समाज

‘ये लेखन की परिपक्व उम्र नहीं, अभी थोड़ा और पकिए’

किस दिन, किस मुहूर्त में लेखक बना, याद नहीं न इसका जरा भी भान हुआ. बस याद रही इस यात्रा की वो सारी बातें जो खुद में एक उपन्यास है

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याद है जब किताब लिख कर पांडुलिपि की फोटोकॉपी को 20 रुपये के फाइल में लेकर कैसे रोज दरियागंज के नई सड़क पर टहलता था.

मुझे अब भी याद है अंसारी रोड पर छोले-कुल्चे बेचता वो आदमी जो मुझे देखते हुए मुस्कुराकर छोले बनाता और बाकि खड़े लोगों से हंस के बताता, ‘ये बंदा लेखक बनने आया है, कोई छाप ही नहीं रहा इसे, मैं 10 रुपये के डबल छोले दे देता हूं, स्टूडेंट टाइप ही है अभी, बड़ा स्ट्रगल कर रहा बंदा.’

मुझे नहीं पता वो कैसे बिना पन्ना पलटे मुझे तह तक पढ़ लेता था, मैं वाकई पागलों की तरह भटकता रहता था दरियागंज में.

खैर उसने छोला तो डबल दिया, सो दिया ही साथ अनजाने में एक गजबे मंत्र दे दिया. और वो ये कि ये लेखक बनना चाहता है, कोई छाप नहीं रहा.

मुझे तब समझ आया कि, लेखक होने का अर्थ केवल लिखने से नहीं बल्कि असली अर्थ किसी भी तरह से छपने से है.

आगे जैसे-जैसे बढ़ता गया, लेखक बनने की नई-नई शर्त का ज्ञान होता गया.

एक संपादक के दफ्तर बैठा था, उन्होंने उम्र पूछी. मैंने उम्र बताया तो बोले, ‘ये लेखन की परिपक्व उम्र नहीं, अभी थोड़ा और पकिए.’

मैंने पूछा, ‘सर, लेखन में कितना उम्र वाले को पका माना जाता है?’

उन्होंने मोबाइल पर ऊंगली फेरते हुए बताया, ‘हमें देखिए, दाढ़ी-बाल पकने लगे तब जा के आज पकी हुई रचनाएं लिखता हूं, खुद छापता भी हूं.’

मैं अपनी युवा उम्र को कोसने लगा, सोचने लगा क्या जरूरत थी इत्ते दिन जवान रहने की, अच्छा खाने-पीने की. आज अगर जैसे-तैसे कुपोषित की तरह रहता छप के लेखक तो हो जाता.

तभी मेरा ध्यान अपने दाढ़ी के उस एकमात्र पके बाल पर गया जिसे तीन दिन पहले ही नाई ने दिखाया था बाल बनाते वक्त.

मुझे वो सफेद बाल अंधेरे में रोशनी की तरह याद आया.

वॉव! माय गॉड, मैंने अच्छा किया वो बाल नाई को हटाने न दिया.

अब मेरी सारी उम्मीद वो पकी सफेद दाढ़ी थी जिसे दिखाकर मुझे अपने परिपक्व लेखन को सिद्ध करना था.

मैंने अपने मुरझाए चेहरे को और मनहूस की तरह बनाते हुए पूरे गाल पर पकी उस एक सफेद दाढ़ी को अंदाज़न टोहा और संपादक महोदय को दिखाया.

वो झल्लाई हंसी के साथ ह्वाट्स ऐप पर आईं तस्वीरों से बिना नज़र हटाए बोले, ‘हम्म! भाई मेरे, एक-दो पके बाल वाले 100 लोग रोज़ आते हैं यहां लेखक बनने, सबको लेखक बना दूं क्या, आप लोग जैसे सिंगल पकी दाढ़ियों वाले के कारण हिंदी का स्तर इतना गिर गया है?’

