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भारत का संप्रभु बॉन्ड से पैसा जुटाने का फैसला काफी जोख़िम भरा है

अगर केंद्र की मोदी सरकार को विदेशों से डॉलर में क़र्ज़ लेने पर मजबूर होना पड़ रहा है तो इसके पीछे पिछले पांच वर्षों के दौरान पनपने वाले आर्थिक संकट का हाथ है.

(फोटो: पीटीआई)

(फोटो: पीटीआई)

ज्यादातर आर्थिक विशेषज्ञों ने घरेलू कल्याण और विकास कार्यक्रमों के वास्ते पैसा जुटाने के लिए विदेशों से डॉलर में कर्ज लेने के मोदी सरकार के फैसले के विरोध में आवाज उठाई है. यह पहली बार है कि कोई सरकार राजकोषीय घाटे के डॉलरीकरण का काम कर रही है.

इसके पक्ष में दलील यह दी जा रही है कि इससे सरकार के ऋण-आधार का विस्तार होगा और चूंकि सरकार अपने कर्जे का एक अंश विदेशों से प्राप्त करेगी, इसलिए निजी क्षेत्र के लिए घरेलू बाजार से सस्ता कर्ज लेने का रास्ता तैयार होगा.

सरकार- जिसमें केंद्र, राज्य सरकारों के साथ सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां भी शामिल हैं- घरेलू बाजार में सबसे बड़ी उधारकर्ता है और यह तथ्य निजी क्षेत्र के लिए उधार लेने की ज्यादा गुंजाइश नहीं छोड़ता है.

इस बात को अगर आधिकारिक आंकड़े से समझने की कोशिश करें तो कुल घरेलू वित्तीय बचत, जो मुख्य तौर पर बैंक डिपॉजिट्स और विभिन्न प्रकार की तरल बचत योजनाओं से बनती है, जीडीपी के करीब 8 फीसदी के बराबर है और केंद्र, राज्यों और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों द्वारा लिया गया कुल उधार भी जीडीपी के करीब 8 फीसदी के बराबर है.

इस तरह से घरेलू वित्तीय बचत का करीब-करीब सारा हिस्सा सरकार द्वारा अपने हिस्से में झटक लिया गया है.

निश्चित तौर पर घरेलू बचतों का एक हिस्सा और है- जो कि भौतिक परिसंपत्तियों, जैसे रियल एस्टेट, सोना आदि के रूप में है और जो तरल रूप में उपलब्ध नहीं होने के कारण सरकार या निजी क्षेत्र द्वारा उत्पादक निवेश के लिए इस्तेमाल में नहीं लाया जा सकता है.

यह भी जीडीपी के करीब 10 फीसदी के करीब होना चाहिए. इस तरह से कुल घरेलू बचत जीडीपी के 18 फीसदी के बराबर है.

अगर सरकार को विदेशों से डॉलर में कर्ज लेने पर मजबूर होना पड़ रहा है तो इसके पीछे पिछले पांच वर्षों के दौरान पनपने वाले आर्थिक संकट का हाथ है.

असली संकट यह है कि भारत की घरेलू बचत दर जीडीपी के करीब चार प्रतिशत अंकों तक गिर गई है और इसमें लगभग पूरी तरह से घरेलू बचतों का योगदान है जो कि सरकार और कॉरपोरेट जगत के लिए लगातार लिए जाने वाले उधारों का मुख्य स्रोत है.

वार्षिक बचत में जीडीपी के 4 प्रतिशत अंक की कमी का मोटे तौर पर अर्थ सालाना निवेश के लिए 7 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की कमी के तौर पर निकलता है. यह कमी घरेलू बचत में होने वाली कमी है.

इसलिए सरकार संप्रभु बॉन्ड बाजार (सोवेरीन बॉन्ड मार्केट) से घरेलू बचतों में आई इस तेज गिरावट की भरपाई करना चाहती है. बड़ी चिंता की बात यह है कि भारत की बचत दर में प्रणालीगत कमी आई है और बजट में इस समस्या पर कोई कदम नहीं उठाया गया है.

इसकी जगह सरकार डॉलर में लिए जाने वाले कर्ज के आलसी और काफी खतरनाक हल पर भरोसा कर रही है.

राजनीतिक अर्थव्यवस्था के लिहाज से देखें तो यह एक तरह से मोदी सरकार द्वारा इस बात की परोक्ष स्वीकृति है कि यह नोटबंदी के अपने सबसे बड़े आर्थिक फैसले के सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य को हासिल करने में पूरी तरह से नाकाम रही है.

याद करिए कि प्रधानमंत्री ने यह बार-बार दावा किया था कि नोटबंदी ने अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा में बहुत सारा पैसा लाने में मदद की है, जिससे सरकार को बड़ी विकास योजनाओं को लागू करने में मदद मिलेगी. अगर ऐसा सचमुच था, तो यह सवाल बनता है कि आखिर क्या वजह है कि नोटबंदी के तीन वर्षों के बाद भी घरेलू बचत दर स्थिर बनी हुई है.

हमें कहा गया था कि नोटबंदी के बाद बैंकों में 15 लाख करोड़ रुपये का नकद जमा हुआ और इसका एक हिस्सा आखिरकार म्यूचुअल फंड्स में भी निवेश किया गया.

आखिरी जानकारी के मुताबिक, नोटबंदी के समय बैंकों में जमा किए गए कम से 3.5 लाख करोड़ के नकद की जांच अतीत में कर चोरी के मामलों में की जा रही थी. फिर भी घरेलू वित्तीय बचत में सुधार क्यों नहीं हुआ है? यह अपने आप में किसी पहेली के समान है.

