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रेल मंत्री कृपया ध्यान दें!

केंद्रीय रेल मंत्री सुरेश प्रभु के नाम एक यात्री का पत्र.

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रेल मंत्री सुरेश प्रभु. (फाइल फोटो: पीटीआई)

मैं जब कभी रेल यात्रा पूरी करता हूं , मैं सोचता हूं कि आपको एक चिट्ठी लिखूंगा.

रेल में खाने के बारे में, शौचालय के बारे में, बेडशीट के बारे में, सफाई के बारे में,पानी के बारे में, ट्रेन के बहुत-बहुत देरी से चलने के बारे में, टिकट के कैंसलेशन के नाम पर कटने वाली बड़ी राशि के बारे में, पैंट्रीकार द्वारा कीमत से ज़्यादा पैसे वसूले जाने के बारे में और ट्रेन-प्लेटफॉर्म पर उन बहुत सारे न दिखाई देने वाले लोगों के बारे में जो तरह-तरह की चीज़ें जेब में कम पैसे होने पर भी यात्रियों के खाने की ज़रूरतों को पूरी कर देते थे.

मैं फिलहाल बनारस की न हो सकने वाली और बलिया आने-जाने को की गई चार दिन की रेल यात्रा के अनुभवों को आपके सामने रख रहा हूं.

मुझे 29 अप्रैल को बनारस जाना था और 1 मई को बनारस से बलिया.

29 अप्रैल को मैं रात भर नई दिल्ली स्टेशन पर बैठा रहा. स्वतंत्रता सेनानी नाम की ट्रेन के बारे में आपका विभाग ये बताने में बार-बार अपनी असमर्थता प्रमाणित करता रहा कि आखिरकार वह ट्रेन नई दिल्ली स्टेशन से कब रवाना होगी.

जब ये बताया गया कि रात डेढ़ बजे जाने की संभावना है तो मैंने ये सोचा कि रेल विभाग इससे ज़्यादा अपनी अक्षमता को ज़ाहिर करने से शर्म करेगा.

मैंने टैक्सी में 297 रुपये ख़र्च किए और नई दिल्ली स्टेशन के प्लेटफॉर्म की सीढ़ियों पर बैठा रहा क्योंकि प्लेटफॉर्म पर यात्री की संख्या के मुताबिक बैठने की व्यवस्था भी आपका विभाग नहीं कर सका है और न ही वहां शौचालय आदि की व्यवस्था होती है.

उन क्षणों के अनुभवों व तकलीफों से शायद आप कभी नहीं गुज़रे. बूढ़े, बच्चे, महिलाओं के चेहरे याद करें, शायद आपके भीतर संवेदना जागे. रात डेढ़ बजे के बाद ये बताया गया कि सुबह पांच बजे ट्रेन जाएगी और सुबह के पांच बजने से पहले स्वतंत्रता सेनानी के सुबह साढ़े दस बजे जाने की सूचना दी गई.

शरीर से बहते पसीने के बीच जाड़े की धुंध के दिनों की याद आ गई. मुझे नई दिल्ली स्टेशन से फिर टैक्सी लेकर लौटना पड़ा क्योंकि आप जानते हैं कि उस समय न तो मेट्रो चलती है और बसें तो मिलनी लगभग बंद हो चुकी है. टैक्सी को मैंने फिर ढाई सौ रुपये चुकाए.

मैं प्रतिशत निकालकर बताऊंगा कि आपके विभाग की अक्षमता ने मेरी जेब से मेरी मेहनत की कितनी कमाई बर्बाद करने के लिए विवश किया. मैं शारीरिक रूप से अस्वस्थ था ये तो आपके विभाग के लिए कोई मायने ही नहीं रखता. वह राष्ट्रगान की तरह धुन में बोलता रहता है कि यात्रियों को हुई असुविधा के लिए हमें खेद हैं.

ज़ाहिर है कि मैं बनारस नहीं जा सका तो मुझे बनारस से बलिया के लिए सारनाथ एक्सप्रेस का टिकट भी रद्द करवाना पड़ा. आपको पता है कि मेरे कितने प्रतिशत पैसे रेल विभाग ने मुझसे छीन लिए?