मैंने कुर्सी से उठ हाथ जोड़ा, ‘सर आपके जितना गुच्छे में बाल पकने में तो 20 साल और लग जाएगा, उसमें भी खान-पान और नींद भी ख़राब कर खूब मेहनत करूंगा, मनहूस दिखूंगा तब जा के ऐसा हो पाऊंगा. कृपया आप मेरी रचना पढ़ लें सर, उसे पढ़ के बताएं न सर कि वो पकी हैं कि नहीं.’

इस बार खड़े संपादक हो गए, फोन को टेबल पर पटका और बोले, ‘रचना खाक पढूंगा आपका, जब रचनाकार ही नहीं पका तो खाक पका होगा आपका रचना, आप निकलिए यहां से.’

क्या करता मैं? निकल लिया.

एक दिन एक नए के संपादक के दफ्तर में था. उन्होंने जब मेरी आपबीती सुनी तो रो दिए, मैंने उनको संभाला. मुझे वो दयालु और साहित्य का कद्रदान मिल गया था जिसकी मेरे रचनाशीलता को तलाश थी.

मैंने उनसे कहा, ‘सर, मेरी रचना पढ़ लें और बताएं कि ये पकी हुई छपने लायक हैं या नहीं.’

उन्होंने डबडबाई आंखों से ही कहा, ‘अब मैं तो बस आपके संघर्ष को नमन करना चाहता हूं, रचना चाहे जितनी भी कच्ची भी हो उसे पकाना और प्रकाशक को दिखाकर छपवाना मुझ पर छोड़ दीजिए.’

मैं पहली बार सुन रहा था कि, आम-पपीता की तरह कच्ची रचनाएं भी पकाई जा सकती हैं.

मैंने जिज्ञासावश पूछा तो उन्होंने बताया, ‘सुनिए आप लेखक बनने से मतलब रखिए, आप प्रेमचंद थोड़े हो जाइएगा. जितना पका है, बाकि पका देंगे हम. आप 30,000 रुपये जमा कर दीजिए फिर देखता हूं आपकी कलम की ताकत को कौन रोक पाता है.’

अब आंख डबडबाने की बारी मेरी थी. मैं शून्य में देखता उठा और कब सड़क पर आ के खड़ा हो गया याद नहीं.

एक प्रकाशक ने तो रचना हाथ में लेते ही ऐसे फेंका जैसे हाथ में करैत सांप रख दिया किसी ने. वो जोर से चिल्लाया मुझ पर, ‘हिंदी के उपन्यास का नाम अंग्रेजी में? नाश करने आए हो क्या हिंदी का.’

वहां खड़े दूसरे लोग मुझे देखने लगे, उन्हें आज हिंदी के नाश का सबसे बड़ा जिम्मेदार आदमी पकड़ाया हुआ दिख गया था. मैं सोचू कि आज तो पिट जाऊंगा हिंदी का विनाश करने के जुर्म में.

तभी मुझे पिछले संपादक का दिया फार्मूला याद आया, सोचा वही लगा कि छपवा लूं अब और कितना भटकूं. मैं झट बोला ‘सर मैं हिंदी के विकास के लिए कुछ पैसे भी लगाऊंगा, क्या तब छाप देंगे आप?’

अब थोड़ा ठंडा होकर वो संपादक बोले, ‘ठीक है, चलो जल्दी सन्मति आ गई तुम्हें. इसी तरह समय रहते बात समझ लिया करो तो बड़ा लेखक बनना बड़ा बात नहीं. मैं खुद अपनी छाप बड़ा लेखक हूं. सुनो जो सहयोग राशि लगेगा वो हम बता देते हैं, दे देना और किताब का नाम हिंदी में रख के छाप देंगे.’

मैंने कहा, ‘सर सहयोग राशि दे दूंगा पर नाम अंग्रेजी में ही रहने दीजिए, वो कहानी से जुड़ा है. आप कहानी पढ़ के देख लीजिए. नाम बदलने पर कहानी की आत्मा मर जाएगी.’

