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इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज ने पीएम को पत्र लिख कहा- कॉलेजियम सिस्टम में है भाई-भतीजावाद और जातिवाद

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस रंगनाथ पांडेय ने आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों के जजों की नियुक्ति लॉबिंग और पक्षपात के आधार पर होती है. जस्टिस पांडेय 4 जुलाई को सेवानिवृत्त होने वाले हैं.

Justice Ranganath Pandey and PM Modi

नई दिल्ली: इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस रंगनाथ पांडेय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर जजों की नियुक्ति करने वाली कॉलेजियम प्रणाली में भाई-भतीजावाद और जातिवाद का आरोप लगाया है.

बार एंड बेंच के अनुसार, एक जुलाई को लिखे पत्र में पांडेय ने आरोप लगाया कि इस सिस्टम में भेदभाव, अपारदर्शिता और पक्षपात होता है.

संभवतया यह पहली बार है कि हाईकोर्ट के एक मौजूदा जज ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया में कमियों की ओर ध्यान दिलाया है. बता दें कि, जस्टिस पांडेय 4 जुलाई को सेवानिवृत्त होने वाले हैं.

पत्र की शुरुआत में जस्टिस पांडेय ने लोकसभा चुनावों में जीत के लिए मोदी को बधाई दी और परिवारवाद की राजनीति के खात्मे के लिए प्रशंसा की.

इसके बाद एक न्यायिक अधिकारी के रूप में अपने 34 सालों के अनुभव पर बात की. उन्होंने दावा किया कि कॉलेजियम सिस्टम के माध्यम से जजों की नियुक्ति केवल जातिवाद और भाई-भतीजावाद के आधार पर होती है.

एएनआई के अनुसार, कॉलेजियम सिस्टम में मौजूदा मुद्दों को उठाते हुए उन्होंने कहा कि अगले जजों की नियुक्ति पूर्व जजों के साथ उनके रिश्तों पर निर्भर करती है. इसके परिणामस्वरूप, उस जज के न्यायिक कामकाज के भेदभावपूर्ण  रहने पर प्रश्न उठता है.

उन्होंने आरोप लगाया कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों के जजों की नियुक्ति बंद कमरों में और चाय के कप पर लॉबिंग और पक्षपात के आधार पर की जाती है. हालांकि, नियुक्त होने वाले जजों के नामों को केवल प्रक्रिया पूरी होने के बाद सार्वजनिक किया जाता है.

जस्टिस पांडेय ने लिखा, जजों की नियुक्ति का आधार नहीं बताया जाता है. उन्होंने कहा कि यह पूरी प्रक्रिया बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है.

बार एंड बेंच के अनुसार, उन्होंने यह भी आरोप लगाया था कि ऐसे मामलों में जब कुछ वरिष्ठ जज अपने रिश्तेदारों की नियुक्ति हाईकोर्ट के जज के रूप में नहीं कर पाते हैं तब वे उन्हें निचली अदालतों में नियुक्त कर देते हैं.

राष्ट्रीय न्यायिक आयोग अधिनियम और 99वें संविधान संशोधन को खारिज करने वाले साल 2015 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आलोचना करते हुए जस्टिस पांडेय ने लिखा, सुप्रीम कोर्ट ने अधिनियम को खारिज कर दिया क्योंकि इससे नियुक्ति करने के उसका अधिकार प्रभावित होता.

बता दें कि, राष्ट्रीय न्यायिक आयोग अधिनियम लागू होने पर नेताओं और नागरिक समाज की जजों की नियुक्ति में भूमिका रहती.

कॉलेजियम सिस्टम की आलोचना करने के अलावा जस्टिस पांडेय ने जनवरी, 2018 में हुए सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों के प्रेस कांफ्रेंस के बारे में कहा, इससे न्यायपालिका की छवि खराब हुई. बता दें कि उस प्रेस कांफ्रेंस में सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों ने तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा द्वारा केसों के वितरण के बारे में चिंता जाहिर की थी.

वहीं, अपने पत्र के आखिर में उन्होंने मोदी से मौजूदा प्रणाली में मौजूद समस्याओं पर विचार करने और देश की न्यायपालिका के गौरव को वापस लाने का अनुरोध किया.