राजनीति

अमित शाह ने जम्मू कश्मीर में राज्यपाल शासन छह महीने बढ़ाने का प्रस्ताव पेश किया

गृह मंत्री के रूप में अमित शाह द्वारा सदन में पेश पहला प्रस्ताव है. कांग्रेस ने कहा कि जम्मू कश्मीर में निर्वाचित सरकार का नहीं होना, देशहित में नहीं है.

Srinagar: Union Home Minister Amit Shah being received by Jammu and Kashmir Governor Satya Pal Malik on his arrival at the airport in Srinagar, Wednesday, June 26, 2019, for a two-day visit to the Valley to review the security arrangements in the view of Amarnath Yatra. (PTI Photo) (PTI6_26_2019_000124B)

जम्मू कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक के साथ गृह मंत्री अमित शाह. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: गृह मंत्री अमित शाह ने शुक्रवार को लोकसभा में एक सांविधिक संकल्प पेश किया जिसमें जम्मू कश्मीर में राज्यपाल शासन की अवधि को छह महीने बढ़ाने का प्रस्ताव किया गया है. इसके अलावा उन्होंने जम्मू कश्मीर आरक्षण संशोधन विधेयक भी चर्चा एवं पारित होने के लिए पेश किया.

प्रस्ताव में कहा गया है कि यह सभा जम्मू कश्मीर राज्य के संबंध में राष्ट्रपति द्वारा संविधान के अनुच्छेद 356 के अंतर्गत जारी 19 दिसंबर 2018 के आदेश को 3 जुलाई 2019 से और छह महीने की अवधि के लिए आगे जारी रखने का अनुमोदन करती है.

अमित शाह ने कहा, ‘जम्मू कश्मीर में अभी विधानसभा अस्तित्व में नहीं है इसलिए मैं यह विधेयक लेकर आया हूं कि छह माह के लिए और राज्यपाल शासन को बढ़ाया जाए.’

उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग ने पहले जम्मू कश्मीर प्रशासन, केंद्र सरकार और सभी राजनीतिक दलों से चर्चा कर निर्णय लिया है कि इस साल के अंत में ही वहां चुनाव कराना संभव हो सकेगा.

यह गृह मंत्री के रूप में अमित शाह द्वारा सदन में पेश पहला प्रस्ताव है.

उल्लेखनीय है कि जम्मू कश्मीर में राज्यपाल शासन जून 2018 में लगाया गया था जब भाजपा ने प्रदेश में गठबंधन सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया था और पीडीपी के नेतृत्व वाली महबूबा मुफ्ती सरकार अल्पमत में आ गई थी. दिसंबर 2018 में यहां राज्यपाल शासन लागू किया गया था.

शाह ने निचले सदन में जम्मू कश्मीर आरक्षण संशोधन विधेयक 2019 चर्चा एवं पारित होने के लिए पेश किया. इससे अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को वास्तविक नियंत्रण रेखा से लगे क्षेत्रों में निवास कर रहे व्यक्तियों के समान आरक्षण का लाभ मिल सकेगा.

इस विधेयक के माध्यम से जम्मू कश्मीर आरक्षण अधिनियम 2004 में और संशोधन करने का प्रस्ताव किया गया है .

विधेयक के उद्देश्यों एवं कारणों में कहा गया है कि जम्मू कश्मीर आरक्षण अधिनियम 2004 और उसके अधीन बनाए गए नियम के तहत आरक्षण का फायदा अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे हुए क्षेत्रों में निवास कर रहे व्यक्तियों को उपलब्ध नहीं था.

इसमें कहा गया है कि सीमापार से लगातार तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे हुए क्षेत्रों में निवास कर रहे व्यक्ति सामाजिक आर्थिक और शैक्षिक पिछड़ेपन से पीड़ित होते हैं. यह स्थिति इन निवासियों को अन्य सुरक्षित स्थान पर प्रस्थान करने के लिए प्राय: विवश करती है जिसके कारण उनकी आर्थिक स्थिति और शैक्षिक स्तर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है.

इसके अनुसार, ऐसे में अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे हुए क्षेत्रों में निवास कर रहे व्यक्तियों को अधिनियम की परिधि में लाने की और उन्हें वास्तविक नियंत्रण रेखा से लगे क्षेत्रों में निवास कर रहे व्यक्तियों के समान बनाने की सतत मांग थी. ऐसे में अधिनियम में संशोधन आवश्यक हो गया था.