साथ ही यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि उस समय कई अर्थशास्त्रियों ने कहा था कि कुल काला धन में नकद का हिस्सा दो फीसदी से भी कम है, इसका कहीं ज्यादा बड़ा भाग रियल एस्टेट और सोने के रूप में है.

सरकार का दावा है कि वह नए बनाए गए बेनामी कानून के सहारे रियल एस्टेट पर चोट कर रही है, लेकिन यहां भी नतीजा अब तक सिफर रहा है.

इसके साथ ही सरकार ने भारतीय घरों और निजी ट्रस्टों में मौजूद बड़े स्वर्ण भंडार का इस्तेमाल करके घरेलू बचतों और निवेश को बढ़ाने के रास्ते को भी शायद ही आजमाया है.

एस. गुरुमूर्ति जैसे संघ के विचारक, जो कि अब रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के बोर्ड में हैं, अक्सर यह कहा करते थे कि लोगों के पास मौजूद सोना भारत की निवेश जरूरतों को पूरा करने के लिए काफी है.

अगर ऐसा है, तो सरकार अपने राजकोषीय घाटे के डॉलरीकरण के काफी खतरनाक रास्ते पर क्यों आगे बढ़ना चाहती है?

कुछ महीने पहले वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, भारतीय घरों और मंदिर ट्रस्टों के पास जमा सोना हमारी जीडीपी के करीब 40 प्रतिशत के बराबर है, जो 1,250 अरब अमेरिकी डॉलर के बराबर ठहरता है.

इसमें से करीब 15 प्रतिशत- 185 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य का सोना तो सिर्फ मंदिर ट्रस्टों के पास है. ये सारा सोना निष्क्रिय और अनुत्पादक रूप से पड़ा हुआ है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मामूली ब्याज दर वाले गोल्ड सर्टिफिकेट्स के जरिये उत्पादक चक्र में लाने पर विचार भी किया था. मुझे किसी ने बताया कि यह विचार इस आधार पर खारिज हो गया कि इससे ‘हिंदू भावनाओं को चोट पहुंचेगी’.

सरकार को अपनी अभूतपूर्व राजनीतिक पूंजी का इस्तेमाल ऐसी भावुक दलीलों को ठुकराने में करना चाहिए और निष्क्रिय पड़े सोने को उत्पादक चक्र में शामिल करने का प्रस्ताव रखना चाहिए.

मंदिरों के ट्रस्टों के 10 से 15 प्रतिशत सोने से भी 25 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य का फंड तैयार होगा. यह संप्रभु उधारों से जमा किए जा सकने वाले कुल पैसे से कहीं ज्यादा है.

जैसा कि रघुराम राजन ने भी ध्यान दिलाया है, संप्रभु उधार काफी जोखिम भरे और विनिमय दरों की अस्थिरता और वैश्विक रेटिंग एजेंसियों की मनमर्जी से प्रभावित होने वाले होते हैं.

अभी भी घरेलू बचतों/निवेश को पर्याप्त तरीके से ऊपर उठाने के और भी कई उपाय मौजूद हैं और हमें संप्रभु उधारों के फेर में फंसने की जल्दबाजी दिखाने से पहले उन्हें आजमाना चाहिए.

बाकी चीजों के अलावा यह डॉलर में कर्ज लेने के लिए बिल्कुल भी मुफीद समय नहीं है, क्योंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध के रूप में एक अतिसाधारण तूफान का सामना कर रही है, जिससे कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के धराशायी हो जाने का खतरा पैदा हो गया है.

वैश्विक अर्थव्यवस्था की रफ्तार बहुत तेजी से धीमी पड़ रही है और भारत भी तमाम क्षेत्रों में उपभोग में अभूतपूर्व गिरावट का सामना कर रहा है.

हाल के महीनों में निर्यात ने थोड़ी बढ़त दिखाई थी, लेकिन जून में यह एक बार फिर 10 प्रतिशत गिर गई. भारत का निर्यात पिछले सालों में संरचनात्मक स्तर पर स्थिर हो गया है. अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध से स्थितियां और भी बदतर ही होंगीं. पिछले सप्ताह चीन ने 27 साल में सबसे कम जीडीपी वृद्धि- 6.2 प्रतिशत दर्ज की.

इसके अलावा अर्थशास्त्रियों को इस बात का डर सता रहा है कि अमेरिका में 10 वर्षीय अमेरिकी ट्रेज़री दर का तिमाही ट्रेजरी की दर से नीचे आ जाना मंदी की तरफ इशारा कर रहा है.

यह तर्क दिया जा रहा है कि ऐतिहासिक तौर पर अमेरिका में 10 वर्षीय ट्रेजरी दर का अल्पकालिक दर से नीचे चले जाने के बाद बिना अपवाद के मंदी का दौर आता है.

सामान्य तौर पर एक काफी तरल वित्तीय बाजार में अर्थव्यवस्था की सेहत इस बात से पता चलती है कि दीर्घकालीन प्राप्ति, अल्पकालिक प्राप्ति से ऊपर रहे. इस स्थिति में कोई असंतुलन मंदी की भविष्यवाणी के लिए काफी है.

ऐसे अनिश्चित आर्थिक माहौल में भारत का संप्रभु बॉन्ड के साथ वैश्विक वित्तीय बाजार के तूफानी समंदर में दाखिल होने का फैसला सही नहीं कहा जा सकता है.

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