भारत

‘हम चाहते हैं कि जब तक म्यांमार के हालात सुधर नहीं जाते, तब तक हमें यहां रहने दिया जाए’

अप्रैल 2018 में दिल्ली के कालिंदी कुंज इलाके में बसे रोहिंग्या कैंप में आग लग गई थी, जिससे 25 परिवारों के करीब 250 रोहिंग्या शरणार्थी बेघर हो गए थे. इसके बाद उन्हें दूसरी जगह पर बसाया गया, लेकिन भारत में नागरिकता को लेकर चल रही बहस के बीच वे अमानवीय परिस्थितियों में चुपचाप ज़िंदगी गुज़ारने को मजबूर हैं.

दिल्ली के कालिंदी कुंज इलाके में बसा रोहिंग्या कैंप.

दिल्ली के कालिंदी कुंज इलाके में बसा रोहिंग्या कैंप. (फोटो: द वायर)

नई दिल्ली: दिल्ली के कालिंदी कुंज इलाके से तकरीबन एक किलोमीटर की दूरी पर मदनपुर खादर से सटे कंचन कुंज में तकरीबन सात साल से रहते आ रहे रोहिंग्या मुस्लिमों की बस्ती में पिछले साल अप्रैल में आग लग गई थी.

इस आग में इस बस्ती की लगभग 55 झुग्गियों में से 44 आग में झुलस गई थीं, जिससे 25 परिवारों के करीब 250 रोहिंग्या शरणार्थी बेघर हो गए थे. इस आग में उनका सारा सामान जलकर खाक हो गया था. इसमें यूनाइटेड नेशंस हाई कमीशन फॉर रिफ्यूजी (यूएनएचसीआर) द्वारा उन्हें मिला रिफ्यूजी कार्ड भी शामिल था.

इसके बाद दिल्ली सरकार ने उन्हें पास में स्थित उत्तर प्रदेश सरकार की सिंचाई विभाग की जमीन पर अस्थायी तौर पर बसाया और उनके रहने-खाने की व्यवस्था की. यूएनएचसीआर ने भी कुछ दिनों में उनका रिफ्यूजी कार्ड उन्हें दोबारा मुहैया करा दिया.

रोहिंग्या मुसलमान जिस जमीन पर बसे थे वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुसलमानों के लिए काम करने वाली संस्था जकात फाउंडेशन के क्षेत्रीय संगठन जकात फाउंडेशन इंडिया की जमीन थी. जकात फाउंडेशन उस जमीन पर उनके लिए स्थायी और पक्का मकान बनाना चाहती है.

लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार जकात फाउंडेशन की जमीन के एक हिस्से पर अपना दावा जता रही है जिसकी वजह से उनके लिए बनाए जा रहे मकान का काम पिछले एक साल से रुका पड़ा हुआ है.

जकात फाउंडेशन ऑफ इंडिया की जमीन पर लगा बोर्ड.

जकात फाउंडेशन ऑफ इंडिया की जमीन पर लगा बोर्ड. (फोटो: द वायर)

म्यांमार से भागकर आए सोहैल खान पिछले कई साल से यहां पर बसे हुए हैं. वह कहते हैं, ‘यहां पर कोई सुविधा नहीं मिल रही है. पिछले साल आग लगने के बाद हम यहां पर आकर बसे हैं. यह जगह सरकार की है और हमें कभी यहां से बेदखल किया जा सकता है.’

कीकू म्यांमार में 2012 के दंगों के बाद भागकर भारत आई थीं. वह कहती हैं, ‘हमें यहां पर जो सुविधाएं मिल रही हैं वह किसी और जगह पर हमें नहीं मिल सकती हैं. हम यहां पर बहुत सुकून से रह रहे हैं. सरकार से हम यह कहना चाहते हैं कि हमें यहां पर और भी सुविधाएं मिलनी चाहिए. वह कहती हैं कि हमें यहां पर नल से पानी की व्यवस्था है जबकि बिजली एक से दो घंटे के लिए आती है.’

