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आप एक फिल्म प्रमाणन बोर्ड हैं, न कि सेंसर बोर्ड: बॉम्बे हाईकोर्ट

केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने बच्चों की एक फिल्म को यूनिवर्सल/एडल्ट सर्टिफिकेट दिया था. बोर्ड को फटकार लगाते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि दुनिया बदलने के साथ कहानी कहने की कला भी बदल रही है. आप इसका फैसला नहीं कर सकते हैं कि कोई क्या देखना चाहता है और क्या नहीं.

बॉम्बे हाई कोर्ट (फोटो : पीटीआई)

बॉम्बे हाईकोर्ट (फोटो: पीटीआई)

मुंबई: बच्चों को लेकर बनी एक फिल्म के एक दृश्य को हटाने और एक ‘अभद्र शब्द’ की आवाज को दबाने के बाद ही उसे यूनिवर्सल (यू) सर्टिफिकेट देने की बात पर बॉम्बे उच्च न्यायालय ने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) को फटकार लगाई है.

बीते पांच जुलाई को मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने सीबीएफसी को कहा, ‘आप (सीबीएफसी) यह फैसला नहीं करेंगे कि लोग क्या देखना चाहते हैं और क्या नहीं.’

जस्टिस एससी धर्माधिकारी और जस्टिस गौतम पटेल की पीठ ने कहा कि उन्हें पूरी तरह से सीबीएफसी की भूमिका को दोबारा परिभाषित करना होगा क्योंकि सीबीएफसी यह सोचकर बैठा है कि अकेले सिर्फ उसी के पास सभी लोगों के बारे में निर्णय लेने के लिए बुद्धिमत्ता है.

चिल्ड्रेंस फिल्म सोसाइटी (सीएफएस) की एक याचिका पर पीठ सुनवाई कर रहा था. सीएफएस की मांग थी कि फिल्म ‘चिड़ियाखाना’ को यूनिवर्सल सर्टिफिकेट जारी करने के लिए पीठ सीबीएफसी को निर्देश दे.

इस साल जनवरी में सीबीएफसी ने इस फिल्म को यूनिवर्सल/अडल्ट (यू/ए) का सर्टिफिकेट जारी किया था. सीबीएफसी को एक अभद्र शब्द और एक दृश्य पर आपत्ति थी, जिसको लेकर उसने इसे यूनिवर्सल सर्टिफिकेट देने से इनकार कर दिया था.

मालूम हो कि फिल्म को जब तक यूनिवर्सल सर्टिफिकेट नहीं मिलेगा तब तक यह बच्चों को नहीं दिखाई जा सकती है. यू/ए सर्टिफिकेट मिलने पर 12 साल से कम उम्र के बच्चों को उनके अभिभावकों की निगरानी में फिल्म दिखाने का नियम है.

सोसाइटी ने दावा किया था कि यह फिल्म बच्चों को दिखाई जानी है और इसकी स्क्रीनिंग स्कूलों में की जाएगी.

पीठ ने सीबीएफसी से कहा कि इस तरह के दृश्यों को डिलीट करने को कहकर आप यह दिखावा कर रहे थे इस तरह की चीजें दुनिया में नहीं होती हैं.

फिल्म चिड़ियाखाना का पोस्टर. (फोटो साभार: फेसबुक)

फिल्म चिड़ियाखाना का पोस्टर. (फोटो साभार: फेसबुक)

जस्टिस पटेल ने कहा, ‘आप शुतुरमुर्ग हैं क्या? रेत के भीतर अपना सिर डाल लें और यह सोचने की कोशिश करें कि यह चीज दुनिया में है ही नहीं.’

जस्टिस पटेल ने कहा, ‘हमें आश्चर्य हो रहा है कि सीबीएफसी के अधिकारियों के अपने बच्चे हैं या नहीं. आप एक प्रमाणन बोर्ड हैं न कि सेंसर बोर्ड. आप इसका फैसला नहीं कर सकते हैं कि कोई क्या देखेगा और नहीं.’

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने कहा, ‘किसी ने भी आपको (सीबीएफसी) वह बौद्धिक नैतिकता और अधिकार नहीं दिया है कि आप यह निर्णय करें कि वह क्या देखना चाहता है.’

पीठ ने कहा कि दुनिया बदल रही है और इसके साथ कहानी कहने की कला भी बदल रही है.

जस्टिस पटेल ने कहा, ‘ऐसा लगता है कि हमें आपकी (सीबीएफसी) भूमिका को पूरी तरह से फिर से परिभाषित करना पड़ेगा. आप (सीबीएफसी) एक राय बना रहे हैं कि पूरी आबादी बच्चों की है, अबोध है और सभी के लिए निर्णय लेने के लिए बुद्धिमत्ता सिर्फ आपके पास है.’

अदालत ने कहा कि जब बच्चों की कोई फिल्म जातिवाद, भेदभाव, बालश्रम और नशीली दवाओं के इस्तेमाल जैसे मुद्दों के बारे में बताती है, तब बच्चों को इन मुद्दों को समझाने के लिए फिल्मों का उपयोग करना बेहतर होता है.

जस्टिस पटेल ने कहा कि किसी अन्य माध्यम से कोई कैसे इन मुद्दों को एक बच्चे को समझा पाएगा? क्या ऐसी फिल्मों को बच्चे को दिखाना बेहतर नहीं है? और इनके माध्यम से उन्हें यह समझाया जाए कि ऐसा होता है, जो कि गलत है.

मामले की अगली सुनवाई पांच अगस्त को होगी. पीठ ने सीबीएफसी के क्षेत्रीय अधिकारी को बच्चों की फिल्मों को प्रमाणित करते समय बोर्ड की नीतियों की विस्तृत रिपोर्ट एक हलफनामा दायर करने जमा करने का निर्देश दिया है.

इस फिल्म में बिहार के एक लड़के की कहानी है, जो फुटबॉल खेलने का सपना लेकर मुंबई आता है. फिल्म के निर्देशक मनीष बी. तिवारी हैं. मनीष इससे पहले ‘दिल दोस्ती ईटीसी’ और ‘इसक’ जैसी फिल्में बना चुके हैं.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)