संपादक सह प्रकाशक ने इस बार मुझे ऊंगली दिखाते हुए कहा, ‘सुनो! मेरा अपना उसूल भी है कुछ, सहयोग राशि लेने का कायदा होता है मेरा. मैं तुम्हारी कहानी की आत्मा के लिए हिंदी की आत्मा नहीं मारूंगा. लोग मुझे इसी कारण तो सहयोग करते हैं, तुम्हारे एक के चक्कर में पचास सहयोग नहीं खत्म करना. उठाओ अपना फाइल और निकल लो.’

मैं जमीन पर पड़े फाइल बटोरने लगा, सोचा कि हां, हिंदी की आत्मा को सहयोग राशि मिलता रहे और ये इसी से जिंदा रहे इसके लिए ठीक ही है कि मैं यहां न छपूं. मैं हिंदी के उस जीवनदायी प्रकाशक को प्रणाम कर निकल लिया.

बाद में एक मेरी ही तरह घूमते पत्रकार भाई मुझसे टकराए और बोले, चलिए! आपको छाप हम प्रकाशक बन जाते हैं और आप लेखक.

मेरी किताब छपी और अंग्रेजी के नाम के ही साथ छपी और बाद में युवा साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाज़ी गई. मुझे नहीं पता कि इससे हिंदी की आत्मा को कितना नुकसान पहुंचा, वो कितना जिंदा है और कितना मर गई मेरे कारण, पर मैं इतना जरूर जानता हूं कि नए लिखने वालों को सबसे अधिक भरोसा खुद पर रखना होगा और अपनी लेखनी पर.

आज भी मेरे लेखक बनने की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है. और ये अच्छा भी है, लेखक हो जाना आपको संतुष्ट कर सकता है इसलिए जरूरी है कि हम नए लिखने वाले हमेशा लेखन की यात्रा में ही रहें, लेखक हो जाने के भ्रामक मंजिल तक न पहुंचें. आज भी हम नए लोग का संघर्ष इस रूप में जारी है.

मैं कई बड़े लेखक को अपनी किताब पढ़ने देता हूं. बाद में पूछता हूं, ‘सर पढ़े, पढ़ के कुछ सुधार के बारे में बताइए न सर.’

जवाब मिलता है, ‘कितनों को पढूं भाई, महीने में 100 किताबें आती हैं, मित्रों को पढ़ के फुर्सत मिले तो आपको भी पढूं.’ ये बोल वो दांत चिहार देते हैं.

मैं अबकी पुस्तक मेले में एक बड़े लेखक से विनम्रता से कहा, ‘सर जिस दिन युवा लेखकों को पता चल जाएगा कि आप उन्हें पढ़ने की फुर्सत नहीं निकाल पाते, वे आपको किताब भेजने की फुर्सत आप पर बर्बाद करना छोड़ देंगे. फिर महीने में तीन किताब ही मिलेगी पढ़ने को, वो भी नहीं पढ़ने लायक होंगी.’

ये सुन वो मफलर समेटे और निकल लिए.

नए लेखक की आज सबसे बड़ी चुनौती है, किसी मान लिए गए लेखक से पढ़ के स्वीकार या ख़ारिज होना. यहां सब नए कच्चे बोल के बिना पढ़े खारिज हैं और ये ही नए लेखन की सबसे बड़ी चुनौती है.

हमें छपने से लेकर बिकने तक कोई स्थापित रचनाकार पढ़ता ही तो नहीं. ये चलन बदलना चाहिए और ये चलन बदलेगा ‘पाठक’.

नए लोग पाठक के बीच जाएं बजाय साहित्य के शंकराचार्यों के पास. पाठक पढ़ेगा तो सब पढ़ेंगे, वो भी जिनकी नजर में आप अभी पके नहीं हैं.

 

(लेखक की पहली कृति  ‘डार्क हॉर्स’ को युवा साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला है)

  • Guman Singh Raniwara

    एक लेखक बनने में आने वाली दिक्कतों को लेकर पब्लिश आपकी पोस्ट बेहतरीन है