पार्टी के भीतर की कब आपने कोई बड़ी ख़बर देखी. कब आपने देखा कि पत्रकारों ने अपनी तरफ से सवालों की बौछारें कर दी हों.

मोदी-शाह के कार्यकाल में क्या आपको भाजपा की एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस याद है जिसमें सवालों की बौछार हुई है. जो काम पांच सालों से बंद पड़ा था वो अचानक कैसे शुरू हो जाता. बीजेपी ने अपने पत्रकारों को रैलियों की संख्या और उनका विश्लेषण करने वाले संपादक में बदल दिया है.

17 मई को लगा कि अमित शाह उन पत्रकारों की कॉपी चेक कर रहे हैं कि जो बताया है वो ठीक से याद है कि नहीं. नहीं याद है तो फिर से सुनो. भाव ऐसा था कि आप लोगों को पता ही नहीं चला कि हमने चुनाव कैसे लड़ा.

मोदी ने भी कहा कि हम बहुत पहले से तैयारियां करते हैं. आपको पता नहीं चलता है. इस तरह दोनों ने औपचारिक और सार्वजनिक रूप से प्रमाणित किया कि आप भाजपा कवर तो करते हैं लेकिन भाजपा के बारे में ख़बर नहीं रखते क्योंकि ख़बर तो हम देते नहीं हैं.

जैसे इम्तेहान में फेल होने पर मास्टर लेक्चर देता है कि छुट्टियों में किताबें पढ़ लेना उसी तरह प्रधानमंत्री ने रिपोर्टिंग में फेल पत्रकारों को लेक्चर दिया कि बाद में रिसर्च कर लेना कि हम चुनाव कैसे लड़ते हैं.

साफ-साफ कह रहे थे कि आप किस बात के पत्रकार हो, हमने आपको कुछ भी ख़बर नहीं लगने दी. प्रधानमंत्री ने जिस प्रेस को ख़त्म कर दिया है, उसे कंफर्म किया कि ये पूरी तरह कबाड़ में बदला है या नहीं. 17 मई को प्रधानमंत्री उस कबाड़ को एक कमरे में देखने आए थे न कि उसके सवालों का जवाब देने.

प्रधानमंत्री 12 मिनट बोले. सट्टा बाज़ार से लेकर कुछ भी कि चुनाव के समय आईपीएल भी हुआ, रमज़ान भी हुआ और हनुमान जयंती भी हुई. पत्रकार भी कंफ्यूज़ हो गए कि यह सब मोदी सरकार करा रही थी.

चुनाव तो पहले भी हुए और पहले भी चुनावों के दौरान इम्तेहान से लेकर रमज़ान तक हुआ होगा. 17 मई को मोदी-शाह ने साबित किया कि उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस को ही ख़त्म कर दिया है तो करें क्या. वे प्रेस-डिक्टेशन करते हैं, कॉन्फ्रेंस नहीं करते हैं. हैरानी की बात यह है कि सवाल न पूछे जाने की पूरी गारंटी के बाद भी प्रधानमंत्री ने सवालों को प्रोत्साहित नहीं किया.

पांच साल पहले मोदी की यात्रा को याद कीजिए. उन्होंने यकीन दिलाया था कि वे बोलने वाले प्रधानमंत्री हैं. वे मौन-मोहन नहीं हैं. किसी की बोलने की क्षमता का मज़ाक उड़ाया गया. कहा गया कि मनमोहन लिखा हुआ भाषण पढ़ते हैं. दस जनपथ से जो लिख कर आता है वही पढ़ते हैं. धीमे-धीमे पढ़ते हैं.

पांच साल ख़त्म होते-होते देश ने देखा कि हमने बोलने वाला प्रधानमंत्री मांगा था, मगर मिला बड़बोला प्रधानमंत्री. उनके जवाब के मज़ाक उड़े. बादल और रडार से लेकर डिजिटल कैमरा और ईमेल के जवाब से साबित हुआ कि प्रधानमंत्री कुछ भी बोलते हैं.

यही नहीं देश ने यह भी देखा कि प्रधानमंत्री लिखा हुआ भाषण पढ़ते हैं. उनकी रैलियों में टेलीप्रॉम्टर लग गया. यकीन जानिए कि यह टेलीप्रॉम्टर अगर मनमोहन सिंह लगाकर बोलते या राहुल गांधी तो मीडिया रोज़ इस पर बहस करता और आप रोज़ इसकी चर्चा करते. मगर मीडिया ने आपको सीखा दिया है कि कैसे मोदी की कमज़ोरी को ताकत और उनके झूठ को सत्य समझना है.

