भारत

क्या भाजपा की जीत को ‘भारत की जीत’ कहा जा सकता है?

नरेंद्र मोदी की जीत का भारत के लिए क्या अर्थ निकलता है? एक हद तक यह उन्हें और भाजपा को दावा करने का मौका देता है कि पिछले पांच सालों में उन्होंने जो कुछ भी किया है, उसके प्रति जनता ने अपना विश्वास जताया है. पर क्या यह सच है?

लोकसभा चुनाव रुझानों में भाजपा गठबंधन का बढ़त मिलने के बाद नई दिल्ली स्थित पार्टी मुख्यालय पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली स्थित पार्टी मुख्यालय पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह. (फोटो: पीटीआई)

300 सीट और 2014 में भारतीय जनता पार्टी को मिले मतों से ज्यादा मत प्रतिशत के साथ नरेंद्र मोदी के पास 2019 के लोकसभा चुनाव के नतीजों से संतुष्ट होने की तमाम वजहें हैं. किसी भी दूसरे व्यक्ति की अपेक्षा वे बेहतर जानते हैं कि यह नतीजे कैसे आए हैं.

अकूत धनबल के सहारे चलाए गए उनके चुनाव अभियान में बहुत होशियारी से पांच साल पहले 2014 में उनके किए गए विकास के वादों का कोई जिक्र नहीं किया गया. इसकी जगह उनका भरोसा हिंदुओं के दिमाग में मुसलमानों को लेकर भय पैदा करने और खुद को आतंकवाद को हराने में सक्षम एकमात्र भारतीय नेता के तौर पर पेश करने पर ज्यादा था.

मोदी ने खुले तौर पर पुलवामा आत्मघाती हमले में शहीद हुए अर्धसैनिक बलों के जवानों का इस्तेमाल एक चुनावी हथियार के तौर पर किया और मर्यादाओं को तार-तार करते हुए उनके नाम पर वोट मांगने से भी नहीं चूके. उन्हें इस बात से भी मदद मिली कि मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के पास इस सनकी रणनीति का कोई तोड़ नहीं था.

वर्धा में मोदी ने यह दावा करते हुए खुलेआम धर्म के नाम पर हिंदू मतदाताओं से वोट मांगा कि आतंक फैलाने के आरोप में प्रज्ञा सिंह ठाकुर के खिलाफ मुकदमा चलाकर उनके धर्म को बदनाम किया गया. उन्होंने वायनाड सीट से राहुल गांधी के चुनाव लड़ने का मजाक बनाया, ‘वहां अल्पसंख्यक बहुमत में है’, मानो मुस्लिम इस देश के बराबरी के नागरिक नहीं हैं.

ध्रुवीकरण करने वाले ये बयान टेलीविजन पर लाइव दिखाए गए और पूरे देश में भाजपा के प्रोपगैंडा तंत्र द्वारा इन्हें फैलाया गया, जिसने यह सुनिश्चित किया कि यह जहर दूर-दूर तक चारों तरफ फैल जाए. असम और पश्चिम बंगाल में इसने बांग्लादेश से आनेवाले अप्रवासियों के लिए धर्म आधारित नागरिकता के भाजपा के प्रस्ताव को खाद- पानी देने का काम किया.

जब चुनाव आयोग ने यह जतला दिया कि वह आदर्श आचार संहिता के इतने खुलेआम उल्लंघनों के लिए मोदी पर किसी तरह की कोई कार्रवाई या उन्हें चेतावनी तक देने तक के लिए तैयार नहीं है, तब मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने एक कदम और आगे बढ़ते हुए प्रज्ञा सिंह ठाकुर को भोपाल से पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर खड़ा कर दिया.

उनकी उम्मीदवारी न सिर्फ हिंदू कट्टरता बल्कि हिंसा और मुस्लिमों के खिलाफ आतंक को बढ़ावा देने का प्रतीक था. उम्मीदवार बनाए जाने के बाद प्रज्ञा ठाकुर का पहला बयान 2008 में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी हेमंत करकरे की (पाकिस्तानी आतंकवादियों द्वारा) हत्या के समर्थन का था, क्योंकि उन्होंने उन पर (प्रज्ञा ठाकुर पर) मुस्लिमों को मारने के लिए बम रखने का आरोपी बनाया था.

इसके बाद उनके द्वारा महात्मा गांधी के हत्यारे की प्रशंसा ने ऐसी शर्मिंदगी भरी स्थिति पैदा कर दी कि मोदी को उनसे दूरी बनाने की कोशिश करनी पड़ी. लेकिन मोदी ने यहां भी काफी सचेत तरीके से उस राजनीति की कोई आलोचना नहीं की, जिसकी नुमाइंदगी नाथूराम गोडसे करता था.

