कैंपस

हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों के लिए जेएनयू वाम राजनीति से कहीं बढ़कर है

जेएनयू की प्रवेश परीक्षा में अब बहुविकल्पीय प्रश्न होंगे, जो अंग्रेजी में होंगे. इसका अर्थ हुआ कि हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों के लिए एक और राष्ट्रीय स्तर के संस्थान के दरवाज़े बंद हो गए.

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय. (फोटो: शोम बसु)

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय. (फोटो: शोम बसु)

इस महीने देश भर के कई छात्र नई दिल्ली के प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की प्रवेश परीक्षा में बैठेंगे. इनमें भारत के छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों के ऐसे हजारों विद्यार्थी होंगे, जिन्होंने हिंदी या दूसरी देशी भाषाओं में स्नातक की डिग्री ली होगी.

जेएनयू हिंदी माध्यम के छात्रों के साथ ही कला के विद्यार्थियों के भी लिए कुछ अपवाद सरीखे विश्वविद्यालयों में से था, क्योंकि यह उन्हें प्रवेश परीक्षा में हिंदी माध्यम में जवाब लिखने की इजाजत देता था, जो छोटे निबंधनुमा सवालों पर आधारित रहते थे.

लेकिन इस बार से ऐसा नहीं होगा क्योंकि 2014 के बाद भारतीय जनता पार्टी द्वारा नियुक्त नए प्रशासन ने अब तक चली आ रही प्रवेश की प्रक्रिया को अंग्रेजी माध्यम की ऑनलाइन बहु-वैकल्पिक प्रश्नों वाली परीक्षा से बदल दिया है.

जेएनयू की प्रवेश परीक्षा पास करना और कुछ वर्षों के लिए वहां पढ़ना एक सफल करिअर बनाने में मदद करता है- चाहे नौकरशाही हो या अकादमिक जगत. जैसा कहा भी जाता है कि इस बात का बहुत ज्यादा महत्व नहीं है कि आप किस विषय या पाठ्यक्रम में दाखिला ले रहे हैं- जेएनयू में कोई भी पाठ्यक्रम पर्याप्त तौर पर अच्छा है.

सबसे महत्वपूर्ण होता है समग्र अध्ययन का अनुभव और कैंपस के भीतर व्यक्तित्व के विकास के लिए मिलने वाले मौके. एक घृणित राजनीतिक हमले के तहत भाजपा और कुछ टीवी चैनल फरवरी, 2016 से ही विश्वविद्यालय परिसर के भीतर वाम राजनीति के वर्चस्व को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं.

विचारों से लड़ने के इससे बेहतर तरीके हैं. आज विश्वविद्यालय की छवि को तार-तार कर दिया गया है. यहां तक कि आम चुनावों के वक्त भी ‘राष्ट्रद्रोही वामपंथी’ और टुकड़े-टुकड़े गैंग के बारे में हर तरह के आरोप उछाले जा रहे हैं.

कुछ लोग मोहनदास पाई (मनीपाल ग्लोबल एजुकेशन, जिसका माध्यम अंग्रेजी है और जो ख़ासा महंगा है, के चेयरमैन) जैसे भी हैं, जिन्हें वास्तव में इस बात से दिक्कत है कि जेएनयू की ट्यूशन फीस या होस्टल फीस इतनी कम क्यों है?

कई नव-उदारवादियों को लगता है कि इस पर बहुत ज्यादा सब्सिडी दी जा रही है. वहीं ‘हिंदू संस्कृति’ के कई ‘रखवालों’ को लगता है कि यहां लड़के और लड़कियों को आपस में मिलने-जुलने की बहुत ज्यादा आजादी है.

भारत में उच्च शिक्षा एक विशेषाधिकार है, जो बहुत से लोगों की पहुंच से बाहर है. राष्ट्रीय स्तर के ज्यादातर संस्थान और विश्वविद्यालयों में अंग्रेजी ही पढ़ाई का एकमात्र माध्यम है, जो हिंदी माध्यम के छात्रों के लिए अकादमिक जगत और अन्यथा सफलता की राह में रोड़ा अटकाने का काम करता है.

