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गिरीश कर्नाड: पड़ोसी से मार्गदर्शक और मार्गदर्शक से सहकर्मी तक…

गिरीश कर्नाड हमारे बीच से उतनी ही शांतिपूर्ण गरिमा और ईमानदारी के साथ विदा हो गए, जिस तरह से उन्होंने अपना जीवन जिया.

Girish karnad Photo Oxford Uni Press

गिरीश कर्नाड (फोटो साभार: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस)

थियेटर की एक जानी-मानी शख्सियत ने एक बार गिरीश कर्नाड को अपने जन्मदिन पर बुलाया था. कर्नाड ने एक लाइन के साथ जवाब भेजा था, दिया: ‘जन्म और मृत्यु निजी मसले होते हैं. इसे अपने करीबी लोगों के साथ ही मनाना चाहिए. असल में मायने यही रखता है कि जन्म और मृत्यु के बीच हम क्या करते हैं.’

जब कर्नाड करीब 16 साल के थे, वे मशहूर शख्सियतों के स्केच बनाकर उन्हें भेजा करते थे. वे उनसे स्केच पर दस्तखत करके, उन्हें वापस भेज देने का अनुरोध करते थे. युवा कर्नाड के पास अल्बर्ट आइंस्टीन, सर्वपल्ली राधाकृष्णन और दूसरों के दस्तखत किए हुए स्केचों का एक अच्छा-खास कलेक्शन था.

एक बार उन्होंने ऐसा ही एक स्केच आइरिश नाटककार सीन ओ’केसी [Seán O’Casey] को भेजा. केसी ने उन्हें जवाब में लिखा, ‘तुम दूसरे लोगों के ऑटोग्राफ के लिए क्यों परेशान होते हो?’ इसकी बजाय इस आइरिश नाटककार ने कर्नाड से अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल करके कुछ ऐसा काम करने के लिए कहा कि एक दिन लोग उनसे उनका ऑटोग्राफ मांगें.

कर्नाड ने जब ययाति  लिखा, तब उनकी उम्र महज 22 साल की थी. उसके बाद उन्होंने कई नाटक लिखे, जिनके बल पर उन्हें भारत ही नहीं दुनिया के भी शीर्ष नाटककारों में गिना जाता है.

कर्नाड के बारे में मेरी सबसे शुरुआती याद करीब 25 साल पुरानी है, जब वे बेंगलुरु के जेपी नगर में अपने घर में रहने आए. एक दिन कर्नाड हाथ में लहसुन और दही से बनी एक कढ़ी बेल्लुली थंबुली  का एक डिब्बा लेकर मेरे घर आए. उन्होंने मेरी मां से कहा कि अगर हम राशन और खाने का लेन-देन भी नहीं कर सकते, तो पड़ोसी होने का क्या मतलब है?

मैंने उन्हें दूरदर्शन के सफल कार्यक्रम टर्निंग पॉइंट  में विज्ञान पर बात करते हुए देखा था, इसलिए उन्हें थंबुली  का डिब्बा लिए मेरे घर के दरवाजे पर देखना हैरानी भरा था. कर्नाड को अपने घर और अपने पड़ोस से प्यार था.

पांच साल पहले, उनके घर के सामने की सड़क की खोद दी गई, इसके किनारे लगे पेड़ों को काट दिया गया और एक विशालकाय अंडरपास बनाया गया. इस निर्माण के दौरान और प्रोजेक्ट के पूरा हो जाने के बाद वहां के ट्रैफिक ने उस सड़क को काफी भीड़-भरा और शोर भरा बना दिया.

लेकिन इससे उनके तीन नाटकों- बॉयल्ड बीन्स ऑन टोस्ट, वेडिंग अल्बम और अ हीप ऑफ ब्रोकेन इमेजेज– के दृश्यों की प्रेरणा भी मिली, जिनमें किरदार शहर के बदलते हुए लैंडस्केप पर टिप्पणी करते हैं.

पिछले साल उन्होंने जेपी नगर का घर बेचा और मध्य बेंगलुरु के एक अपार्टमेंट में शिफ्ट हो गए. जब मैं वहां उनसे मिलने गया, तब उन्होंने कहा, ‘देखो यहां शहर के बीचोंबीच काफी शांति है. सारा पागलपन दूसरी जगहों पर चला गया है.’

क्या तुम मुझे असिस्ट करोगे?

