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जेएनयू की वर्तमान दाख़िला नीति ग़ैरक़ानूनी है

जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष मोहित कुमार पांडेय बता रहे हैं कि विवि प्रशासन द्वारा जारी की गई दाख़िला नीति अकादमिक काउंसिल से पास नहीं है.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का प्रशासनिक भवन. फोटो: पीटीआई

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का प्रशासनिक भवन. फोटो: पीटीआई

वाइस चांसलर और उनकी टीम के तानाशाही रवैये के चलते एक बार फिर जेएनयू की दाख़िला नीति पूरी तरह से अधर में लटकी दिख रही है, आइए जानते हैं क्यों?

23-26 दिसंबर को हुई अकादमिक काउंसिल की 142वीं मीटिंग के बाद से (जिसमें वीसी ने पार्ट बी में मनमाने तरीके से यूजीसी गज़ट को बिना चर्चा के पास-पास बोल के पास हुआ दिखाया) लगातार शिक्षक और छात्र-छात्राएं ये मांग करते रहे कि अकादमिक काउंसिल की मीटिंग दुबारा बुलाई जाए.

लगभग 4 महीने बाद आज वीसी ने दुबारा अकादमिक काउंसिल की 143वीं मीटिंग बुलाई, जिसका पूरा एजेंडा ही विवादस्पद था. इस पूरे एजेंडे में जगह-जगह पर वीसी की आपातकालीन शक्तियों का ज़िक्र था. हालांकि इन शक्तियों का किसी को अता-पता नहीं है कि ये शक्तियां किसने दीं, कहां से आईं?

क्या अकादमिक काउंसिल ने वीसी से कहा था कि आप चर्चा किए बिना इन शक्तियों का हवाला कैसे दे सकते हैं? इस एजेंडे पर छात्रों और शिक्षकों ने पहले से ही अपनी आपत्तियां दर्ज करा दी थीं, ताकि वीसी बैठक में इधर-उधर की बात करके चलते न बनें और कहीं से भी चर्चा से भागने का रास्ता तैयार न कर सकें.

9 मई, 2017 को 143वीं अकादमिक काउंसिल की बैठक शुरू हुई. पहला एजेंडा था 142वीं अकादमिक काउंसिल की मीटिंग के मिनट को कन्फर्म करना. शुरुआत से ही सदस्यों ने 142वीं अकादमिक काउंसिल के मिनट्स पर अपनी गहरी आपत्तियां दर्ज कराईं.

ग़ौरतलब है कि इन मिनट्स में बार-बार यूजीसी गज़ट का हवाला ज़बरदस्ती घुसाया गया था. वास्तविकता यह है कि पार्ट ए में यूजीसी गज़ट पर कोई चर्चा हुई ही नहीं थी. एक बार यूजीसी गज़ट का ज़िक्र आया था और एक सदस्य की सलाह पर वीसी ख़ुद राजी हुए थे कि वे यूजीसी को लिखकर स्पष्टीकरण मांगेंगे. इस अकादमिक काउंसिल ने वीसी को नियम बनाने की कोई ‘आपातकालीन शक्तियां’ नहीं दी थीं.

कई सदस्यों के विस्तार में दिए गए सुझावों और सुधार के प्रस्ताव के बावजूद वीसी और प्रशासन के लोग पहेलियां बुझाते रहे और घुमा-फिरा के बात करते रहे. कई सदस्यों ने यहां तक कहा कि आप सुधार के प्रस्ताव पर वोटिंग करा लीजिए. तमाम आनाकानी के बाद वीसी को मिनट्स में सुधार के प्रस्ताव पर सबका मत जानने की बात माननी पड़ी.

पूरी मीटिंग में बैठे लगभग 50 लोगों ने माना कि मिनट्स में सुधार के बिना आगे के एजेंडे पर बढ़ना संभव नहीं है, क्योंकि इससे पिछली मीटिंग में क्या घटित हुआ वह सही-सही न तो रिकॉर्ड में जाएगा और न ही रिपोर्ट होगा. वीसी साहेब ने एक बार फिर माइक पकड़ते ही अधिकतम सदस्यों की सलाह अनसुनी करते हुए मिनट पास करने की रट लगा दी.

मिनट्स पर की गई चर्चा लगभग 2 घंटे चली और जिसमें कई महत्वपूर्ण, अव्वल दर्जे के, जेएनयू के हित में और तार्किक सुझाव आए. अगर वीसी साहेब को अपनी ही बात ऊपर रखनी थी, तो उन्होंने इतनी लंबी चर्चा क्यों की? चर्चा में आए महत्वपूर्ण सुझावों को वे क्यों टालना चाहते थे?

क्या पिछली मीटिंग के गलत मिनट्स को सुधारने से वीसी और उनकी टीम द्वारा उठाये जा रहे क़दम सवालों के घेरे में आ जाते? इन सवालों को हम वीसी के अगले क़दम से जान सकते हैं. जब, मीटिंग में वीसी के पास-पास की रट का विरोध होने लगा, तब वीसी ने बिना कोई कारण बताए, बिना सदस्यों से कोई सलाह लिए मीटिंग स्थगित करने की घोषणा करके चलते बने.

तमाम सदस्य कुछ समझ ही नहीं पाए की क्या घटित हुआ? कई सदस्यों ने सचिव रजिस्ट्रार को विरोध जताते हुए पत्र भी देने चाहे, लेकिन रजिस्ट्रार ने पत्र लेने से मना कर दिया.

ताज़ा मीटिंग में 142वीं मीटिंग के मिनट्स और यूजीसी गज़ट पर आधारित दाख़िला नीति न पास करने के क्या निहितार्थ हैं?

जेएनयू प्रशासन द्वारा जारी की गई दाख़िला नीति जेएनयू की अकादमिक काउंसिल से पास नहीं है. ऐसी स्थिति में ये नीति कहीं से भी क़ानूनन सही नहीं ठहरती. ग़ौरतलब है कि न तो 142वीं और न ही 143वीं एसी मीटिंग की अभी तक की प्रक्रिया ने इस दाख़िला नीति पर अपनी मुहर लगाई है.

जेएनयू प्रशासन इस नीति पर अकादमिक काउंसिल में बग़ैर चर्चा किए और बगैर पास किए 1000 प्रवेश से महरूम रह जाने वाले छात्रों को गुमराह तो कर ही रहा है, साथ ही साथ प्रशासन उन छात्रों को भी गुमराह कर रहा है, जो जेएनयू की इस ग़ैरक़ानूनी दाख़िला नीति के तहत आवेदन कर चुके हैं और आने वाली तारीख़ों में प्रवेश परीक्षा देने वाले हैं.

इन पूरी सूचनाओं को छुपाने और सही बात न करने की सबसे बड़ी जड़ है, जेएनयू प्रशासन का यूजीसी गज़ट पर चर्चा न होने देना और नई दाख़िला नीति को इस चर्चा के बाद तैयार करना. तो क्या जेएनयू इस ग़ैरक़ानूनी दाख़िला नीति के साथ जा सकता है? क़ानूनन नहीं? क्योंकि जेएनयू का प्रशासन जेएनयू एक्ट के तहत काम करता है, जिसमें हर दाख़िला नीति के हरेक अवयव को अकादमिक काउंसिल में पास कराना ज़रूरी है.

क्या इस सबका कोर्ट से भी कोई ताल्लुक है?

इस मीटिंग में यूजीसी गज़ट पर चर्चा को टालने के लिए वीसी और उनकी टीम ने बार-बार इस मुद्दे के न्यायालय के विचारधीन होने का हवाला दिया. बड़ी ही रोचक बात है कि अगर ये मुद्दा न्यायाधीन है, तो जेएनयू प्रशासन 142वीं मीटिंग के मिनट्स (जहां पर बार-बार यूजीसी गज़ट का ज़िक्र है) और 143वीं मीटिंग के एजेंडे (जिसका आधे से ज़्यादा हिस्सा यूजीसी गज़ट पर आधारित दाख़िला नीति से संबंधित है) को पास कराने को लेकर इतना आतुर क्यों है?

क्या जेएनयू प्रशासन के लिए न्यायाधीन होने वाली बात लागू नहीं होती? क्या अभी जिस दाख़िला नीति को जेएनयू प्रशासन ने जारी किया है (बिना किसी बॉडी से पास कराए) वो न्यायाधीन की श्रेणी में नहीं आती? इन सवालों का जवाब इस बात में है कि जेएनयू प्रशासन भी जानता है कि वो एक प्रक्रिया को किनारे करते हुए, अकादमिक काउंसिल मीटिंग को दरकिनार करके बनाई गई नीति को लेकर आगे बढ़ रहा है, जिसमें बाद में समस्या आ सकती है.

इसीलिए इस नीति को वह तानाशाही ढंग से, झूठ और गुमराह करने वाले पटल पर रखकर पास कराना चाहता है. मीटिंग में वीसी और उनकी टीम का रवैया और वीसी का मीटिंग से भाग जाना इसको पूरी तरह से साफ़ करता है. अगर मेरी बात नहीं मानोगे तो मैं मीटिंग ही नहीं होने दूंगा. लेकिन सवाल यह है कि क्या इस मनमाने ढंग से जेएनयू, जेएनयू में आने वाले नए छात्रों और जेएनयू की तरफ़ आस लगाकर देख रहे उन 1000 छात्र-छात्राओं का कुछ भला होगा, जिनकी सीटें छीनी गई हैं?