तीन सौ पचहत्तर रूपये के टिकट से मुझे महज एक सौ पैसठ रुपये वापसी का संदेश आया. वह भी एक हफ्ता बीत जाने का बाद भी मेरे बैंक खाते में नहीं आया है.

आप हिसाब लगाते रहिए क्योंकि आप खाता-बही में माहिर मंत्री है. सीए तो ज़्यादा बारीकी से इस यात्रा में तमाम स्तरों पर होने वाली पीड़ाओं और भावों को पैसे में परिवर्तित करके पूरे नुकसान का आंकड़ा पेश कर सकता हैं.

मैंने 1 मई के लिए गरीबरथ बलिया जाने के लिए बक्सर का टिकट लिया. पत्रकार होने के कारण आपके विभाग ने ये एक सुविधा दे रखी है कि यदि यात्रा आवश्यक हो तो प्रतीक्षा सूची वाले अपने बर्थ को कन्फर्म कराने के लिए आवेदन दे सकूं. लेकिन मेरा टिकट कन्फर्म नहीं हुआ.

आपको पता है कि मेरी इस यात्रा टिकट को रद्द कराने के लिए आपके विभाग ने मेरे साठ रुपये काटे. टिकट की कीमत का ये कितना प्रतिशत होता है मंत्री जी?

जैसा कि मैंने आपको बताया कि मेरा बलिया जाना ज़रूरी था. मैंने फिर कोशिश की और बक्सर के लिए मगध एक्सप्रेस का टिकट लिया. बलिया आने-जाने के लिए आपको पता ही है कि तकलीफदेह यात्रा के लिए भी कितनी कम ट्रेनें हैं.

मगध एक्सप्रेस में आपके विभाग में जनसंपर्क अधिकारियों की कड़ी मेहनत से मुझे यात्रा के लिए बर्थ मिल गई. इस यात्रा में एक दिलचस्प जानकारी मिली. ट्रेन में पीने का पानी खरीदने के लिए यात्री परेशान थे. पता चला कि रेल के साथ यात्रा कर रहे कर्मियों के पास पानी की बोतलें मिल सकती है.

खैर मैं तो पानी की दो-दो बोतलें लेकर चलता हूं. भरोसा के खोने की स्थिति और माली हालत ने डरा-सा दिया है, लेकिन 2 मई की सुबह मुगलसराय प्लेटफॉर्म पर तो हद हो गई.

इसकी तो मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी. पता नहीं सुबह आप चाय पीते है या नहीं. लेकिन बहुत सारे लोगों की तरह मैं भी चाय पीता हूं. सुबह-सुबह प्लेटफॉर्म पर पहुंचते ही चाय का एक रागात्मक स्वर सुनने को मिलता रहा है.

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(फाइल फोटो: पीटीआई)

मुगलसराय के प्लेटफॉर्म पर मैं सैकड़ों बार उतरा हूं. दिन-दिनभर वहां बिताने का अनुभव हैं. लेकिन वहां पहली बार मैंने देखा कि एक भी वह चेहरा मौजूद नहीं था जो कि चाय बनाते हुए चाय-चाय की आवाज लगाता था.

प्लेटफॉर्म पर एक बड़ा सा रेस्टोरेंट देखा. लेकिन वहां भी चाय नहीं थी. मैं चाय के लिए प्लेटफॉर्म पर इधर-उधर भागता रहा. मुझे एक चीज़ देखने को मिली कि किसी ने भी स्टॉल या रेस्टोरेंट पर मिलने वाली चीजों की कीमतें इस तरह लगा रखी थी जैसे चेहरे पर कान होते हैं.

सभी स्टॉल पर केवल कॉफी मिल रही थी और उसकी कीमत थी बीस रुपये. सात रुपये वाली चाय की जगह वैसे लोग बीस रुपये में कॉफी पीने के लिए मजबूर थे जो कि सुबह कुछ गर्म पीने से खुद को नहीं रोक पाते हैं.