अंग्रेजी का अत्याचार ऐसा है कि महानगरों से बाहर जन्मे और पले-बढ़े हैं, (कई बार मेट्रो वाले भी) पीछे छूट जाते हैं. अंग्रेजी माध्यम के स्कूल प्राइवेट या महंगे हैं और कई तो पढ़ने और लिखने का जरूरी कौशल भी नहीं सिखाते हैं.

छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों के विद्यार्थी सिर्फ ऐसे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जा सकते हैं, जिसका कामकाज हिंदी में चलता है. पढ़ाई के माध्यम या भाषा से कोई जगह सीखने के लिहाज़ से अच्छी या खराब नहीं होती. खराब अकादमिक माहौल या शिक्षकों की निष्क्रियता के साथ-साथ शिक्षकों की कमी और जरूरी बुनियादी ढांचे का अभाव ऐसी स्थिति तैयार करता है.

जोधपुर के जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय के बीए के छात्र के तौर पर मैंने वहां तीन साल (2001-2004) कक्षाओं या लेक्चर्स के घोर अभाव में बिताए. प्रोफेसर कक्षाओं में लेक्चर देने नहीं आते थे; जो आते भी थे, वे हमें गुजरे जमाने के नोट्स से पढ़ाते थे. वे हमें राजनीति और इतिहास की जटिलताओं को समझाने की जगह उत्तर लिखवा दिया करते थे.

मैंने वैकल्पिक पेपर के तौर पर अंग्रेजी साहित्य का चयन यह सोचकर किया था कि इससे मेरी अंग्रेजी में सुधार होगा. लेकिन कक्षाओं के नियमित न लगने की वजह से इससे भी कोई फायदा नहीं हुआ.

आज भी अंग्रेजी साहित्य के छात्र कोचिंग के भरोसे अपना सिलेबस पूरा करते हैं. जो कोचिंग का खर्च नहीं उठा सकते हैं, वे बाजार में बिकनेवाली गाइड बुक या कुजियों की मदद से अपनी नैया पार लगाने की कोशिश करते हैं. पूरे साल न कोई कोई अर्धवार्षिक परीक्षा (मिड टर्म टेस्ट) होती थी, न टर्म पेपर्स या असाइनमेंट होते थे, जिनकी छात्रों को चिंता करनी पड़े.

कला संकाय (आर्ट्स फैकल्टी) में लाइब्रेरी की सुविधा बस एक दिखावा थी. इसमें अंदर जाने का कोई रास्ता तक नहीं था, जिसके छात्र भीतर कदम तक रख सकें और किताबों को उलट-पलट सकें.

लाइब्रेरी के नाम पर बस एक खिड़की थी, जिसके पीछे एक कर्मचारी बैठा होता था, जो छात्रों को किताबें, जो मुख्य तौर पर पाठ्य पुस्तकें होती थीं, दिया करता था. न कोई अखबार आता था, न छात्रों के पढ़ने के लिए कोई जर्नल या पत्रिका मंगाई जाती थी. लाइब्रेरी में कोई मेज या कुर्सी नहीं थी.

अब जोधपुर में कई छोटे हॉल और कमरे हैं, जिन्हें ‘लाइब्रेरी’ कहा जाता है. इन्हें बिल्डरों या दुकानदारों द्वारा चलाया जाता है, जो छात्रों से मेज -कुर्सी पर बैठकर चुपचाप पढ़ने की जगह देने के लिए महीने के हिसाब से पैसे लेते हैं.

मुझे बताया गया है कि यहां ऐसी फर्जी लाइब्रेरी, जो असल में रीडिंग हॉल्स से ज्यादा नहीं है, की काफी मांग है. इनका अस्तित्व इसलिए है क्योंकि इस हिंदीभाषी शहरों में छात्रों के पास जाने के लिए ऐसी कोई जगह नहीं है, जहां वे पढ़ने का सुख उठा सकें.

हिंदी माध्यम विश्वविद्यालयों की बदहाल स्थिति पढ़ाई और व्यक्तित्व के विकास के ज्यादा मौके नहीं देती है. राजस्थान के सरकारी विश्वविद्यालयों का हाल बेहाल है. इनमें पढ़कर सफल होनेवाले विद्यार्थियों में से ज्यादातर अपने बलबूते पर या परिवार के सहयोग से कामयाबी हासिल कर पाते हैं.