कीकू कहती हैं, ‘हमारे तीन बच्चे हैं. एक 12 साल की एक बेटी थी, जो कुछ समय पहले लापता हो गई थी.’

वह कहती हैं, ‘हम कबाड़ बीनने का काम करते हैं उससे हमें एक दिन में जो 100-200 की कमाई हो जाती है उसी से घर का खर्च चलता है.’

भारत सरकार ने 2017 में संसद में बताया था कि भारत में 14,000 से अधिक रोहिंग्या रह रहे हैं जो संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी यूएनएचसीआर से पंजीकृत हैं. यद्यपि सहायता एजेंसियों का अनुमान है कि देश में करीब 40,000 रोहिंग्या रह रहे हैं.

वे हैदराबाद, हरियाणा, जम्मू कश्मीर और दिल्ली के कई अन्य इलाकों में बसे हैं. सबसे अधिक 10 हजार रोहिंग्या जम्मू कश्मीर में बसे हुए हैं.

35 वर्षीय नूर फातिमा का घर भी पिछले साल लगी आग में जल गया था. वह साल 2002 से ही भारत में रह रही हैं. वह म्यांमार से बांग्लादेश के रास्ते भारत आई थीं.

वह कहती हैं, ‘मैं अपने भाई के साथ वहां (म्यांमार) से भागकर यहां आई. तब वहां के हालात आज की तरह खराब नहीं हुए थे, लेकिन माहौल धीरे-धीरे खराब होने लगा था. तब एक औरत होने के कारण अपनी इज्जत बचाने के लिए हम वहां से भागकर भारत आ गए.’

नूर फातिमा सिर पर छत के लिए भारत के अलग-अलग हिस्सों में भटक चुकी हैं. वह कहती हैं, ‘इससे पहले हम उत्तर प्रदेश के मुजफ़्फ़रनगर में रह रहे थे, लेकिन वहां पर काम नहीं मिलने के बाद हम जम्मू कश्मीर चले गए. वहां से हम हरियाणा, फिर आंध्र प्रदेश और फिर वहां से दिल्ली आए.’

नूर फातिमा.

नूर फातिमा (फोटो: द वायर)

2012 से दिल्ली में रह रहीं नूर पिछले साल लगी आग के बारे में कहती हैं, ‘आग कैसे लगी इसके बारे में हमें कुछ मालूम नहीं. वहां पर हमारे पास दो-दो दुकानें थीं लेकिन सब-कुछ जलकर खाक हो गया. जब वहां से यहां पर आए तो आस-पास के लोगों ने मदद की और रहने खाने की व्यवस्था की. अब हमने फिर से अपनी दुकान लगा ली है.’

यहां पर मिल रही सुविधाओं के बारे वे कहती हैं, ‘हम म्यांमार में जिन हालात में रहकर आए हैं, उससे हम यहां पर अच्छे हैं. यहां की सरकार भी सही है, लोग भी सही हैं इसीलिए हमें यहां पर अच्छा लग रहा है.’

वह कहती हैं, ‘अगर हम म्यांमार के बारे में सोचते हैं तब तो यह हमारे लिए जन्नत है. वह हमारा अपना घर था लेकिन हम वहां सही से रह नहीं पाए. वहां हमारे पास घर-जमीन सबकुछ था लेकिन सब वहां की सरकार ने ले लिया.’

वह कहती हैं, ‘यहां पर हमें गुजारा करने में बहुत दिक्कत होती है. झुग्गी है कभी आग लग जाए, कभी पानी आ जाए, कभी सांप घुस जाए तो बहुत दिक्कत होती है.’

उनके तीन बच्चे हैं, जो जकात फाउंडेशन की मदद से पढ़ने जाते हैं. नूर कहती हैं, ‘अब हमारे बच्चे भी बड़े हो रहे हैं. हम भी चाहते हैं कि हमारा अपना मकान हो लेकिन वह हमारी किस्मत में नहीं है.’

कालिंदी कुंज में इस रोहिंग्या बस्ती के चारों तरफ कूड़े का ढेर और झाड़ियां हैं. वह जगह गड्ढे में है जिससे बारिश होने पर पानी भर जाता है. वहीं आस-पास पेड़ आदि न होने के कारण सीधी धूप आती है. वे जिन झुग्गियों में रह रहे हैं उनकी छत पर तिरपाल लगाकर काम चला रहे हैं जबकि लकड़ी से उन्होंने झुग्गी की दीवारें बना रखी हैं. वहीं वे चादर से दरवाजों का काम चलाते हैं.

म्यांमार में 2012 में हुए दंगों के बाद अपनी हसीना बेगम अपनी मां के साथ भागकर भारत आ गई थीं. भारत में जब से आई हैं तब से वह दिल्ली के इसी इलाके में रह रही हैं.

वहां से भागकर आने के बारे में हसीना बेगम कहती हैं, ‘वहां बहुत समस्या चल रही थी. सब को काट-मार रहे हैं. बच्चों और औरतों को भी नहीं छोड़ रहे हैं. हमारे पापा को भी जान से मार दिया गया. इसी वजह से मेरी मां हम तीन बहनों और छोटे भाई को लेकर भारत आ गई.’

पिछले साल लगी आग के बारे में वह कहती हैं, ‘हमें कुछ नहीं पता आग कैसे लगी. हमारा सारा सामान उसमें जलकर खाक हो गया था. इसके बाद जकात फाउंडेशन ने हमें यहां लाकर बसाया और खाने-पीने की व्यवस्था की.’

वह कहती हैं, ‘म्यांमार की तुलना में हम यहां पर अच्छे से हैं. यहां पर बाहर निकलकर घूम-फिर सकते हैं. हम विदेशी हैं तो यहां पर हमें थोड़ी समस्या तो होगी ही. यहां पर गर्मी बहुत ज्यादा है जिससे बच्चों को बहुत परेशानी होती है.’

पिछले साल कैंप में लगी आग के आज एक साल बाद भी कालिंदी कुंज में बसे इन रोहिंग्या मुसलमानों के सामने जीवनयापन का गहरा संकट है. वे बेहद अमानवीय हालात में वहां रहने को मजबूर हैं. घर का खर्च चलाने के लिए उन्हें खासी मशक्कत पड़ती है.

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कैंप में एक रोहिंग्या बच्चा (फोटो: द वायर)

16 साल के अब्दुल करीम सात साल से भारत में रह रहे हैं. वह कहते हैं, ‘हम वहां से क्यों भागकर आ गए, यह तो हमें नहीं पता है क्योंकि तब मैं बहुत छोटा था. लेकिन इतना पता है कि वहां सेना से लड़ाई हुआ था. हमारे घरों को आग लगा दिया गया फिर हम भागकर भारत आ गए.’

अब्दुल करीम का सपना इंजीनियर बनने का है. वे कहते हैं, ‘पिछले साल किसी ने हमारा घर जला दिया था. इसके बाद हम यहां आकर बस गए. घर में आठ सदस्य हैं. पापा बैटरी रिक्शा चलाते हैं. वो जो कमाकर लाते हैं वह उसी दिन खत्म हो जाता है. हम सब की पढ़ाई में भी पैसा खर्च होता है.’

इन लोगों को दिल्ली के बाकी रहवासियों की तरह ही पीने के पानी की समस्या से भी दो-चार होना पड़ता है. उन्हें भी पानी खरीदकर पीना पड़ता है. वे बताते हैं कि शुरुआत में पानी के टैंकर आते थे लेकिन अब वे नहीं आते हैं.

