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सीवेज साफ़ करने के दौरान हो रहीं मौतें समाज के लिए अभिशाप: मानवाधिकार आयोग

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस एचएल दत्तू ने कहा कि सरकार को यह बताने की ज़रूरत है कि उसने मैला ढोने की प्रथा को ख़त्म करने के लिए क्या किया है, क्योंकि सिर्फ क़ानून बनाना काफ़ी नहीं है. उन्होंने कहा कि हम राष्ट्रीय राजधानी तक में ऐसी घटनाओं के बारे में सुनते हैं तो देश के बाकी हिस्सों की स्थित की कल्पना भी नहीं की जा सकती है.

(फाइल फोटो: रॉयटर्स)

(फाइल फोटो: रॉयटर्स)

दिल्ली: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के प्रमुख जस्टिस एचएल दत्तू ने बीते शुक्रवार को कहा कि सीवेज की सफाई के दौरान लोगों की मौत समाज के लिए अभिशाप है.

जस्टिस दत्तू ने कहा कि सरकार को यह बताने की जरूरत है कि उसने सिर पर मैला ढोने की प्रथा को खत्म करने के लिए क्या किया है, क्योंकि सिर्फ कानून बनाना नाकाफी है.

जस्टिस दत्तू राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के एक कार्यक्रम में मैला ढोने की प्रथा (मैनुअल स्कावेंजिंग), इसकी चुनौतियों और इससे जुड़े विषय पर बात कर रहे थे.

एनएचआरसी की ओर से जारी बयान में जस्टिस दत्तू के हवाले से कहा गया है, ‘सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद भी स्थिति में कोई बदलाव न होना दर्शाता है कि क़ानून ठीक तरीके से लागू नहीं किया जा रहा है.’

बयान में कहा गया है कि एनएचआरसी ने हाल ही में मैला ढोने से संबंधित 34 घटनाओं के बारे में स्वत: संज्ञान लिया है और कहा है कि विकसित देशों की तरह कोई तरीका अपनाकर इस समस्या को बहुत पहले खत्म कर देना चाहिए था.

जस्टिस दत्तू ने आगे कहा, ‘यह समाज के लिए एक अभिशाप है कि हम आज भी सीवेज की सफाई करते समय लोगों की मौत के बारे में सुनते रहते हैं. इन लोगों का बिना सुरक्षा उपकरणों के सीवेज में उतरना मानवाधिकारों का उल्लंघन है. हम राष्ट्रीय राजधानी तक में ऐसी घटनाओं के बारे में सुनते हैं तो देश के बाकी हिस्सों की स्थित की कल्पना भी नहीं की जा सकती है.’

वहीं सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण मंत्रालय के सचिव नीलम साहनी ने बताया कि इस प्रथा को खत्म करना सरकार की शीर्ष प्राथमिकता है. उन्होंने कहा, ‘कानूनी रूप से हस्तक्षेप और अलग-अलग कार्यक्रमों समेत कई नीतियां और कल्याणकारी उपाय शुरू किए गए हैं जिससे स्थिति को सुधारा जा सके.’

उन्होंने आगे बताया कि 2018 के सर्वेक्षण के अनुसार, देश में 173 जिले हैं जहां मैला ढोने की समस्या अभी भी जारी है और अब तक 34,749 मैन्युअल स्कैवेंजर्स की पहचान की जा चुकी है.

बयान में बताया गया है कि उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 16,663 मैला ढोने वाले लोग हैं, उसके बाद दूसरे नंबर पर महाराष्ट्र है, जहां 6,387 मैला ढोने वाले लोग मौजूद हैं. कौशल विकास और वित्तीय सहायता के माध्यम से उनके पुनर्वास के लिए उनकी पहचान करने के प्रयास जारी है. साथ ही ड्राई लैट्रीन की पहचान कर उनकी जगह उचित शौचालयों बनाने की कोशिश भी जारी है.

साथ ही बयान में यह भी कहा गया कि रेलवे ने 55,000 से अधिक कोचों को बायो-टॉयलेट्स के साथ अपग्रेड किया है, ताकि मानव उत्सर्जन पटरियों पर न गिरे.  बयान के अनुसार, इस कार्यक्रम में हुई चर्चा में कई महत्वपूर्ण सुझाव सामने आए जिसमें कानूनी प्रावधानों का कड़ाई से अनुपालन, मैला धोने वाले श्रमिकों  के बच्चों के लिए छात्रवृत्ति प्रति माह 5,000 रुपये करना और देश के हर हिस्से में मैला ढोने वालों की संख्या के सही आंकड़ों का खुलासा भी शामिल है.

गौरतलब है कि सीवर सफाई के दौरान हादसों में मजदूरों की दर्दनाक मौतों की खबरें लगातार आती रहती हैं. दिल्ली में अक्सर सीवर या टैंक सफाई के दौरान लोगों की मौत होने की खबरें सामने आती रहती हैं.

बीते 21 मई को उत्तर पश्चिम दिल्ली के केशवपुरम इलाके में जहरीली गैस की चपेट में आने से आटा मिल के दो कर्मचारियों की मौत हो गई. पुलिस ने बुधवार को बताया कि मृतकों की शिनाख्त मोबिन खान और बिलाल खान के रूप में की गई थी.

इससे पहले बीते 7 मई को उत्तर पश्चिम दिल्ली में  एक मकान के सेप्टिक टैंक में उतरने के बाद दो मजदूरों की मौत हो गई और तीन अन्य घायल हो गए थे.  इस मामले में भी जांच में यह बात सामने आयी थी कि मज़दूर टैंक में बिना मास्क, ग्लव्स और सुरक्षा उपकरणों के उतरे थे.

इससे पहले 2 मई को नोएडा सेक्टर 107 में स्थित सलारपुर में देर रात सीवर की खुदाई करते समय पास में बह रहे नाले का पानी भरने से दो मजदूरों की डूबने से मौत हो गई थी. दोनों के शव पानी के साथ निकली मिट्टी से दब गए थे.

बीते 15 अप्रैल को दिल्ली से सटे गुड़गांव के नरसिंहपुर में एक ऑटोमोबाइल कंपनी में सेप्टिक टैंक साफ करने के दौरान दो सफाईकर्मियों की मौत हो गई थी. इससे पहले जनवरी महीने में उत्तरी दिल्ली के तिमारपुर में सीवर लाइन साफ करने गए एक सफाईकर्मी की दम घुटने से मौत हो गई थी.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)