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तीन तलाक़ बीते 1,400 वर्षों से आस्था का मामला है: मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड

पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने बोर्ड का पक्ष रखते हुए तीन तलाक़ को हिंदू धर्म की उस मान्यता के समान बताया जिसमें माना जाता है कि भगवान राम अयोध्या में जन्मे थे.

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(फोटो: रॉयटर्स)

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) ने मंगलवार को उच्चतम न्यायालय से कहा कि तीन तलाक़ आस्था का मामला है जिसका मुस्लिम बीते 1,400 वर्ष से पालन करते आ रहे हैं इसलिए इस मामले में संवैधानिक नैतिकता और समानता का सवाल नहीं उठता है.

मुस्लिम संगठन ने तीन तलाक़ को हिंदू धर्म की उस मान्यता के समान बताया जिसमें माना जाता है कि भगवान राम अयोध्या में जन्मे थे.

एआईएमपीएलबी की ओर से पेश पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा, तीन तलाक सन् 637 से है. इसे ग़ैर-इस्लामी बताने वाले हम कौन होते हैं. मुस्लिम बीते 1,400 वर्षों से इसका पालन करते आ रहे हैं. यह आस्था का मामला है. इसलिए इसमें संवैधानिक नैतिकता और समानता का कोई सवाल नहीं उठता.

उन्होंने एक तथ्य का हवाला देते हुए कहा कि तीन तलाक़ का स्रोत हदीस में पाया जा सकता है और यह पैगम्बर मोहम्मद के समय के बाद अस्तित्व में आया.

मुस्लिम संगठन ने ये दलीलें जिस पीठ के समक्ष दीं उसका हिस्सा न्यायमूर्ति कुरियन जोसफ, न्यायमूर्ति आरएफ नरीमन, न्यायमूर्ति यूयू ललित और न्यायमूर्ति अब्दुल नज़ीर भी हैं.

बीते सोमवार को केंद्र ने शीर्ष अदालत से कहा था कि अगर तीन तलाक़ समेत तलाक़ के सभी रूपों को ख़त्म कर दिया जाता है तो मुस्लिम समुदाय में निकाह और तलाक़ के नियमन के लिए वह नया क़ानून लेकर आएगा.

तीन तलाक़, बहुविवाह और निक़ाह हलाला को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई का मंगलवार को चौथा दिन था. जिस पीठ के समक्ष यह सुनवाई हो रही है उसमें सिख, ईसाई, पारसी, हिंदू और मुस्लिम समेत विभिन्न धार्मिक समुदायों के सदस्य शामिल हैं.