प्रज्ञा की तरह ही उनके पास भी गांधी या उनके सिद्धांतों के लिए वक्त नहीं है; लेकिन उनकी रणनीति गांधी को हथियाने और जहां संभव हो उनका इस्तेमाल करने की है, न कि उनकी हत्या को सही ठहाने की कोशिश करने की.

अगर मोदी नियमों के दायरे में रहते हुए, पूरी तरह से अपनी ‘उपलब्धियों’ और उनको लेकर जनता की धारणा और विपक्ष के नेताओं पर जनता के विश्वास के न होने पर पर भरोसा करते हुए यह चुनाव जीतते तो बात अलग होती. लेकिन ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि शायद वे जानते थे कि यह काफी नहीं होगा और अन्य बातों की भी जरूरत होगी.

किसी के लिए चुनाव में भाजपा की जीत को ‘विजयी भारत’ कहना कैसे संभव है- जैसा कि मोदी चाहते हैं- जबकि इसका मतलब भोपाल से प्रज्ञा सिंह ठाकुर की जीत को ‘भारत की जीत’ के तौर पर स्वीकार करना है?

भाजपा का बचाव करनेवाले अब यह अनुमान लगा रहे हैं कि मोदी अब चुनाव के आखिरी चरण से पहले की गई अपनी कोशिश से भी ज्यादा शिद्दत से प्रज्ञा ठाकुर से दूरी बनाएंगे. लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता.

ठाकुर को भी उसी तरह से दूध में पड़ी मक्खी की तरह बाहर कर दिया जा सकता है, जैसे प्रवीण तोगड़िया को गुजरात में किया गया था. हो सकता है कि वे मंत्री भी बन जाएं. मोदी का उद्देश्य इस देश की रगों में एक वायरस घोलने का है, एक बार उद्देश्य पूरा हो जाने के बाद व्यक्ति का कोई महत्व नहीं रह जाता है.

मोदी की अचंभित कर देने वाली जीत के तीन और पहलू हैं, जिनसे हमें चिंतित होना चाहिए. पहला, धनबल का अब तक न सुना गया इस्तेमाल, जिसमें उनकी मदद उनके ही द्वारा बनाए गए कानून ने की, जो जनता को प्रधानमंत्री के धनवान और शक्तिशाली दोस्तों की पहचान जानने से रोकता है.

इन कॉरपोरेट मित्रों ने ही भाजपा के बेहद खर्चीले चुनाव अभियान और विज्ञापन बजट का खर्चा उठाया. इस विज्ञापन बजट में एक 24 घंटे का प्रोपगैंडा चैनल भी था जो रहस्यमय तरीके से टीवी के पर्दे पर आया और गायब हो गया और चुनाव आयोग हाथ पर हाथ रखकर नियमों की धज्जियां उड़ते देखता रहा.

चूंकि हमें यह नहीं मालूम है कि भाजपा के अभियान का खर्चा किसने उठाया था, इसलिए इसके बदले में नीतियों के रूप में क्या दिया जाएगा, यह समझ पाना मुश्किल है.

दूसरी बात, मीडिया का एक बड़ा हिस्सा मोदी की महापुरुष की छवि गढ़ने और उसे फैलाने में साथ देने और विभिन्न ‘योजनाओं’ के आधार पर सरकार का स्तुतिगान करने के लिए तैयार है. निजी टीवी चैनलों द्वारा मोदी और शाह की रैलियों को बाकियों की तुलना में बहुत ज्यादा समय दिया गया.

इसके अलावा, पिछले पांच सालों में मीडिया के बड़े वर्ग ने भाजपा के बांटने और भटकाने वाले एजेंडा को आगे बढ़ाने, सार्वजनिक क्षेत्र को नुकसान पहुंचाने और सरकार की असफल नीतियों के आलोचनात्मक मूल्यांकन को भोथरा करने में सक्रिय तरीके से मदद की है.

पिछले कुछ वर्षों में मीडिया के इस धड़े ने संघ परिवार के सांप्रदायिक संदेश- ‘लव जिहाद’ से लेकर अयोध्या तक- और राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर भाजपा के बढ़ा-चढ़ाकर किए जाने वाले दावों को आगे बढ़ाने के रास्ते के तौर पर काम किया है.

मंत्रियों द्वारा बोले जाने वाले सफेद झूठों- जैसे  निर्मला सीतारमण का यह दावा कि मोदी के कार्यकाल में कोई आतंकी हमला नहीं हुआ- पर किसी ने कोई सवाल उठाना मुनासिब नहीं समझा.

पुलवामा में सुरक्षा और इंटेलिजेंस की नाकामी या बालाकोट में भारत की सवाल उठाने वाली जवाबी कार्रवाई, जिसमें भारत का एक मिग विमान मार गिराया गया, एक कैप्टन पकड़ा गया और भारतीय पक्ष द्वारा अपने ही एक हेलीकॉप्टर को मार गिराया गया, जिसमें वायु सेना के छह जवान और एक आम नागरिक की मौत हो गई, को लेकर किसी ने कोई कड़ा सवाल पूछना जरूरी नहीं समझा.