मैंने ये सोचा कि मैं दिल्ली लौटकर आपको ये बताउंगा कि वाराणसी के पास मुगलसराय जंक्शन पर चाय मिलनी बंद हो गई है. मीडिया में आप लोगों के चाय पीने की ख़बर तो आ सकती है लेकिन चाय और चाय बेचने वालों के गायब हो जाने की ख़बर नहीं मिल सकती है.

मैं घंटे भर से ज्य़ादा देर चलने वाली मगध से बक्सर पहुंचा और 2 मई की रात पौने दस बजे स्वतंत्रता सेनानी से लौटने की मानसिकता में दिनभर भाग दौड़ करता रहा. आपको फिर ये बताते हुए तक़लीफ हो रही है कि मेरे जैसे सैकड़ों लोग किस तरह उस दिन तक़लीफों से गुजरें.

स्वतंत्रता सेनानी 3 मई की सुबह लगभग चार बजे आई. हम उस दिन भी रात भर जगते रहे. कहीं जाते वक्त घर के लोगों और लौटते वक्त विदा करने वाले परिवारों के सदस्यों की तकलीफों को भी यहां जोड़ लें.

चार बजे सुबह स्वतंत्रता सेनानी बलिया के प्लेटफॉर्म नंबर तीन पर आई और चार मई को दिल्ली स्टेशन से मैं सुबह चार बजे अपने घर लौटा.

ज़ाहिर है कि फिर मुझे टैक्सी लेनी पड़ी. तीन सौ रुपये खर्च हुए. जैसा कि मैंने आपको बताया कि मैं भरोसा खो चुका हूं इसीलिए खाना-पानी साथ लेकर चलता हूं. लेकिन जिनका भरोसा बना हुआ है उनकी हालत पर आप ज़्यादा गौर करें.

मैं आईआरसीटीसी की वेबसाइट के माध्यम से टिकट ले रहा था तो मुझे सूचना की एक पट्टी घूमती हुई दिखाई दी. उसमें आपने बताया है कि किसी यात्री के टिकट के मूल्य का 43 प्रतिशत राशि आम नागरिक वहन करते हैं.

लेकिन मैं चाहता हूं कि मैं अपनी हर यात्रा के कार्यक्रम के लिए टिकट लेने के बाद ये एक पट्टी अपने शरीर पर चिपका लूं कि एक आम नागरिक का कितना प्रतिशत रेल मंत्रालय ने बिना यात्रा किए छीन लिया.

रेल विभाग के निकम्मेपन की वजह से एक आम यात्री को कितना प्रतिशत ज़्यादा खर्च करना पड़ा. यात्रियों को होने वाली तकलीफों के समतुल्य कितना आर्थिक नुकसान हुआ.

  • 29 अप्रैल को ट्रेन के जाने के समय को बार-बार बदलने के कारण घर और स्टेशन के बीच आने-जाने में सौ प्रतिशत का नुकसान हुआ.
  • रेल विभाग के कारण शारीरिक अस्वस्थता के कारण सौ प्रतिशत का नुकसान हुआ.
  • रेल विभाग की वजह से एक ट्रेन की यात्रा नहीं कर पाने के हालात में दूसरे टिकट को रद्द कराना पड़ा.
  • वाराणसी से बलिया के एक टिकट पर 58 प्रतिशत राशि रेल मंत्रालय ने जबरन वसूल लिया.
  • 1 मई को गरीबरथ का प्रतीक्षा सूची के टिकट के कन्फर्म नहीं होने के कारण टिकट के रद्द होने पर साठ रूपये वसूल लिये गए.
  • 4 मई को ट्रेन के बाईस घंटे से ज़्यादा देरी से पहुंचने के कारण स्टेशन से घर के लिए टैक्सी ख़र्च में सौ प्रतिशत का नुकसान हुआ.

आपसे यात्रियों के प्रति संवेदनशील होने की एक इंसानी अपील कर रहा हूं.

अनिल चमड़िया

(लेखक मीडिया स्टडीज ग्रुप के चेयरमैन व मासिक शोध पत्रिका जन मीडिया के संपादक हैं)