जब मैं कम्युनिकेशन में अपना मास्टर्स पूरा करने के बाद मुंबई जाना चाहता था, तब मेरे पिता ने मुझे कर्नाड से मिलने के लिए कहा. कर्नाड समय के काफी पाबंद थे. उन्होंने एक बार लंदन में अपने घर पर एक अभिनेत्री से इसलिए मिलने से इनकार कर दिया था, क्योंकि वह एक घंटे पहले पहुंच गई थीं.

एक बार मैंने उन्हें एक नामी अभिनेता को ‘पांच मिनट लेट’ होने के लिए भी फटकार लगाते हुए देखा था, इसलिए उस मुलाकात के लिए मैं नियत समय से पांच मिनट पहले पहुंच गया और उनके घर के बाहर पांच मिनट इंतजार करने के बाद तय समय पर उनके घर में दाखिल हुआ.

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एक फिल्म के दृश्य में कर्नाड (फोटो साभार: NFAI/Facebook)

मैंने घबराते हुए उन्हें मुंबई जाने के अपने इरादे के बारे में बताया और उनसे कहा कि वहां मेरे दोस्त हैं, जो काम दिलाने में मेरी मदद कर सकते हैं. मैंने उन्हें अपनी समझ से काफी शालीन तरीके से यह कहा कि मैं उनके पास सिर्फ अपने पिता के कहने पर आया हूं, उनसे किसी तरह की सिफारिश करवाने के लिए नहीं.

उन्होंने मुझे यह कहते हुए चकित कर दिया, ‘तुम मुंबई क्यों जा रहे हो? मैं एक टीवी सीरीज कर रहा हूं. क्या तुम मुझे असिस्ट करोगे?’ इस तरह से सिनेमा और टीवी की दुनिया में मेरे सफर की शुरुआत हुई. मैंने उनके लिए दो टेलीविजन कार्यक्रम के लिए काम किया.

जब उन्होंने कुवेंपु के क्लासिक कानूरू हेग्गडिटी  को एक साथ कन्नड़ में फीचर फिल्म और हिंदी धारावाहिक के तौर पर पर्दे पर उतारने का फैसला किया, तब मैं उनका एसोसिएट डायरेक्टर बना.

इस फिल्म की शूटिंग के दौरान उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजे जाने की घोषणा की गई और उन्हें इसके लिए दिल्ली जाना था. चूंकि हम कर्नाटक के मालेनाडु इलाके में थे और अभिनेताओं समेत पूरी टीम वहीं थी, इसलिए हम शूटिंग को रोक नहीं सकते थे, इसलिए कर्नाड शूटिंग की जिम्मेदारी मुझ पर छोड़कर गए.

मालगुडी डेज  को फिल्माने वाले अनुभवी सिनेमेटोग्राफर एस. रामचंद्रन, इसमें कैमरामैन थे. मैं सिर्फ 23 साल का था और मेरे हिसाब से यह बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी. मुख्य दल (क्रू) जिस किराए के बड़े से मकान में दो महीने तक रहे थे, उसके लैंडलाइन नंबर पर कर्नाड हर दूसरे दिन फोन करते.

जब वे लौटकर आए और उन्होंने दृश्यों के फुटेज देखे, तब उन्होंने मुझसे टीवी धारावाहिक की कमान पूरी तरह से संभाल लेने के लिए कहा, ताकि वे पूरी तरह से फिल्म पर अपना ध्यान लगा सकें.

‘आप अपनी आखिरी सिगरेट मेरे साथ पिएंगे’

कर्नाड के पास ऐसे किस्सों का खजाना था, जिन्हें सिनेमा और थियेटर का ऐतिहासिक पल कहा जा सकता है. जब वे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर थे, तब चयन समिति ने अभिनय के पाठ्यक्रम के लिए ओम पुरी को दाखिला देने से मना कर दिया.

कथित तौर पर इस कारण से कि उनके चेहरे पर दाग थे और वे काफी दुबले-पतले थे. कर्नाड ने उन्हें दाखिला दिलाने के लिए अपने विशेषाधिकार का प्रयोग किया और उसके बाद जो हुआ वह इतिहास है.

कर्नाड ने मुझे बताया था कि जब उन्होंने एक मराठी नाटक में युवा शंकर नाग को देखा तो वे मंच के पीछे गए और उनसे अपनी आने वाली फिल्म में मुख्य भूमिका निभाने के लिए कहा.

शंकर ने कहा कि वे एक लेखक और निर्देशक के तौर पर कर्नाड का सम्मान करते हैं, लेकिन वे उनके निर्देशन में अभिनय करना नहीं चाहते हैं, बल्कि इसकी जगह उनका असिस्टेंट डायरेक्टर बनना चाहते हैं.