जो लोग प्रेस कॉन्फ्रेंस में अमित शाह और मोदी की देह-भाषा की अलग-अलग व्याख्या कर रहे हैं उन्हें अपनी समझ ताज़ा कर लेनी चाहिए. दोनों ने कहा कि 300 सीटें आएंगी. दोनों को मतलब शपथ लेने और सरकार बनाने से है. सवालों और जवाब से नहीं है.

किसी को यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि 22 मिनट बोलकर अमित शाह प्रधानमंत्री मोदी के बॉस हो गए हैं. इन दोनों के बीच वर्चस्व की लड़ाई देखने वाले इनके रिश्तों की गहराई नहीं जानते.

प्रधानमंत्री भरी सभा में इस तरह से अपने वर्चस्व की हार का लाइव टेलिकास्ट कराने नहीं आएंगे. आइए देखिए, अमित शाह ने मोदी को जवाब नहीं देने दिया. अमित शाह का युग शुरू हो रहा है. मोदी का युग जा रहा है.

थोड़ा सब्र रखिए. ऐसा कुछ नहीं होगा. नरेंद्र मोदी को लाल कृष्ण आडवाणी समझने की भूल न करें. अमित शाह को नरेंद्र मोदी समझने की महाभूल कभी न करें. मोदी का मन किया होगा कि आज अमित शाह 22 मिनट बोलकर दिखाएंगे. वही सवालों के जवाब देंगे.

मोदी और मीडिया की समझ बहुत ज़रूरी है. जैसे दिल्ली सल्तनत कायम करने के लिए बलबन सज़दा और पायबोश की फ़ारसी परंपरा ले आया था वैसे ही कांग्रेसी राज को सल्तनत कहने वाले मोदी ख़ुद भी बादशाही मिज़ाज के शिकार हो गए.

बलबन ऊंचाई पर बैठता था. उसके दरबार में आने वाला सिर झुकाकर सलाम करता था. दूरी और ऊंचाई की रेखा उसने साफ-साफ खींच दी थी.

उसी तरह से मीडिया को लेकर एक मोदी सिस्टम कायम हुआ. इस मोदी सिस्टम में दूरी की अपनी जगह है. आप प्रधानमंत्री के सारे इंटरव्यू देखिए. उसमें दूरी और भव्यवता का भाव दिखेगा.

उनके दफ्तर का सेट एक-सा होता है. कुर्सियां कभी इस तरफ होती हैं तो कभी उस तरफ मगर सवाल पूछने वाला एक ख़ास दूरी पर बैठा होता है. हर इंटरव्यू का फ्रेम और शॉट एक सा होता है.

मैं नहीं जानता तो नहीं कहूंगा कि रिकार्डिंग भी प्रधानमंत्री के कैमरे से होती होगी. अगर सारे चैनल अपने कैमरे से करते हैं तो यह भी कमाल है कि हर किसी का फ्रेम एक सा होता है.

आप ह्वाइट हाउस में ट्रंप की प्रेस कॉन्फ्रेंस याद कीजिए. प्रेस और राष्ट्रपति के बीच की दूरी कम होती है. लगता है कि राष्ट्रपति प्रेस के बीच हैं. आप प्रेस के सामने मोदी की मौजूदगी देखिए, लगता है कि अवतार पुरुष हैं. देश कभी तो उनके इंटरव्यू की सच्चाई जानेगा. जो आज मजबूर हैं वही लिखेंगे.

मोदी सिस्टम ने इंटरव्यू की कला को समाप्त कर दिया. उन्होंने साबित किया कि सवाल नहीं भी पूछा जाएगा तो भी दर्शक देखेगा. क्योंकि वे मोदी हैं, दर्शक उनका भक्त है.

आम, बटुआ, पतंग, रोटी से लेकर न जाने कितने बकवास सवाल उनसे पूछे गए. मोदी उन सवालों को गंभीरता से जवाब देकर स्थापित किया कि यही पूछा जाएगा और ऐसे ही पूछा जाएगा.

इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में उनका जवाब ख़तरनाक है. उन्होंने कहा है कि न्यूज़ छपे या न छपे लोकतंत्र में सिर्फ यही एक काम नहीं है. इसके बाद भी प्रेस उनके इंटरव्यू के लिए गिड़गिड़ा रहा है. मोदी न्यूज़ देने के लिए कैमरे के सामने नहीं आते हैं. बल्कि कैमरे को दर्शन देने आते हैं.