वे जेएनयू जैसे राष्ट्रीय विश्वविद्यालय तक पहुंचने के लिए कठिन मेहनत करते हैं. उन्हें मालूम है कि इन जगहों पर पहुंचकर वे अपने सपने को साकार कर सकते हैं.

जेएनयू गैर-अभिजात्य यानी साधारण व्यक्ति को समर्थ बनाता है. लेकिन बहुउत्तरीय प्रश्नों वाली नई ऑनलाइन प्रवेश परीक्षा हिंदी माध्यम के छात्रों के नजरिए से दुखद है. पहली बात कि ये अब तक मिली हिंदी में जवाब लिखने की आजादी को छीनने वाली है.

जब मैं दिल्ली में अपनी आगे की पढ़ाई करना चाहता था, उस वक्त हिंदी में उत्तर लिख सकने का मौका मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी. जेएनयू की पुरानी दाखिला नीति सबको बराबरी का मौका देती थी क्योंकि इसकी परीक्षा अपने स्वभाव में समावेशी थी.

दूसरी बात, यह मान लेने का कोई तुक नहीं है कि वस्तुनिष्ठ (ऑबजेक्टिव) ऑनलाइन परीक्षा बेहतर है. राजनीति विज्ञान और इतिहास जैसे विषयों के लिए परीक्षा विश्लेषणात्मक होनी चाहिए, जबकि बहु-वैकल्पिक प्रश्नों का प्रारूप जानकारियों को रटने पर आधारित है.

तीसरी बात, छोटे कस्बों और गांवों में एक बड़ी तादाद ऐसे लोगों की है जो आज भी कंप्यूटर या इंटरनेट के इस्तेमाल के अभ्यस्त नहीं हैं. एक निजी कंप्यूटर या लैपटॉप होना एक विलासिता है, जो कइयों के पास उपलब्ध नहीं है.

यहां तक कि अगर उनके पास स्मार्टफोन है भी तो भी शायद ही इस पर उनकी ऐसी स्पीड हो, जिसकी जरूरत ऑनलाइन परीक्षा देने के दौरान पड़ती है. हकीक़त यह है कि ‘इंडिया शाइनिंग’ की तरह ही ‘डिजिटल इंडिया’ भी एक फरेब है.

जेएनयू की सामाजिक-सांस्कृतिक माहौल का निर्माण एक खास तरीके से किया गया था, जो कि समाज की नुमाइंदगी करने वाला था. अलवर से भूतपूर्व विधायक ज्ञानदेव आहूजा का यह आरोप कि जेएनयू ड्रग्स का अड्डा है, जहां हर दिन 3000 कंडोम और 200 शराब की बोतलें निकलती हैं, उनकी विकृत और गंदी सोच का परिचय देनेवाला था. लेकिन उनके राजनीतिक आकाओं ने उनके इस गैर-जिम्मेदाराना बयान की भर्त्सना नहीं की.

यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि भाजपा अपने कर्णभेदी हिंदी-हिंदू-राष्ट्रवाद के जरिए हिंदी के पक्ष में खड़े होने का दावा करती है. हिंदी को इच्छित ‘हिंदू राष्ट्र’ की राष्ट्रभाषा बनाने दबी जबान बुदबुदाहट को आज भी सुना जा सकता है.

यह एक बेवकूफी भरी इच्छा है, मैं खुद को हिंदी से ज्यादा अपनी मातृभाषा मारवाड़ी से जुड़ा हुआ पाता हूं. ऑनलाइन परीक्षाओं के प्रति अपनी दीवानगी के बीच भाजपा को हिंदी माध्यम के वंचित छात्रों की कितनी चिंता है, यह कोई भी देख सकता है.

यह एक हास्यास्पद दोहरापन है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद हिंदी में संवाद करने में गर्व का अनुभव करते हैं, लेकिन फिर भी उनकी सरकार ने उस भाषा में उच्च शिक्षा हासिल करने की ख्वाहिश रखने वालों के लिए कुछ नहीं किया.

(खिंवराज जांगिड़ सोनीपत की ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं.)

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