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दलबदल कानून संविधान की मूल भावना के विपरीत: संविधानविद सुभाष कश्यप

संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप ने कहा कि कर्नाटक में जो हो रहा है वह भारतीय राजनीति और भारतीय लोकतंत्र का अब तक का सबसे बदनुमा चेहरा है. इसकी जितनी भर्त्सना की जाए वह कम है. इसके लिए सभी दल दोषी हैं.

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(फोटो: द वायर)

नई दिल्ली: राज्यसभा में तेदेपा और इनेलो के सांसदों के हाल ही में भाजपा में शामिल होने और कर्नाटक में कांग्रेस एवं जेडीएस के विधायकों के इस्तीफे के बाद अब गोवा में कांग्रेस विधायकों के भाजपा में शामिल होने के साथ ही 35 साल पुराने दलबदल कानून की उपयोगिता पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं.

देश के शीर्ष संविधानविद सुभाष कश्यप तो इस कानून को संविधान की मूल भावना के विपरीत मानते हुए इसे खत्म करने के पक्षधर हैं. इस मुद्दे पर सुभाष कश्यप से साक्षात्कार.

कर्नाटक और गोवा में कांग्रेस के विधायकों के इस्तीफे के बाद दलबदल कानून के असरकारी होने पर सवाल उठने लगे हैं. क्या दलबदल कानून वास्तव में अपना असर खो रहा है?

दलबदल कानून को संविधान से अलग करके नहीं देखा जा सकता है. इसकी उपयोगिता या इसमें सुधार की आवश्यकता, ऐसे विषय हैं जिस पर राजनीतिक दलों की मौजूदा व्यवस्था और देश की राजनीति के परिप्रेक्ष्य में ही विचार किया जा सकता है.

साथ ही इस सच्चाई को भी स्वीकार करना होगा कि हमारे राजनीतिक दलों की व्यवस्था किसी सिद्धांत, आर्थिक नीति या राजनीतिक कार्यक्रम पर आधारित नहीं है.

जिस देश में व्यक्ति, परिवार या जाति पर केंद्रित 2000 से ज्यादा दल चुनाव प्रक्रिया के हिस्सेदार हों, उस देश में दलीय व्यवस्था की सच्चाई को ध्यान में रखे बगैर, दलबदल कानून पर विचार करना असंगत है.

तकरीबन 35 साल पुराना दलबदल कानून सांसदों और विधायकों की खरीद फरोख्त को रोकने में कितना कामयाब रहा?

दलबदल कानून के असर अथवा खरीद फरोख्त रोकने में कामयाबी को समझने के लिए इस कानून की उपयोगिता को जानना जरूरी है. इस बारे में दो मत हैं. पहला मत कहता है कि संविधान, सदन के सदस्यों को सदन और उसकी समितियों में मतदान एवं अभिव्यक्ति की पूरी स्वतंत्रता की गारंटी देता है.

इस गारंटी में कोई भी बाधा संविधान के विरुद्ध है और संसदीय विशेषाधिकारों का हनन भी है. वहीं, दल के आदेश के विपरीत मतदान करने अथवा पार्टी लाइन से हटकर बोलने से रोकने वाला दलबदल कानून, संविधान की मूल भावना के बिल्कुल विपरीत है.

दूसरा विचार यह है कि 1967 के बाद मंत्री पद या पैसों के लालच में विधायकों के दलबदल के कारण बहुत सी सरकारें गिरीं. एक सदस्य द्वारा महीने भर में पांच दल बदलने तक के उदाहरण जब सामने आए तब सरकारों की स्थिरता की खातिर इस कानून की जरूरत महसूस की गई.

पार्टी लाइन से हटने वाले सदस्य को उक्त सदन की सदस्यता से अयोग्य ठहराने के प्रावधान वाले दलबदल निरोधक कानून के बनने के बाद पिछले 35 साल में दलबदल की घटनाएं तेजी से बढ़ गईं.

इतना ही नहीं इस कानून के तहत सदस्यता बचाने के लिए दल में विभाजन या दो गुटों के विलय के प्रावधान ने व्यक्तिगत दलबदल के बजाय सामूहिक दलबदल का रास्ता प्रशस्त कर दिया. इससे कानून की कामयाबी का अंदाजा स्वत: लग जाता है.

संसद से लेकर विधानसभाओं में एक ही पार्टी के बढ़ते वर्चस्व को देखते हुये दलबदल कानून मौजूदा परिस्थितियों में कितना प्रभावी है?

इसमें पहले यह देखना होगा कि आप सांसद या विधायक को जनता का प्रतिनिधि मानते हैं या राजनीतिक दल का प्रतिनिधि मानते हैं. दूसरी बात यह है कि संसदीय लोकतंत्र की सफलता के लिए एक स्थिर और सशक्त सरकार का होना नितांत आवश्यक है.

लेकिन एक प्रभावी प्रतिपक्ष भी उतना ही आवश्यक है. इसके बिना संसदीय लोकतंत्र सफल नहीं हो सकता है. इसमें विपक्ष का संख्याबल महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि उसका प्रभावी होना जरूरी है.

शुरुआती तीन चार लोकसभाओं में विपक्ष संख्याबल में अधिक नहीं था लेकिन बेहद प्रभावी था. जबकि पिछली तीन चार लोकसभाओं में प्रतिपक्ष ने सदन भले ही चलने न दिया हो लेकिन उसे प्रभावी विपक्ष नहीं कहा जा सकता.

ऐसे में कानून के प्रभाव पर चर्चा करने के बजाय, जरूरी यह है कि महज सत्ता संघर्ष के माध्यम बन कर रह गए सभी राजनीतिक दल अपनी प्रभावी सार्थकता पर विचार करें और सैद्धांतिक प्रतिबद्धता से संचालित हों. कानून की अपनी सीमाएं हैं, कानून किसी को नैतिक रूप से प्रतिबद्ध नहीं बनाता है.

कर्नाटक मामले में क्या विधानसभा अध्यक्ष का रूख कानून सम्मत है?

कर्नाटक में जो हो रहा है वह भारतीय राजनीति और भारतीय लोकतंत्र का अब तक का सबसे बदनुमा चेहरा है. इसकी जितनी भर्त्सना की जाए वह कम है. इसके लिए सभी दल दोषी हैं.

बेशक, विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका सवालों के घेरे में है. दलबदल कानून में विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका अर्द्ध न्यायिक निकाय की तरह है. यह सही है कि कानून में ऐसे किसी मामले के निस्तारण के लिए समयसीमा नियत नहीं है.

इसे कानून की खामी मान सकते हैं लेकिन अध्यक्ष के पद की गरिमा ऐसी है, जिसे कानून में जितना बांधेंगे, पद की गरिमा उतनी ही कम होगी. अध्यक्ष पद पर बैठे व्यक्ति से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती है कि वह अनावश्यक विलंब करेगा.

संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्ति से दलगत हितों से परे हट कर संविधान और कानून के पालन की एकमात्र अपेक्षा की जाती है.

क्या मौजूदा परिस्थितियों के मद्देनजर इस कानून को बदल कर पहले से कठोर प्रावधान करने का समय आ गया है?

मैं समझता हूं कि इस कानून को समाप्त किया जाना चाहिए. हमें राजनीतिक दलों और निर्वाचन व्यवस्था में सुधार लाने के लिए कानून बनाने की बात सोचनी चाहिए. दलबदल कानून व्यवस्थागत सुधार के मंतव्य से बने कानून का एक अंग हो सकता है.