मीडिया के जिस धड़े ने मोदी सरकार के एजेंडा को आगे बढ़ाने का इंजन बनने से इनकार कर दिया, उसे मानहानि के मुकदमों, सीबीआई या टैक्स पड़ताल या ऐसी ही किसी कार्रवाई का सामना करना पड़ा. कई पत्रकारों और संपादकों को अपनी नौकरियों से हाथ गंवाना पड़ा.

सोशल मीडिया पर, जो आलोचना का एक स्रोत है, पर एक डर का माहौल बनाने के लिए और उस पर पहरेदारी बैठाने के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं और दंडवत पुलिसकर्मियों द्वारा देश के साइबर कानूनों का नियमित तौर पर और गलत तरीके से इस्तेमाल किया गया.

तीसरा, हाल के इतिहास में इस बार चुनाव आयोग का कामकाज सबसे ज्यादा पक्षपातपूर्ण रहा. चुनाव आयोग न सिर्फ मोदी और भाजपा द्वारा जन-प्रतिनिधि कानून और आदर्श आचार संहिता के खुलेआम उल्लंघनों पर कार्रवाई करने में नाकाम रहा, बल्कि इसने कई ऐसे फैसले भी लिए, जो सीधे तौर पर पार्टी को फायदा पहुंचानेवाले थे.

मसलन, पश्चिम बंगाल में कानून और व्यवस्था पर आपातकालीन संकट के आधार पर चुनाव प्रचार को पहले बंद करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 324 का इस्तेमाल, लेकिन इसकी मियाद को इस तरह से तय करना कि राज्य में प्रधानमंत्री की रैलियों में कोई व्यवधान न आए.

इन सबको मिलाकर देखा जाए तो इस तरह की जीत का भारत के लिए क्या अर्थ निकलता है? एक सीमा तक यह मोदी और भाजपा को यह दावा करने का मौका देता है कि पिछले पांच वर्षों में उन्होंने जो कुछ भी किया है, उसके प्रति जनता ने अपना विश्वास जताया है.

ऐसे में यह देश के ज्यादा सांप्रदायीकरण, निर्णय लेने के ज्यादा केंद्रीकरण, ज्यादा मनमानेपन से भरे नीति-निर्माण, कॉरपोरेटों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए ज्यादा गुंजाइश, आजाद मीडिया के प्रति ज्यादा दुश्मनी भरा भाव और निश्चित तौर पर विरोध के प्रति ज्यादा असहिष्णुता के लिए मंच तैयार करनेवाला है.

मिसाल के लिए चुनाव प्रचार के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने राजद्रोह के लिए और ज्यादा कठोर कानून बनाने की बात की थी. यह भी साफ है कि संस्थानों के खिलाफ मोदी सरकार की लड़ाई को अब अगले स्तर पर ले जाया जाएगा.

पिछले पांच वर्षों में मोदी की यथासंभव कोशिशों के बावजूद दो किले अभी तक किसी तरह से खुद को ध्वस्त होने से बचाए हुए हैं- उच्च न्यायपालिका और केंद्र-राज्य संबंध. अब ये निशाने पर होंगे. अर्थशास्त्री नितिन देसाई का अंदेशा है कि अपने नए बहुमत का इस्तेमाल मोदी राज्य के विषयों में नीतियों को ‘लागू करने’ के मामले में केंद्र को ज्यादा शक्ति देने की कोशिश करने के लिए करेंगे. वे शायद इसके लिए वित्त आयोग का इस्तेमाल करें.

जहां तक न्यायपालिका का सवाल है, यह तय है कि भाजपा नियुक्तियों पर प्रभाव डालकर इस पर अपनी पकड़ बनाने की कोशिश करेगी. इस विनाशकारी एजेंडा के खिलाफ विपक्ष का अनमने ढंग से चलाया जाना अभियान कारगर नहीं होगा.

अमित शाह ने जिस चुनावी मशीन को तैयार किया है, उससे रणनीतिक स्तर पर जाति आधारित या दल आधारित गठजोड़ों के सहारे नहीं लड़ा जा सकता. भाजपा की रणनीति जातिगत वफादारियों को तोड़ना और सभी जातियों के सदस्यों को ‘हिंदू’ में बदल देने की है.

पहले की मंडल राजनीति अपने चतुर जाति समीकरणों के बल पर इस कमंडल राजनीति को रोकने में कामयाब रही थी, लेकिन आज यह संभव नहीं है. अगर भाजपा मतदाताओं को हिंदू (और मुसलमान) के तौर पर देखती है, तो शायद विपक्ष को उन्हें उनके भीतर के कामगार या स्त्री या किसान या युवा के तौर पर के तौर पर संबोधित करना होगा. लेकिन यह बहस किसी और दिन के लिए सही.

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