राजनीति

क्या नीतीश कुमार फिर एनडीए से अलग होने की तैयारी कर रहे हैं?

उचित प्रतिनिधित्व न मिलने के कारण नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल में शामिल होने से जदयू के इनकार और बिहार राज्य कैबिनेट विस्तार में किसी भाजपा नेता को जगह न देने के सियासी घटनाक्रम को दोनों पार्टियों के बीच बढ़ती खटास के तौर पर देखा जा रहा है.

Forbesganj: Prime Minister Narendra Modi and Bihar Chief Minister and Janta Dal United President Nitish Kumar during an election rally at Araria lok sabha constituency, in Forbesganj, Saturday, April 20, 2019. (PTI Photo) (PTI4_20_2019_000016B)

नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार. (फोटो: पीटीआई)

बीते 30 मई को एनडीए सरकार के नए मंत्रिमंडल में जदयू को जगह नहीं मिलने के बाद बिहार में लगातार नाटकीय सियासी घटनाएं हो रही हैं और इन घटनाओं के साथ ही तरह-तरह के कयास भी लगाए जा रहे हैं.

कयास इसलिए भी लगाए जा रहे हैं कि पूर्व में ऐसी ही सियासी घटनाओं के बाद यहां के राजनीतिक समीकरण कई दफा बदल चुके हैं. चाहे वो नीतीश का एनडीए से बाहर आना हो, राजद के साथ मिलकर बिहार विधानसभा का चुनाव लड़ना हो या फिर वर्ष 2017 के मध्य में एनडीए में नीतीश कुमार की ‘घर वापसी’ हो.

2019 के आम चुनाव अकेले भाजपा को मैजिक फिगर से ज्यादा सीटें मिलने से एनडीए के सहयोगी दलों को बहुत अधिक तवज्जो नहीं मिलने वाली. चाहे वो जदयू हो या कोई और.

इसकी पहली झलक तब मिली जब एनडीए के नए मंत्रिमंडल में जदयू के महज एक सांसद को शामिल करने का प्रस्ताव दिया गया. जदयू ने इस प्रस्ताव को इस बिनाह पर नामंजूर कर दिया कि समानुपातिक आधार पर मंत्रिमंडल में जगह नहीं दी गई.

जदयू का तर्क था कि लोजपा के छह सांसद हैं, तो उसे एक मंत्री पद मिला, लेकिन जदयू के 16 सांसद हैं, तो उसे भी एक ही पद क्यों दिया गया.

जदयू के मुखिया और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसको लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर साफ लहजे में कह दिया कि वह मंत्रिमंडल में सांकेतिक प्रतिनिधित्व नहीं चाहते हैं. अलबत्ता उनकी पार्टी सरकार के साथ है और रहेगी.

उन्होंने कहा, ‘भाजपा को पूर्ण बहुमत है और हमारा पूर्ण समर्थन है, लेकिन उनकी बात से लगा कि एनडीए के घटक दलों को व जेडीयू को भी वो सांकेतिक रूप प्रतिनिधित्व देना चाहते हैं.’

उन्होंने आगे कहा, ‘वे (भाजपा) एक सीट देना चाहते थे, हमने जदयू की कोर टीम के साथ बैठक की और ये प्रस्ताव रखा, तो सभी ने कहा कि यह प्रस्ताव ठीक नहीं है.’

नीतीश कुमार ने अटल बिहार वाजपेयी की सरकार की मिसाल देते हुए कहा कि पहले भी समानुपातिक भागीदारी होती थी, इसलिए नए मंत्रिमंडल में भी भागीदारी समानुपातिक होनी चाहिए.

एनडीए मंत्रिमंडल के शपथ ग्रहण समारोह कार्यक्रम के तुरंत बाद बिहार की नीतीश सरकार की तरफ से खबर आई कि नीतीश सरकार भी कैबिनेट का विस्तार करेगी.

इस घोषणा के साथ ही यह अफवाह भी उड़ी कि नीतीश कुमार केंद्रीय मंत्रिमंडल का बदला भाजपा से राज्य कैबिनेट में लेंगे. यह अफवाह सही साबित हुई और बीते दो जून को बिहार में जिन आठ नए मंत्रियों ने शपथ ली, उनमें भाजपा का एक भी नेता नहीं था.

नीतीश कुमार ने बाद में मीडिया के सामने सफाई दी कि जो पद खाली थे, वे जदयू कोटे के थे, इसलिए भाजपा को प्रतिनिधित्व नहीं मिला.

नीतीश जब मीडिया से बात कर रहे थे, तो उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी भी बगल में खड़े थे. मगर उनके चेहरे की हवाइयां उड़ी हुई थीं.

मंत्रिपरिषद के विस्तार के बाद चला इफ्तार का दौर. जदयू, भाजपा, राजद और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (सेकुलर) ने अलग-अलग इफ्तार पार्टियां दीं.

भाजपा की इफ्तार पार्टी में नीतीश कुमार नहीं पहुंचे, तो जदयू की इफ्तार पार्टी से भाजपा ने दूरी बनाई. हां, जीतनराम मांझी ने इफ्तार पार्टी दी, तो नीतीश कुमार उसमें शामिल हुए और राम विलास पासवान ने इफ्तार पार्टी की, तो नीतीश कुमार और सुशील मोदी ने उसमें शिरकत की.

2017 में नीतीश कुमार के महागठबंधन से अलग होने के बाद राजद की तरफ से अनेक बार ये बयान आया कि नीतीश कुमार अगर दोबारा महागठबंधन का हिस्सा बनना चाहेंगे, तो उन्हें जगह नहीं मिलेगी. लेकिन, 2019 के आम चुनाव में महागठबंधन की करारी शिकस्त के बाद राजद समेत अन्य गठबंधन पार्टियां नीतीश कुमार को लेकर चुप्पी साधे हुई हैं.

चुनाव परिणाम के बाद कोई भी नेता नीतीश पर जुबानी हमला नहीं कर रहा है. समझा जा रहा है कि राजद व अन्य पार्टियां अंदरखाने इस कवायद में लगी हुई हैं कि नीतीश कुमार दोबारा महागठबंधन में शामिल हो जाएं.

भाजपा और जदयू के बीच बढ़ी खटास को महागठबंधन एक सुनहरे मौके की तरह देख रहा है और वह किसी भी सूरत में इसका फायदा उठाना चाहता है.

राजद के वरिष्ठ नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने तो नीतीश कुमार को महागठबंधन में आने का न्योता भी दे दिया. उन्होंने कहा, ‘नीतीश जी निश्चित रूप से पाला बदलेंगे, लेकिन कोई भी इसकी भविष्यवाणी नहीं कर सकता है कि वह कब करेंगे या क्या करेंगे. ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है. ऐसा पहले भी कई बार हो चुका है. यह आश्चर्यजनक नहीं है… मैं बस इतना चाहता हूं कि बिहार में बीजेपी के खिलाफ सभी लोग साथ आएं.’

वहीं, राबड़ी देवी ने भी कहा कि नीतीश कुमार महागठबंधन में शामिल हो सकते हैं. हालांकि, जदयू नेता अजय आलोक ने इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए ट्वीट किया, ‘कुछ नाम से हमारे नेता को ये लोग बुलाते थे शायद? याद आया कि नहीं और आज वोट की चोट क्या लगी तो चाचा याद आने लगे! बुला रहे हैं, भाई लोग आप ही बताएं अब जब भैंस पानी में चली गई तो हम क्यों निकालें?’

केंद्रीय मंत्रिमंडल में सांकेतिक प्रतिनिधित्व से जदयू का इनकार, राज्य कैबिनेट के विस्तार में भाजपा को जगह नहीं मिलने, इफ्तार पार्टियों में गैरमौजूदगी और राजद का बयान; इन सारे घटनाक्रमों का सियासी परिणाम क्या निकलेगा?

इस सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं, ‘इन घटनाक्रमों के परिणाम को लेकर जितनी भी आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं, उन सबका आधार है. केंद्रीय मंत्रिमंडल में जदयू को जगह नहीं मिलने से लेकर मंत्रिपरिषद के विस्तार तक जो कुछ हुआ, उससे साफ है भाजपा और जदयू के बीच कैसा रिश्ता पल रहा है. हां, भाजपा इस पर पर्दा जरूर डाले रखना चाहती है, लेकिन नीतीश कुमार गाहे-ब-गाहे ये पर्दा हटाते रहते हैं ताकि भाजपा पर दबाव बना रहे.’

बिहार एनडीए में ज्यादा तवज्जो पाने की लड़ाई

2017 के मध्य में जब नीतीश कुमार राजद से अलग होकर दोबारा एनडीए में आए और बिहार में सरकार बनाई, तो ये भाजपा की बड़ी जीत थी, क्योंकि 2019 में केंद्र में दोबारा एनडीए की सरकार बनाना भाजपा की पहली प्राथमिकता थी और इसके लिए भरोसेमंद घटक दलों की जरूरत थी.

2019 के आम चुनाव में भाजपा ने शानदार जीत दर्ज की, तो अब जदयू या दूसरे घटक दल उसके लिए बहुत मायने नहीं रखते हैं. ऐसे में भाजपा यह कोशिश करेगी कि बिहार में वह जदयू को हावी नहीं होने दे.

और अगर ऐसा होता है तो संभव है कि नीतीश कुमार एनडीए से बाहर हो जाएं. क्योंकि नीतीश कुमार ऐसे गठबंधन का हिस्सा बनने के ख्वाहिशमंद रहते हैं, जहां उनकी स्थिति मजबूत हो.

एनडीए मंत्रिमंडल में जदयू की भागीदारी पर भाजपा के दो टूक जवाब से पता चलता है कि अब एनडीए बिहार में भी उनकी स्थिति मजबूत नहीं रहेगी.

राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन कहते हैं, ‘अभी भाजपा और जदयू के बीच जो खींचतान है, वो आम चुनाव के परिणाम का ही नतीजा है. दोनों ही पार्टियां बिहार एनडीए में खुद को एक दूसरे से ऊपर रखना चाह रही हैं.’

वह आगे कहते हैं, ‘भाजपा की पहली प्राथमिकता केंद्र में सरकार बनाने की थी. दिल्ली में सरकार बन गई है, तो अब वह पटना पर फोकस करेगी. भाजपा अब चाह रही है कि बिहार में अपनी स्थिति मजबूत करे. इससे आने वाले समय में नीतीश की परेशानी बढ़ेगी.’

नीतीश की सेकुलर छवि पर संकट

कॉमन सिविल कोड, राम मंदिर व तीन तलाक के मुद्दे पर जदयू के विचार भाजपा से बिल्कुल अलग हैं. इसको लेकर नीतीश कुमार कई दफे सार्वजनिक बयान दे चुके हैं. लेकिन, 2019 के आम चुनाव में उन्होंने इन मुद्दों पर बहुत कम बात की. और तो और जदयू ने अपना घोषणापत्र जारी कर इन मुद्दों पर अपना नजरिया भी नहीं रखा.

जानकार बताते हैं कि जदयू एक सोची-समझी रणनीति के तहत इन मुद्दों पर चुप रहा. दरअसल, जदयू नेताओं को लग गया था कि भाजपा के पक्ष में हवा है, ऐसे में अगर इन संवेदनशील मुद्दों को उठाया गया, तो भाजपा के वोटर बिदक जाएंगे और जदयू को वोट नहीं डालेंगे.

अब जब भाजपा को अपने बूते बहुमत से ज्यादा सीटें मिल गई हैं, तो माना जा रहा है कि वह इन मुद्दों पर कड़े फैसले ले सकती है. ऐसी स्थिति में भी एनडीए के साथ बने रहने से नीतीश कुमार की छवि को नुकसान पहुंचेगा. दूसरी तरफ, गिरिराज सिंह जैसे नेताओं को भाजपा द्वारा तरजीह दिया जाना भी नीतीश कुमार की परेशानी का सबब बनेगा.

इफ्तार पार्टी में टोपी पहने नीतीश कुमार, राम विलास पासवान, जीतनराम मांझी और सुशील मोदी की तस्वीरों को लेकर टिप्पणी कर भाजपा नेता व केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने अपना काम शुरू भी कर दिया है.

उन्होंने ट्वीट किया, ‘कितनी खूबसूरत तस्वीर होती जब इतनी ही चाहत से नवरात्रि पर फलाहार का आयोजन करते और सुंदर-सुंदर फोटो आते?… अपने कर्म-धर्म में हम पिछड़ क्यों जाते और दिखावा में आगे रहते हैं?’

गिरिराज सिंह के इस ट्वीट पर जदयू ने तीखी टिप्पणी की.

जदयू नेता अशोक चौधरी ने कहा, उन्हें किसी ने नवारात्र में फलाहार करने से रोका है क्या? मैं पूरी भाजपा नहीं बल्कि उन्हें (गिरिराज सिंह) को आगाह करना चाहता हूं कि वे ऐसे बयान देने से बचें.’ जदयू प्रवक्ता संजय सिंह ने कहा कि वे गिरिराज सिंह के बयान को गंभीरता से नहीं लेते हैं.

महेंद्र सुमन कहते हैं, ‘आने वाले समय में ऐसे बयान और बढ़ेंगे. इन बयानों पर जदयू को जवाब देना होगा. इससे तल्खी बढ़ेगी. पहले सोच भी नहीं सकते थे कि गिरिराज सिंह मुख्यमंत्री की इफ्तार पार्टी को चुनौती देंगे.’

2020 का बिहार विधानसभा चुनाव पर नजर

अगले साल नवंबर में बिहार विधानसभा का चुनाव होने जा रहा है. वर्ष 2014 के आम चुनाव में बुरा प्रदर्शन करने वाले जदयू, राजद व कांग्रेस ने इस बार और भी बदतर प्रदर्शन किया. अगले ही साल बिहार विधानसभा चुनाव हुआ, जिसमें जदयू, राजद व कांग्रेस ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था और सरकार बनाई थी.

जानकार बताते हैं कि अगर भाजपा और जदयू के बीच तल्खी इसी तरह जारी रही, तो अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में 2015 के फॉर्मूले का दोहराव हो सकता है.

राजनीतिक विश्लेषक डीएम दिवाकर कहते हैं, ‘नीतीश कुमार ने राजद के साथ मिलकर सरकार चलाई भी है, इसलिए मुमकिन है कि वह दोबारा राजद के साथ आ जाएं.’

डीएम दिवाकर कहना है कि भाजपा खुद भी 2020 का विधानसभा चुनाव अकेले लड़ना चाहती है, इसलिए भी वह जदयू को बहुत तवज्जो नहीं देनेवाली. ऐसे में आने वाले समय में अगर नीतीश कुमार महागठबंधन का हिस्सा बन जाएं, तो कोई आश्चर्य नहीं होगा.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)