इंटरव्यू और प्रेस कॉन्फ्रेंस मीडिया के ये दो आधार स्तंभ हैं. मोदी सिस्टम ने इन दोनों को समाप्त कर दिया. बड़े-बड़े न्यूज़ चैनलों ने मोदी सरकार की योजनाओं की कमियों और धांधलियों की रिपोर्टिंग बंद कर दी. यह तीसरा हमला था.

सवाल की हर संभावना कुचल दी गई. उनके इंटरव्यू को लेकर यह धारणा बन गई है कि सवाल ही नहीं थे और जो थे वो पहले से तय किए गए थे. न्यूज़ नेशन पर कविता वाले सवाल ने इस धारणा को साबित कर दिया.

बस अब एक जवाब और चाहिए. प्रधानमंत्री के इंटरव्यू से पहले पत्रकार सवाल लिखकर देता है या प्रधानमंत्री पत्रकार को सवाल लिख कर देते हैं कि क्या पूछना है.

मीडिया के सामने मोदी एक्सपोज़ हो चुके हैं. मोदी के सामने मीडिया एक्सपोज़ हो चुका है. दोनों के बीच कोई राज़ नहीं है. दोनों के सामने दोनों नहीं हैं. उन्होंने यह साबित किया है कि बग़ैर सवाल के भी इंटरव्यू एक्सक्लूसिव हो सकता है.

मीडिया को लेकर जो मोदी सिस्टम बना है वो मोदी को ही एक्सपोज़ कर देगा, यह किसी ने नहीं सोचा था. 2019 के चुनाव की सबसे बड़ी देन यही है. 2019 आपको बता गया कि जिस मीडिया ने मोदी को बनाया अब उसी मीडिया में मोदी को देख लो. उस झूठ को देख लो.

मोदी-सिस्टम एक गैंग की तरह काम करता है. ज़रूर प्रधानमंत्री ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि सवाल पूछने वाले ख़ान मार्केट गैंग हैं. उन्हें फर्क नहीं पड़ता है. हो सकता है कि कोई ख़ान मार्केट गैंग रहा हो जिसे मोदी ने ध्वस्त कर दिया. मगर मोदी के आस-पास मीडिया का जो गैंग दिख रहा है उसका नाम भले ही आज़ादपुर मंडी गैंग नहीं है लेकिन वह काम करता है गैंग की तरह ही.

मीडिया के मालिकों को धंधा देकर एंकरों से भजन कराने का एक सिस्टम अब मान्यता प्राप्त हो चुका है. मीडिया मालिकों की आज़ाद हैसियत मोदी ने समाप्त कर दी. मोदी के सामने मालिक और एंकर अब एक समान नज़र आते हैं.

मोदी ने ऐसे पत्रकारों का गैंग खड़ा कर दिया है जो सवाल के नाम पर आम और इमली के औषधीय गुण पूछते हैं. मोदी सिस्टम भी एक गैंग है जो किसी भी हाल में पता नहीं चलने देता है कि अक्षय कुमार का इंटरव्यू किसने रिकॉर्ड किया. किसने एडिटिंग की लेकिन न्यूज़ एजेंसी एएनआई के ज़रिये सारे चैनलों पर चल जाता है. क्या वह कार्यक्रम हवा में बन गया था?

मोदी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की. यह तथ्य है. यह भी एक तथ्य है कि मोदी से पूछने वाला प्रेस ही नहीं है. होता तो उसे प्रेस कॉन्फ्रेंस की ज़रूरत नहीं होती. वह अपनी ख़बरों से मोदी को जवाब के लिए मजबूर कर देता.

न्यूज़ चैनल आप देखते हैं, यह आप दर्शकों की महानता है. इसकी शिकायत मुझसे न करें. मैंने तो न्यूज़ चैनल न देखने की अपील की है. मोदी सिस्टम में जब न्यूज़ की जगह मोदी को ही देखना है तो क्यों न आप अपने घर में चारों तरफ मोदी की तस्वीर लगा दें. अख़बार और टीवी पर ख़र्च होने वाला पैसा गोशाला को दान दे दें.

(यह लेख मूल रूप से रवीश कुमार के फेसबुक पेज पर प्रकाशित हुआ है.)