भारत

प्रधानमंत्री जी! ‘धूल चेहरे पर थी और आईना साफ करता रहा’ आप पर भी चरितार्थ होता है

मोदी सरकार और उनके समर्थक लगातार मीठा-मीठा गप और कड़वा-कड़वा थू की कहावत को चरितार्थ करते नज़र आ रहे हैं. विचार या निष्कर्ष उनके अनुकूल हुए तो उसके सौ खोट भी सिर माथे और प्रतिकूल हुए तो ईमानदार विश्लेषण भी टके सेर.

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लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फोटो: पीटीआई)

सच पूछिए तो इसे ही कहते हैं मीठा-मीठा गप और कड़वा-कड़वा थू. अभी हफ्ता भी नहीं बीता, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भक्त इसे लेकर फूले-फूले फिर रहे थे कि ‘ब्रिटिश हेराल्ड’ नामक ‘ब्रिटेन की अग्रणी पत्रिका’ के रीडर्स पोल में मोदी को दुनिया का सबसे ताकतवर नेता (वर्ल्ड्स मोस्ट पावरफुल पर्सन 2019) चुना गया है.

इन भक्तों द्वारा संचालित समाचार पत्रों व न्यूज चैनलों में सविस्तार लिखा और बताया जा रहा था कि इस रीडर्स पोल की नामांकन सूची में दुनिया की 25 सबसे बड़ी हस्तियां शामिल थीं और वोटिंग के लिए अनिवार्य वन टाइम पासवर्ड (ओटीपी) दिया गया था, ताकि कोई व्यक्ति एक से ज्यादा बार वोट न कर सके.

अंत में चार उम्मीदवारों- भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुए मुख्य मुकाबले में मोदी ने बाकी तीन को पछाड़कर शीर्ष पर जगह बना ली.

इस पोल की एक खास बात यह भी बताई जा रही थी कि वोटर अपनी पसंदीदा हस्ती को जिताने के लिए इतने उत्साहपूर्वक वोट कर रहे थे कि वोटिंग साइट क्रैश होकर रह जा रही थी. यह भी कि आगामी 15 जुलाई को जारी होने वाले उक्त पत्रिका के जुलाई संस्करण में पोल के विजेता नरेंद्र मोदी की तस्वीर कवर पेज पर प्रकाशित की जाएगी.

सारे के सारे भक्त इसको एक सुर में ‘देश के लिए बड़े गर्व का विषय’ बताकर आह्लादित हो रहे थे. शुक्र है कि ऑल्ट न्यूज की मार्फत भक्तों के इस गड़बड़ घोटाले की पोल खुलने में ज्यादा वक्त नहीं लगा.

आज हम जानते हैं कि ‘ब्रिटिश हेराल्ड’ के नाम में भले ही ‘ब्रिटिश’ शब्द जुड़ा हुआ है, वह ब्रिटेन की अग्रणी पत्रिका कतई नहीं है. इसीलिए भक्तों द्वारा संचालित देसी समाचार पत्रों व न्यूज चैनलों को छोड़ दुनिया के किसी भी समाचार या संवाद माध्यम ने उसके तथाकथित रीडर्स पोल की खबर नहीं दी.

दरअसल ‘ब्रिटिश हेराल्ड’ केरल के एक उद्योगपति द्वारा, जो ‘कोचीन हेराल्ड’ के एडीटर-इन-चीफ हैं, ब्रिटेन में अप्रैल, 2018 में रजिस्टर्ड कराई गई कंपनी का प्रकाशन है.

उसके ट्विटर एकाउंट के सिर्फ चार हजार फॉलोवर हैं, जबकि ऑल्ट न्यूज के बारह लाख. फेसबुक पर भी ‘ब्रिटिश हेराल्ड’ को फॉलो करने वालों की संख्या लाख का आंकड़ा नहीं छू पाती- सिर्फ 57 हजार ही है.

ब्रिटेन के सचमुच के अग्रणी समाचार माध्यमों बीबीसी और ‘द गार्जियन’ के मुकाबले यह संख्या कहां ठहरती है, इसे जानने के लिए समझना चाहिए इन दोनों के ही के फॉलोवरों की संख्या दसियों लाख है. बीबीसी के फेसबुक पेज के 480 लाख, जबकि ‘द गार्जियन’ के फेसबुक पेज के अस्सी लाख फॉलोवर हैं.