75 साल के अमानउल्ला खान पिछले 60 सालों से भारत में रह रहे हैं. वे कहते हैं, ‘पहले तो (म्यांमार से) नाव से आने में उतनी दिक्कत नहीं होती थी लेकिन अब समस्या बहुत बढ़ गई है.’

वे कहते हैं, ‘पिछले साल लगी आग के बाद हमें यहां पर एक महीने के लिए बसाया गया था लेकिन अब धीरे-धीरे एक साल हो गए हैं. यूएन एक कार्ड जारी करता है हमें यहां रहने के लिए उसे हर साल रिन्यू कराना होता है.’

सब्जी की दुकान चलाने वाले  घर का खर्च निकालने वाले अमानउल्लाह खान कहते हैं, पीने का पानी खरीदना पड़ता है. शुरुआत में पानी के टैंकर आते थे लेकिन अब वे भी नहीं आते हैं. कुछ लोग मजबूरी में नल का पानी ही पीते हैं.

36 वर्षीय अब्दुल्ला पिछले सात साल से भारत में रह रहे हैं. पिछले साल लगी आग करते हुए वे कहते हैं, ‘आग किसी ने लगा दी या खुद लग गई ये हमें नहीं पता लेकिन एक घंटे के अंदर सबकुछ जलकर खाक हो गया.’

वे कहते हैं, ‘यहां पर हमारे 66 परिवार हैं जिसमें कुल मिलाकर 280 लोग हैं. यह चारों तरफ से तालाब जैसा है और जब बारिश होती है तब हमारी इन झुग्गियों में कमर तक पानी भर जाता है. उस समय सांप भी हमारे घरों में घुस जाते हैं. सांप के काटने की वजह से दो-तीन बच्चे मर चुके हैं.’

बैटरी रिक्शा चलाकर महीने में 12-15 हजार रुपये कमाने वाले अब्दुल्ला कहते हैं, ‘यहां पर बहुत सारी समस्या है. पानी भर जाता है जो निकल नहीं पाता है. यहां पर पेड़-पौधे भी नहीं हैं. गर्मी बहुत ज्यादा है.’

वे आगे कहते हैं, ‘हमारी झुग्गियों के छत तिरपाल से ढके हैं, जिससे बहुत ज्यादा गर्मी अंदर आती है. इससे बच्चों को बड़े-बड़े दाने निकल जाते हैं. हम जो कमाई करते हैं वह खाने-पीने में ही निकल जाता है.’

वे कहते हैं, ‘यहां की भाषा न आने के कारण भी हम लोगों के साथ बहुत सी समस्याएं आती हैं. बहुत से लोगों को काम नहीं मिलता है. वहीं बहुत से लोगों को कम सैलरी देते हैं जबकि बहुत के साथ काम करवाने के बाद बेईमानी कर ली जाती है.’

पिछले साल अक्टूबर में भारत से सात रोहिंग्या मुसलमानों को भारत सरकार ने उनके देश म्यांमार भेज दिया था. इसके बाद देशभर में रह रहे करीब 40 हजार अन्य रोहिंग्या मुसलमानों में डर पैदा हो गया.

इसके बाद दिल्ली के कालिंदी कुंज में रहने वाले एक रोहिंग्या मुसलमान मोहम्मद सलीम ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई.

उन्होंने म्यांमार में खतरों को देखते हुए मानवीय आधार पर रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में ही रहने देने की मांग की. इस मामले की सुनवाई फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.

मोहम्मद सलीम कहते हैं, ‘मैं सिर्फ अपील करना चाहता हूं कि हमें यहां पर सिर्फ जीना है. हम भी इंसान हैं, हमें भी जीने का अधिकार है. हमें और कुछ नहीं चाहिए. जब तक म्यांमार के हालात सुधर नहीं जाते हैं और हमें वहां अधिकार नहीं दिया जाता है तब तक हमें यहां रहने दिया जाए.’