भारत

क्या ममता बनर्जी बंगाल को अपना खिलौना मान बैठी हैं?

‘बंगाल खिलौना नहीं है,’ यह कहा था ममता बनर्जी ने कुछ रोज़ पहले, लेकिन अब उनके आचरण से यही लगता है कि वे बंगाल को अपना खिलौना ही मान बैठी हैं, वरना वे राज्य में डॉक्टरों की हड़ताल चार दिन तक न खिंचने देतीं.

Kolkata: West Bengal Chief Minister Mamata Banerjee addresses media after comes out from Kolkata Police Commissioner Rajeev Kumar's residence, in Kolkata, Sunday late evening, Feb 03, 2019. (PTI Photo/Swapan Mahapatra) (PTI2_3_2019_000234B)

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (फोटो: पीटीआई)

बंगाल में डॉक्टरों की हड़ताल के टूटने के आसार नहीं दिख रहे. मुख्यमंत्री चाहती हैं कि हड़ताली डॉक्टर उनके दफ़्तर आएं और वे अड़े हैं कि ममता बनर्जी उन तक चल कर आएं. इन दोनों के बीच के गतिरोध में हज़ारों मरीज़ तबाह हो रहे हैं. अख़बार आपको बच्चों की तस्वीरें दिखला रहे हैं जो इलाज के अभाव में मौत के शिकार हो रहे हैं.

‘बंगाल खिलौना नहीं है,’ यह कहा था ममता बनर्जी ने कुछ रोज़ पहले, लेकिन अब उनके आचरण से यही लगता है कि वे बंगाल को अपना खिलौना ही मान बैठी हैं, वरना वे राज्य में डॉक्टरों की हड़ताल चार दिन तक न खिंचने देतीं.

मोर्चे पर सबसे आगे आकर लड़ने वाली ममता आज अगर डॉक्टरों के सामने खुद जाने से कतरा रही हैं या रूठ गई हैं कि वहां जाने पर उनका अपमान क्यों किया गया!

हर मुख्यमंत्री या नेता को जनता का आक्रोश झेलने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए और उसे अपनी रियाया नहीं समझना चाहिए. कल तक जो जनता आप पर जान न्योछावर करती थी, वह आज आप पर थू-थू भी कर सकती है. इसके लिए उसे कोसने की जगह खुद को देखने की ज़रूरत है.

आप कान खुले न भी रखें तो बंगाल की गली-गली और सड़क सड़क पर ममता को लेकर मज़ाक सुनाई देगा ही. यह कहनेवाले भी मिलने लगे हैं कि ज्योति बाबू का राज ही अच्छा था! इससे ममता समझ सकती हैं कि जनता की विपुल शुभेच्छा जो उनकी कमाई थी, वह कितनी जल्दी उन्होंने गंवा दी है!

ममता अगर आज भारतीय जनता पार्टी पर आरोप लगाएं कि वह डॉक्टरों पर हुए हमले का सम्प्रदायीकरण कर रही है, तो उनकी बात सच होते हुए भी क्यों सुनी नहीं जा रही?

क्योंकि उन्होंने खुद डॉक्टरों पर आरोप लगाया कि वे नाम पूछकर इलाज कर रहे हैं! मुख्यमंत्री यह इल्जाम अपने ही डॉक्टरों पर खुलेआम लगाएं, यह न सिर्फ अशोभनीय है बल्कि अस्वीकार्य है!

क्या उनके पास इसका कोई सबूत है? अगर एक भी ऐसा मामला है तो इसे सार्वजनिक चर्चा का विषय बनाने की जगह उन्हें प्रशासनिक कार्रवाई करनी चाहिए थी. वह न करके इसे भाषण में बताना एक विवाद खड़ा करना है जो कम से कम प्रशासक का काम नहीं है.

उससे भी अधिक गंभीर मसला यह है कि इससे समाज में विद्वेष पैदा होगा जिसे खत्म करना ममता के हाथ में न रहेगा! ममता के बर्ताव को देखकर ही पुराने सयानों की इस सूझ का मतलब समझ में आता है कि आपकी ज़बान आपको खा जा सकती है.

ममता की आक्रामक और बेलगाम ज़बान ने हर मिनट उनके और शत्रु पैदा किए हैं. डॉक्टरों पर मरीज के क्षुब्ध परिजनों के द्वारा हमला हुआ. आरोप है कि वह संगठित था. मरीज मुसलमान था, परिजन भी मुसलमान ही होंगे. हिंसा करने वाले जाहिर है वही होंगे.

संभव है इलाज में लापरवाही हुई हो, संभव है डॉक्टर ने रूखा बर्ताव किया हो, लेकिन यह उन पर हिंसा का कोई औचित्य नहीं हो सकता. मरीज गरीब हों तो भी उनकी हिंसा जायज़ नहीं है.

इस हिंसा के खिलाफ डॉक्टरों के विक्षोभ को भी समझा जा सकता है. यह भी कि भारतीय जनता पार्टी इस मसले का राजनीतिक इस्तेमाल करेगी जो उसने किया ही, लेकिन ऐसी स्थिति में खुद मुख्यमंत्री की क्या भूमिका होनी चाहिए थी?

वे युद्धं देहि की मुद्रा में मैदान में कूद पड़ीं. स्वास्थ्य सचिव, स्वास्थ्य मंत्री, दूसरा वरिष्ठ पदाधिकारी क्यों नहीं भेजा सकता था? क्यों ममता पहले ही मिनट में खुद मोर्चे पर आ खड़ी हुईं? आकर क्यों उन्होंने डॉक्टरों को धमकी दी?