बहरहाल, ‘गर्व’ के इस विषय के लिए मोदी की बधाइयां गाने वाले भक्तों को तब इतनी भी फुर्सत नहीं थी कि वे रीडर्स पोल के दौरान ‘ब्रिटिश हेराल्ड’ की वोटिंग साइट के क्रैश होने के दावे की इस तथ्य से तुलना कर लें कि उसका ग्लोबल एलेक्सा वेब ट्रैफिक रैंक 28,518 है, जो तीन महीने पहले 95,979 था और जब उसने इस कथित पोल के नतीजे घोषित किए तो उसके ट्विटर एकाउंट को सिर्फ डेढ़ सौ बार शेयर किया गया.

तब भक्तों को इस सवाल का भी कोई तुक समझ में नहीं आया कि एक विदेशी पत्रिका के इस तरह के रीडर्स पोल पर उनके यों छाती चौड़ी करने का क्या औचित्य है?

भले ही गत मई में अमेरिकी पत्रिका ‘टाइम’ द्वारा मोदी को ‘इंडियाज डिवाइडर इन चीफ’ बताने का उन्होंने ऐसे ही सवालों से मजाक उड़ाया था. अलबत्ता, बाद में ‘टाइम’ ने अपना निष्कर्ष बदलकर कह दिया कि ‘मोदी यूनाइटेड इंडिया लाइक नो पीएम इन डिकेड्स’, तो भक्त फिर मगन हो उठे थे.

उन्हें याद आ गया था कि यह वही पत्रिका है जिसने जुलाई, 2012 तत्कालीन प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह को ‘अंडरअचीवर’ बताया था.

मीठा-मीठा गप और कड़वा-कड़वा थू की अपनी इसी परंपरा के अनुसार अब भक्त अमेरिकी विदेश विभाग द्वारा तैयार की गई उस अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता रिपोर्ट को खारिज करने में लगे हैं, जिसमें कही गई कई बातें नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की विश्वव्यापी बदनामी का जरिया हैं.

यह पूछने में ये भक्त देश के विदेश मंत्रालय से भी आगे चले जा रहे हैं कि एक विदेशी संस्था द्वारा हमारे नागरिकों के संविधान संरक्षित अधिकारों की स्थिति पर टिप्पणी करने का क्या औचित्य है?

दरअसल मोदी, उनकी सरकार और इन भक्तों की सम्मिलित विडंबना है कि वे बड़ी पूंजी के लिए पलक-पांवड़े बिछाने को तो, वह जहां से भी और जैसे भी अर्जित की गई हो और उसका अतीत कितना भी खराब क्यों न हो, हमेशा तैयार रहते हैं.

इसके लिए अपने स्वदेशी जागरण मंच जैसे आनुषंगिक संगठनों के सच्चे-झूठे एतराजों की भी फिक्र नहीं करते. लेकिन विचार, असहमतियां या निष्कर्ष जैसे ही तनिक भी प्रतिकूल प्रतीत होते हैं, उन्हें अस्वीकारने या खारिज करने के लिए हिंदू-अहिंदू, धार्मिक-अधार्मिक, भारतीय-अभारतीय, देसी-विदेशी और पूरब-पश्चिम आदि के बाड़ बनाने लगते हैं.

विचार या निष्कर्ष उनके अनुकूल हुए तो उनके सौ खोट भी सिर माथे और प्रतिकूल हुए तो उनका ईमानदार विश्लेषण भी टके सेर. विदेशी विचारों व निष्कर्षों के स्वीकार व नकार के कोई नीतिगत कसौटियां ये भक्त इसलिए नहीं बना पाते कि जब भी ऐसा करने चलते हैं, अंतर्विरोधों में फंस जाते हैं.

इनके दुर्भाग्य से धर्मिक स्वतंत्रता संबंधी उक्त रिपोर्ट किसी विदेशी संस्था की नहीं, अमेरिका के विदेश विभाग की है. जानना चाहिए कि ‘दुनिया के सबसे ताकतवर राजनेता’ नरेंद्र मोदी भारत जैसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री होने के बावजूद इस अमेरिका के लगाये प्रतिबंधों की अवज्ञा कर ईरान से कच्चे तेल की खरीद जारी रखने का साहस नहीं दिखा पा रहे.

