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मणिपुर: ग़ैर-न्यायिक हत्या मामलों की सुनवाई के लिए पीठ के पुनर्गठन पर सहमत सुप्रीम कोर्ट

मणिपुर में 2000 से 2012 के बीच सेना और पुलिस पर 1,528 ग़ैर-न्यायिक हत्याओं के आरोप हैं. सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसकी सीबीआई जांच के आदेश दिए गए हैं.

(फोटो: रॉयटर्स)

(फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सेना, असम राइफल्स और मणिपुर पुलिस द्वारा राज्य में कथित ग़ैर-न्यायिक हत्या मामलों की सुनवाई के लिए पीठ के पुनर्गठन पर गुरुवार को सहमति दी.

प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि पीठ के पुनर्गठन का प्रयास किया जायेगा क्योंकि इस मामले की पहले सुनवाई करने वाली पीठ के सदस्य जस्टिस एमबी. लोकुर पिछले दिसंबर में सेवानिवृत्त हो गए हैं.

कुछ याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कोलिन गोन्जाल्विस ने कहा कि जस्टिस लोकुर की सेवानिवृत्ति के बाद से मामले में सुनवाई नहीं हुई है.

वरिष्ठ अधिवक्ता ने जस्टिस लोकुर के साथ मामले की सुनवाई करने वाले जस्टिस यूयू ललित के समक्ष इसका उल्लेख किया था लेकिन उन्होंने कहा कि इसे मुख्य न्यायाधीश की पीठ के समक्ष उठाएं.

प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, ‘हम पीठ के पुनर्गठन की कोशिश करेंगे.’

सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में मणिपुर में सुरक्षा बलों एवं पुलिस द्वारा 2000 से 2012 के बीच हुई 1,528 कथित ग़ैर-न्यायिक हत्याओं में सीबीआई जांच के आदेश दिए थे.

मणिपुर में वर्ष 2000 से 2012 के बीच सुरक्षा बलों और पुलिस द्वारा कथित रूप से की गई 1528 फ़र्ज़ी मुठभेड़ और गैर-न्यायिक हत्याओं के मामले की जांच और मुआवजा मांगने संबंधी एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने यह निर्देश दिया था.

सुप्रीम कोर्ट ने उससे पहले 2016 में दिए फैसले में फर्जी मुठभेड़ों की जांच के अलावा कहा था कि सेना जरूरत से ज्यादा बल का इस्तेमाल नहीं कर सकती. आत्मरक्षा के लिए न्यूनतम बल का इस्तेमाल होना चाहिए.

इस मसले पर पहले केंद्र ने पुनर्विचार याचिका दायर की थी जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया था. बाद में केंद्र ने क्यूरेटिव याचिका दाखिल की.

सरकार का कहना था कि शीर्ष अदालत के इस आदेश से सेना की आतंकवाद से निपटने की योग्यता प्रभावित होगी. कोर्ट के आदेश का सीधा प्रभाव सेना के उग्रवाद के खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों पर पड़ेगा. इससे सेना का मनोबल गिरेगा.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)