PTI6_14_2019_000161B

कोलकाता में प्रदर्शन करते डॉक्टर्स (फोटो: पीटीआई)

यह भी साबित हुआ कि वे एक कमनज़र राजनीतिज्ञ हैं. चुनाव तुरंत खत्म हुए हैं और उनकी अभेद्यता का मिथ टूट चुका है. जनता जान गई है कि वे राजनीतिक रूप से कमजोर हो चुकी हैं. वे जानती हैं कि उनके विधायक बाहर जाने का मौक़ा तलाश रहे हैं.

फिर संयम के साथ हालात को काबू करने की जगह, अपने मित्र बनाने की जगह उन्होंने खड्ग लेकर मैदान में उतर जाना जो ठीक समझा, यह नासमझी के अलावा और क्या है?

भाजपा दो दिनों से चुप है. सीपीएम लगातार उनपर आक्रमण कर रही है. जनता उन्हें विक्षिप्त मान चुकी है. उनके दल में कोई भी उनसे बात नहीं करना चाहता क्योंकि वह बेइज्जत नहीं होना चाहता. प्रशासक उनसे ऊब चुके हैं.

भाजपा को अब खुलेआम सक्रिय होने की ज़रूरत भी नहीं रह गई है. ममता की साख जा चुकी है तो सत्ता जाने में कितना वक्त लगता है! इसके बाद डॉक्टरों के आंदोलन के इतना लंबा खिंचने पर बात होनी चाहिए. इस मसले पर अखिल भारतीय विरोध का मतलब समझना चाहिए.

क्या इसमें ईमानदारी है? या, इसकी डोर किसी और के हाथ में है? क्या इसके पहले दिल्ली, बिहार, उत्तर प्रदेश,आदि में डॉक्टरों पर हुए हमले पर ऐसी ही प्रतिक्रिया हुई थी? क्या इसका कोई राजनीतिक आशय नहीं है?

खुद डॉक्टरों के बीच से इस तरह के संदेश चक्कर काट रहे हैं कि डॉक्टरों पर हिंसा एक ही समुदाय करता है. क्या बंगाल की हिंसा के प्रति विक्षोभ जाहिर करते वक्त इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) को इस मसले पर साफ वक्तव्य नहीं देना चाहिए कि न तो पेशे का सम्प्रदायीकरण किया जाए, न मरीजों और उसके रिश्ते का?

यह भी देखें: पश्चिम बंगाल में डॉक्टरों की हड़ताल, हिंसा और सियासी खींचतान

वे ममता का विरोध करें लेकिन साथ ही भाजपा द्वारा इस पूरे मामले के सम्प्रदायीकरण की भर्त्सना न करना कुछ स्पष्ट नहीं करता? क्या इस पेशे में सिर्फ एक ही समुदाय के लोग हैं?

इस खतरे को बंगाल में समझा गया है इसलिए विरोध करनेवाले प्रदर्शन और जुलूस में इस सम्प्रदायीकरण का विरोध किया गया है. फिर आईएमए इस पर साफ तौर पर वक्तव्य क्यों नहीं दे रही?

दूसरी ओर क्या ममता यह मान रही हैं कि इस हड़ताल के कारण गरीब और ख़ासकर ग्रामीण जनता उनके साथ आ जाएगी क्योंकि डॉक्टरों को विशिष्ट माना जाता है जो गरीबों का शोषण करते हैं!

क्या यह हिसाब करके वे डॉक्टरों के ख़िलाफ़ बोल रही हैं कि यह जनता उनके साथ गोलबंद हो जाएगी? क्या कल अपर्णा सेन जैसे विशिष्ट जन का डॉक्टरों के पक्ष में आना भी ममता को अपने लिए फ़ायदेमंद दिख रहा है? क्या वे ग्रामीण शहरी विभेद की गुंजाइश तलाश रही हैं?

क्या यही उनके उद्धत आचरण का कारण है? लेकिन बंगाल में ममता का पतन आरंभ हो चुका है. वरना इस संकट के क्षण वे यह वक्तव्य न देतीं कि बंगाल में रहना हो तो बांग्ला सीखना होगा! यह आदेश इतना बेतुका है कि इसपर बंगाली हंस भी नहीं पा रहे!

300 से अधिक भाषाओं वाले प्रदेश में एक बांग्ला को एकमात्र अर्हता बताना नासमझी नहीं है. यह बंगाली-बिहारी विद्वेष के सहारे सुर्खरू बनने की बदहवास कोशिश है. इस मामले में बंगाली ही इनके साथ न होंगे.

यह समझने के लिए आपको लोकप्रिय बांग्ला टेलीविजन कार्यक्रम देख लेने चाहिए जहां अब बांग्ला की जगह हिंदी का इस्तेमाल हो रहा है. फिर कौन-सी बांग्ला अच्छी है? यह कौन तय करेगा?

इस बहस से अलग यह सवाल है कि जब इतना बड़ा संकट राज्य में हो तो ममता भाषा का विवाद कैसे खड़ा कर सकती हैं? ममता इस वक्त अधिक कट्टर दिखलाई पड़ने लगी हैं. वे मित्रहीन हैं, मित्रकामी भी नहीं हैं. उनकी मदद कैसे की जाए?

प्रश्न लेकिन बंगाल का है ममता का नहीं और यह दिख रहा है कि बंगाल हिंसा के एक नए दौर में प्रवेश कर गया है. उससे बंगाल को बचाना पहले ममता की ज़िम्मेदारी है क्योंकि वे अभी उसकी मुखिया हैं, लेकिन अगर मुखिया दिशाहारा हो जाए तो क्या बाकी समाज भी बेचारा हो जाए?

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)