यही अमेरिका पड़ोसी पाकिस्तान के बारे में कोई ऐसी टिप्पणी कर देता है, जो भक्तों के अनुसार भारत के राष्ट्रीय स्वार्थों को माफिक बैठती है तो वे खुद को गदगद या बाग-बाग होने से नहीं रोक पाते.

जानकारों की मानें, तो नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा पिछले पांच सालों में अमेरिकी चौधराहट को जिस तरह बढ़ाया, स्वीकार किया और उसके सामने सिर झुकाया गया है, वैसा इससे पहले देश की किसी सरकार ने नहीं किया.

अब अमेरिकी विदेश विभाग की धार्मिक स्वतंत्रता संबंधी रिपोर्ट को लेकर इस सरकार की मुश्किल यह है कि अपने भक्तों की कारस्तानियों के चलते वह उसे स्वीकार करके तो अपनी जगहंसाई कराने को अभिशप्त है ही, अस्वीकार करके भी उससे निजात नहीं पाने वाली.

हमारे पाठक इस रिपोर्ट को पहले ही विस्तार से पढ़ चुके हैं, इसलिए यहां उसे दोहराने का कोई मतलब नहीं है. संक्षेप में इतना भर जान लेना पर्याप्त होगा कि उसमें बीती 6 फरवरी को लोकसभा में भारत के गृह मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के ही हवाले से कहा गया है कि भारत में गोहत्या के नाम पर हिंसक हिंदू चरमपंथी समूहों द्वारा अल्पसंख्यक समुदायों, विशेष रूप से मुसलमानों, के खिलाफ हमला साल 2018 में भी जारी रहा और मोदी सरकार गोरक्षकों द्वारा किए गये हमले को लेकर कार्रवाई करने में विफल रही.

अधिकारियों ने अक्सर अपराधियों पर कार्रवाई होने से बचाया तो केंद्र व राज्य सरकारों एवं राजनीतिक दलों के सदस्यों की वजह से मुस्लिम प्रथाएं व संस्थान प्रभावित हुए. ऐसे शहरों के नाम बदलने के प्रस्ताव भी जारी रहे, जिनके नाम मुस्लिमों से जुड़े हुए हैं.

मोदी और उनकी सरकार की एक और मुश्किल यह है कि वह इस रिपोर्ट को तथ्यों के आधार पर नहीं झुठला सकती क्योंकि इसका तकिया उसके ही आंकड़ों पर रखा गया है.

देशवासियों ने तो खैर इस अमेरिकी रिपोर्ट के बरक्स मोदी के पिछले कार्यकाल में बिहार के दो केंद्रीय मंत्रियों को भीड़ की हिंसा के आरोपियों को माला पहनाते और अल्पसंख्यकों को बात-बात पर पाकिस्तान जाने की धमकी देते भी देखा था.

इस पारी में भी वह उनके सांसदों को मुस्लिम सांसदों के शपथग्रहण के वक्त उन्मत्त होकर ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाते देख चुका है, जिससे 2014 से 2019 जैसे हालात आगे भी बने रहने की आशंका हो रही है.

अगर मोदी इस आशंका को दूर कर अपने कथनानुसार उन देशवासियों का विश्वास जीतना चाहते हैं, जिन्होंने उन्हें वोट नहीं दिया तो उन्हें अपने भक्तों को ऐसी रिपोर्टों के नकार का रवैया छोड़ने और देश की धर्मनिरपेक्षता या कि सर्वधर्म समभाव और विविधता के सच्चे संरक्षण की प्रेरणा देनी होगी क्योंकि ये संवैधानिक मूल्य हमारे देश की प्राणवायु हैं और इनका कोई विकल्प नहीं हो सकता.

हां, नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता की कसौटियों के लिहाज से अमेरिका भी कोई दूध का धुला नहीं है, लेकिन ऐसा लांछन उसकी इस रिपोर्ट का जवाब नहीं हो सकता क्योंकि मोदी सरकार ने बहुलवादी भारत की तस्वीर ही कुछ ऐसी बना दी है- अक्स तो जैसा है वैसा ही नजर आएगा, आप आईना बदलते हैं, बदलते रहिए.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)