कर्नाड जब बेंगलुरु लौटे तब उन्होंने शंकर के बड़े भाई अनंत नाग को फोन किया. कुछ दिनों के बाद अनंत, शंकर को लेकर कर्नाड के घर आए और ओंदानोंदू कलादल्ली  से सिनेमा की दुनिया में उन्होंने कदम रखा.

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कर्नाड के नाटक ‘द फायर एंड द रेन’ का दृश्य (फोटो साभार: bhisham pratap padha/Flickr (CC BY 2.0)

करीब 40 साल पहले, जब कर्नाड ने सिगरेट पीना छोड़ने का फैसला किया और जिंदल नेचर क्योर इंस्टीट्यूट में भर्ती हुए, तब शंकर उनसे मिलने वहां गए. कर्नाड ने मुझे बताया कि शंकर ने उनसे उनके साथ टहलने चलने के लिए कहा और अपनी जेब से एक सिगरेट निकाल ली.

कर्नाड ने उनसे कहा कि संस्थान के परिसर में सिगरेट पर सख्त पाबंदी है, लेकिन शंकर ने कहा, ‘अगर आप सिगरेट पीना छोड़ रहे हैं, तो मैं चाहता हूं कि आप अपनी सिगरेट मेरे साथ पिएं.’

कर्नाड ने मुझे यह भी बताया कि कैसे अमजद खान ने उन्हें गोश्त काटने की कला के बारे में विस्तार से बताया था और यह भी कि सत्यजित रे एम्बेसेडर को मर्सिडीज से बेहतर मानते थे. उनके पिटारे में ऐसी और कई कहानियां थीं.

दुनिया को रचनेवाली कला’

एक बार बीबीसी एक सीरीज का निर्माण कर रही थी, जिसका शीर्षक था आर्ट दैट शूक्ड वर्ल्ड’ (कला जिसने दुनिया को हिला दिया). उन्होंने कर्नाड से महाभारत पर एक एपिसोड को प्रस्तुत करने के लिए कहा.

कर्नाड ने सीरीज के निर्माताओं से कहा कि दुनिया की किसी भी क्लासिक कृति से महाभारत की तुलना नहीं की जा सकती है और उन्हें इसके लिए ‘आर्ट दैट क्रिएटेड वर्ल्ड (दुनिया को रचनेवाली कला) शीर्षक से अलग सीरीज करनी पड़ेगी.

कर्नाड ने उन्हें इसकी जगह भागवत गीता पर एक एपिसोड करने के लिए राजी कर लिया. वे गीता, संस्कृत और क्लासिकल संस्कृत साहित्य से उसी तरह से आसानी से उद्धरण दे सकते थे, जैसे वे शेक्सपियर और इलियट से दे सकते थे.

ओडकलु बिम्बा, कर्नाड का पहला खुद का लिखा ऐसा नाटक था, जिसे उन्होंने खुद निर्देशित किया. इस नाटक में सिर्फ एक अभिनेत्री है, जो मंच पर खुद से ही संवाद करती है.

चूंकि वे मंच पर अभिनेत्री और उसके प्री-रिकॉर्डेड वीडियो के बीच बातचीत को विश्वसनीय बनाने के लिए जूझ रहे थे, इसलिए मैंने उन्हें कुछ सुझाव दिए जो शायद उनके काम आ सकते थे.

मैंने शो के दौरान मौजूद रहने का प्रस्ताव दिया ताकि तकनीकी पक्ष बिना किसी दिक्कत के निपट जाए. जब इस नाटक का पोस्टर आया, तब इसमें कर्नाड में इस नाटक के निर्देशक के तौर पर अपने साथ मेरा नाम भी दिया था.

जब अग्निशेखर निर्माता के तौर पर अपनी पहली फिल्म के लिए एक निर्देशक की तलाश कर रहे थे, जब मैंने उन्हें गिरीश कर्नाड का नाम सुझाया. श्रीधर ने कर्नाड को जब कहानी सुनाई, तब उन्होंने कहा कि इसके लिए किसी ऊर्जावान नए निर्देशक की जरूरत है.

श्रीधर ने आखिर में इसका निर्देशन करने के लिए मुझे चुना. मैंने कर्नाड से श्रीधर से इस फिल्म की पटकथा के सह-लेखन की गुजारिश की. उन्होंने यह गुजारिश मान ली और फिल्म में एक अहम किरदार को भी निभाया.

जब हमने पहला ड्राफ्ट लिखा और उसे पढ़ा, तब उन्होंने कहा, ‘इसमें स्त्रियों के लिए कुछ नहीं है.’ यह बेंगलुरु में 1986 में हुई वास्तविक घटनाओं पर आधारित एक अंडरवर्ल्ड वाली फिल्म थी. हमने इस पटकथा को नाटकीय बनाने की कोशिश की थी, लेकिन कर्नाड से पहले किसी ने भी स्त्री दर्शकों के बारे में नहीं सोचा था.

उन्होंने दारी यावुदय्या वैकुंतक्के’ वाले संवाद का सुझाव दिया था जो कि आ दिनागलु  फिल्म का एक यादगार दृश्य बन गया.

‘बस कुछ महीनों की बात है’

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एफटीआईआई के दफ्तर में कर्नाड (फोटो साभार: एफटीआईआई/ट्विटर)

जब कर्नाटक के सूचना विभाग और बाद में साहित्य अकादमी द्वारा मुझे कर्नाड पर डॉक्यूमेंट्री बनाने का काम सौंपा गया, जब मुझे उन जगहों पर उनके साथ विस्तार से शूटिंग करने का मौका मिला, जहां वे पले-बढ़े थे.

जब मैं एडिट करने के लिए बैठा, तो मैंने महसूस किया कि इसमें कमेंटरी की बहुत कम जरूरत है. कर्नाड खुद इतने स्पष्ट थे कि मुझे बस फुटेज को एक सुगठित नरेटिव में पिरोने के अलावा और कुछ नहीं करना पड़ा.

अपने विचारों को लेकर कर्नाड हमेशा काफी मुखर रहे. आपातकाल के विरोध में एफटीआईआई छोड़ने से लेकर, राजीव गांधी द्वारा लाए गए मानहानि के विधेयक की आलोचना तक, बाबरी मस्जिद के विध्वंस और उसके बाद होने वाली सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ उनके दृढ़ पक्ष तक, कर्नाड हमेशा मुखर रहे.

जैसे-जैसे न्यूज मीडिया का दायरा दैनिक अखबारों और दूरदर्शन से बढ़कर टेलीविजन और सोशल मीडिया तक फैलता गया, कर्नाड की मुखरता ख़बरों को सनसनी में बदलने वालों के लिए वरदान बन गयी.

कर्नाड को सुबह टहलना काफी पसंद था. वे चाहे जहां भी हों, इसे सुबह टहलने के अपने कार्यक्रम में विराम नहीं आने देते थे. उनकी सामान्य सुबहें जेपी नगर के एक छोटे से जंगल के चारों ओर टहलने से शुरू होती थीं.

इसके बाद उनका पड़ाव घर के पास एसएलएन रिफ्रेशमेंट्स  नाम का एक कैफे होता था, जहां वे अपना पसंदीदा उद्दीना वड़ा  खाते थे. पिछले तीन सालों की अपनी बीमारी के दौरान वे जिन चीजों की कमी महसूस करते थे, उनमें उनका यह सुबह टहलने का कार्यक्रम भी था.

कुछ महीने पहले, हिंदी प्रकाशन अमर उजाला  द्वारा उन्हें साहित्य में उत्कृष्ट योगदान के लिए एक पुरस्कार के लिए मनोनीत किया गया था. उन्हें यह पुरस्कार भूतपूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा दिया जाना था.

चूंकि कर्नाड सफर करने की स्थिति में नहीं थे, इसलिए उन्होंने आयोजकों को स्वीकृति भाषण का एक वीडियो भेजने का फैसला किया और मुझे उस वीडियो को शूट करने के लिए बुलाया.

उस वीडियो के लिए शूटिंग पूरी कर लेने के बाद उन्होंने मुझसे कहा कि ‘वे ज्यादा दिन नहीं जीने वाले अधिक से अधिक मेरे पास कुछ महीने हैं और यही सच है.’ यह बात उन्होंने एक तथ्य के तौर पर कही. वे अपनी स्थिति से परिचित थे और उन्होंने खुद को यह समझा लिया था.

मैंने माहौल को हल्का करने की कोशिश करते हुए कहा, ‘और अगर आपका आकलन गलत साबित हुआ तो?’ इस पर उन्होंने कहा, ‘तब मैं अपनी आत्मकथा का दूसरा हिस्सा लिखूंगा.’

उन्होंने अपने परिवार और दोस्तों से कह रखा था कि उनकी मृत्यु एक निजी घटना होगी. वे हमारे बीच से उतनी ही शांतिपूर्ण गरिमा और ईमानदारी के साथ विदा हो गए, जिस तरह से उन्होंने अपना जीवन जिया था.

(चैतन्य केएम फिल्मकार और रंगकर्मी हैं.)

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