जम्मू कश्मीर आरक्षण संशोधन विधेयक 2019, जम्मू कश्मीर आरक्षण संशोधन अध्यादेश 2019 को प्रतिस्थापित करने के लिए है, जो अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे हुए क्षेत्रों में निवास कर रहे व्यक्तियों को उनके समग्र सामाजिक आर्थिक और शैक्षिक विकास के दीर्घकाल से लंबित मांग को पूरा करेगा.

इसके माध्यम से अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे हुए क्षेत्रों में निवास कर रहे लोगों को वास्तविक नियंत्रण रेखा से लगे हुए क्षेत्रों में निवास कर रहे व्यक्तियों को उपलब्ध आरक्षण का लाभ उठाने में समर्थ बनाया जा सकेगा.

देशहित में नहीं है जम्मू कश्मीर में निर्वाचित सरकार नहीं होना: कांग्रेस

कांग्रेस ने जम्मू कश्मीर में राष्ट्रपति शासन की अवधि छह महीने बढ़ाने से जुड़े सरकार के कदम का विरोध करते हुए शुक्रवार को कहा कि इस संवेदनशील राज्य में निर्वाचित सरकार का नहीं होना देशहित में नहीं है.

पार्टी ने सरकार से पूछा कि जब राज्य में लोकसभा चुनाव शांतिपूर्ण ढंग से हो सकते हैं तो विधानसभा चुनाव क्यों नहीं करवाए जा सकते?

राष्ट्रपति शासन छह महीने के लिए बढ़ाने के प्रस्ताव और जम्मू कश्मीर आरक्षण (संशोधन) विधेयक-2019 पर लोकसभा में चर्चा में भाग लेते हुए कांग्रेस के मनीष तिवारी ने यह आरोप लगाया कि केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के आने के बाद से राज्य के लोगों में खुद को अलग-थलग महसूस करने का भाव बढ़ा है.

उन्होंने कहा कि कांग्रेस इसका पूरा समर्थन करती है कि सरकार आतंकवाद और आतंकवादियों के खिलाफ सख्ती दिखाए, लेकिन साथ ही राज्य के लोगों को साथ लेने की कोशिश करे.

तिवारी ने सरकार से सवाल किया कि जब हाल में राज्य में लोकसभा शांतिपूर्ण ढंग से चुनाव करवाए गए तो फिर वहां विधानसभा चुनाव क्यों नहीं करवाए जा सकते?

तिवारी ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के मशहूर कथन ‘इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत’ का उल्लेख करते हुए कहा कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई तभी जीती जा सकती है जब जनता साथ होगी. इसलिए आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई जारी रखने के साथ जम्मू कश्मीर की जनता का विश्वास भी जीतना होगा.

उन्होंने ऐतिहासिक तथ्यों और घटनाओं का हवाला देते हुए कहा कि राज्य में फिलहाल जो स्थिति है उसकी बुनियाद उस वक्त पड़ी जब 2015 में वैचारिक रूप से बेमेल भाजपा और पीडीपी की सरकार बनी.

तिवारी ने कहा कि जम्मू कश्मीर एक संवेदनशील राज्य है और ऐसे में यहां निर्वाचित सरकार का नहीं होना देशहित में नहीं है.

उन्होंने कहा कि 1971 में इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते हुए पाकिस्तान के दो टुकड़े किए गए जिसके बाद पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर और पंजाब में हस्तक्षेप करना शुरू किया. कांग्रेस की सरकार ने पंजाब से आतंकवाद खत्म किया.

तिवारी ने कहा कि पाकिस्तान के खिलाफ सभी को मिलकर लंबी लड़ाई लड़नी होगी. उन्होंने जम्मू कश्मीर आरक्षण (संशोधन) विधेयक 2019 के संदर्भ में कहा कि इस विधेयक की भावना का समर्थन करते हैं, लेकिन इसे जम्मू कश्मीर विधानसभा में पारित होता तो बेहतर होता क्योंकि यह उसके अधिकार क्षेत्र में आता है.

रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी) के एनके प्रेमचंद्रन ने राष्ट्रपति शासन छह महीने बढ़ाए जाने के प्रस्ताव का विरोध किया, हालांकि उन्होंने आरक्षण विधेयक का समर्थन किया.

प्रेमचंद्रन ने कहा कि जब भाजपा ने पीडीपी के साथ गठबंधन खत्म किया तो कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस ने पीडीपी को समर्थन दिया, लेकिन इस गठबंधन को मौका नहीं दिया गया और जल्दबाजी में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया.