भारत

क्या 2019 का जनादेश भारत की प्रत्येक आबादी को जगह देता है?

2019 में भारतीय जनता पार्टी को जो जनादेश मिला है, वह असाधारण होते हुए भी अधूरा और खंडित है.

New Delhi: Bhartiya Janata Party workers welcome Prime Minister Narendra Modi as he, along with BJP President Amit Shah, arrives at the party headquarters to celebrate the party's victory in the 2019 Lok Sabha elections, in New Delhi, Thursday, May 23, 2019. (PTI Photo/Manvender Vashist) PTI5_23_2019_000477B

नरेंद्र मोदी और अमित शाह. (फोटो: पीटीआई)

17वीं लोकसभा के चुनाव परिणाम को भारतीय जनादेश कहने में क्यों उलझन हो रही है? क्योंकि उसके पहले यह मानना होगा कि भारतीय जन जैसी एक अवधारणा मौजूद है.

वह क्यों और कैसे भारतीय है, यह भी परिभाषित करना होगा. इस भारतीय के ख्याल के बनने की बुनियाद है परस्परता. वह भी सकारात्मक अर्थ में. क्योंकि परस्परता में एक दूसरे में रुचि तो शामिल है, लेकिन यह हमेशा कल्याणकारी कामना से युक्त हो, यह आवश्यक नहीं.

मैं आपके बारे में दिन-रात सोचता रहता हूं, लेकिन आपके विनाश की इच्छा के साथ. आपके प्रति मेरी यह परस्परता आपके लिए घातक है. भारत में नकारात्मक परस्परता की पुरानी परंपरा है.

इसके बिना जाति के अस्तित्व संभव नहीं. यह ऊंच-नीच की परस्परता है और इसमें एक का श्रेष्ठ होना हमेशा ही दूसरे के हीन होने पर टिका है. अगर यह सीढ़ीदार रिश्ता ख़त्म कर दिया जाए, तो जाति ही समाप्त हो जाती है.

सकारात्मक परस्परता में हमेशा एक दूसरे के प्रति एक जिम्मेदारी का एहसास बना रहता है. या बेहतर यह कहना होगा कि वह अवचेतन का हिस्सा होती है.

माना जाता है कि राष्ट्र के विचार के लिए यह परस्परता अनिवार्य है. आम तौर पर रक्त, बिरादरी, भाषा, भारत में जाति और हर जगह धर्म के एक स्वाभाविक संबंध बनता दिखता है.

यह पूरी तरह ठीक हो, आवश्यक नहीं, लेकिन ऐसा मान लिया जा सकता है. राष्ट्र के निर्माण में इन सबसे परे जाना होता है.

बिहार के भोजपुरी भाषी को गुजराती भाषी से या मिज़ो भाषी से जुड़ाव का एहसास हो, वह उसके प्रति जिम्मेदार महसूस करे और यही दूसरी ओर भी हो तो भारतीय राष्ट्रीयता का विचार पैदा होता है.

यह स्वाभाविक नहीं और स्वतः घटित नहीं होता. इसका अभ्यास करना होता है. राष्ट्र के साथ राज्य का आना अनिवार्य है, बल्कि राज्य के बिना राष्ट्र का बने रहना संभव नहीं. प्रत्येक राष्ट्र को एक राज्य की आवश्यकता होती है.

इस राज्य राष्ट्र की निरंतरता के लिए ही संसद, सरकार और उनके लिए चुनाव की ज़रूरत है. हर राष्ट्र-राज्य इस प्रक्रिया से जारी रहे, ज़रूरी नहीं. लेकिन सार्वजनीन वयस्क मताधिकार के ज़रिये राष्ट्र का यह विचार दावा करता है कि वह सबसे अधिक मान्य है.

उसे जनमत के द्वारा लगातार वैध ठहराया जाता है. इसीलिए चुनाव बहिष्कार जैसे आह्वान के प्रति सरकारें उदासीन नहीं रह सकतीं. उन्हें यह विश्वास बनाए रखना होता है कि हर तरह की आबादी का समर्थन उन्हें प्राप्त है.

इसे कारण जनमत या जनादेश में हर आबादी की शिरकत से उसकी विश्वसनीयता बढ़ती है. सिर्फ़ यही नहीं, हर चुनाव में इस जनमत में साझेदारी के ज़रिये राष्ट्र का साझा विचार भी दृढ़ होता जाता है. यानी, हर चुनाव भारतीय जन के निर्माण का अवसर भी है.

राजनीतिक दल प्रयास करते हैं कि वे जनता के विविध समूहों को सम्बोधित करें, उन्हें अपनी ओर आकर्षित करें. जितना ही वे ऐसा कर सकेंगे, उनको प्राप्त जनमत उतना ही प्रातिनिधिक और समावेशी माना जाएगा.

इस दृष्टि से विचार करें कि क्या 2019 का जनमत या जनादेश भारत की प्रत्येक आबादी को जगह देता है? यह जनादेश भारतीय जनता पार्टी को मिला है. लेकिन क्या इसमें भारत के सारे समूह अपनी आवाज़ शामिल पा रहे हैं? अगर नहीं, तो वे समूह कौन से हैं?

यह जनादेश, जिसे जन समर्थन भी कहा जा सकता है भारतीय जनता पार्टी के द्वारा किए गए आह्वान का उत्तर है. यह आह्वान इस बार क़तई अस्पष्ट न था.

आतंकवाद, पाकिस्तान, राष्ट्रीय सुरक्षा को हिंदू संस्कृति की रक्षा के साथ जोड़ कर साफ़ कर दिया गया कि आह्वान हिंदू मत तैयार करने का था. ग़ैर हिंदुओं के इसमें कहीं जगह नहीं थी.

वे इसमें सिर्फ़ मातहत के रूप में ही शामिल हो सकते थे. इस बार हर चुनावी सभा में वंदे मातरम का नारा लगाने तक भाजपा के नेता नहीं रुके, उन्होंने बार-बार कहा कि जनादेश तो जय श्रीराम का नारा लगाने के लिए चाहिए.

राहुल गांधी पर यह कहकर हमला किया गया कि वे बहुसंख्यक हिंदुओं को छोड़कर अल्पसंख्यकों की पनाह में भाग गए, मानो मुसलमान का साथ इस देश में अवांछित है.

भाजपा द्वारा हिंदुओं को, प्रत्येक जाति समूह को तो संबोधित किया गया, मुसलमानों और ईसाइयों को नहीं.

एक नेता ने मुसलमान औरतों को ज़रूर संबोधित किया. लेकिन उसमें मुसलमान पुरुषों के ख़िलाफ़ द्वेष ही मुखर हुआ.

वह संबोधन भी प्रकारांतर से हिंदुओं को था, कि देखो, हमने मुसलमान औरतों को मुसलमान मर्दों से अलग और उनके ख़िलाफ़ कर लिया है. यह एक तरह से मुसलमानों को नीचा दिखलाना था.

भाजपा ने कोई दुविधा नहीं रखी, कोई उलझन नहीं. उसके आह्वान में ग़ैर हिंदुओं की जगह ही नहीं थी. इसीलिए उसे जो जनादेश मिला है, वह असाधारण होते हुए भी अधूरा है और खंडित है.

इसलिए कि उसमें भारत की एक ही आबादी की सहमति है. वह आबादी भारतीय से अधिक हिंदू है और उसकी भारतीयता या हिंदूपन अनिवार्य रूप से पाकिस्तान और मुसलमान विरोध से परिभाषित होती है.

भाजपा ने अपने प्रतिपक्षी दलों को आतंकवाद समर्थक, पाकिस्तान समर्थक और मुसलमानों को तुष्ट करनेवाला कहकर हिंदू मतदाताओं के मन में उनके ख़िलाफ़ संदेह पैदा किया.

कहा जा रहा है कि विपक्ष इसकी काट नहीं कर पाया. यह भी कि नरेंद्र मोदी के मुक़ाबले वह एक मजबूत नेता प्रस्तुत नहीं कर सका. लेकिन हमारे सामने यह स्पष्ट रहना चाहिए कि इस नेता की मज़बूती तय होती है उसके पाकिस्तान विरोधी तेवर से, जो समकक्ष है आतंकवाद विरोध के और मुसलमान विरोध के.

विपक्षी नेता ख़ुद को अधिक से अधिक हिंदू दिखला सकते थे, लेकिन क्या वे भाजपा की तरह अपने हिंदूपन को पाकिस्तान, आतंकवाद, मुसलमान विरोध के सहारे परिभाषित कर सकते थे?

इसीलिए 2019 का जनादेश खंडित ही नहीं है, यह विखंडनकारी है. यह भारतीय जन के निर्माण की प्रक्रिया को बाधित करने वाला है. यह बात पिछले पांच वर्षों में जितनी साफ़ हुई थी, उससे कहीं अधिक क्रूरता से आगे स्पष्ट होगी.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)