दुनिया

कुलभूषण जाधव पर आईसीजे के फ़ैसले के मायने

आईसीजे और अंतरराष्ट्रीय क़ानून से फिलहाल बस थोड़ा-सा समय मिला है, जिसका उपयोग भारत और पाकिस्तान दोनों के ही राजनीतिक नेतृत्व को उस संकट से बाहर निकलने में करना चाहिए, जहां एक इंसान की ज़िंदगी पर तलवार न लटक रही हो.

A view of the full bench of the International Court of Justice as the verdict is delivered in the Kulbhushan Jadhav case at The Hague on Wednesday, July 17. Photo: ICJ

17 जुलाई को हेग में कुलभूषण जाधव मामले में फैसला देने के दौरान मौजूद अदालत की फुल बेंच (फोटो साभार: आईसीजे)

जीत के जयकारे या हार के विलापों के परे अंतरराष्ट्रीय न्याय अदालत (आईसीजे) द्वारा पाकिस्तान से कुलभूषण जाधव को भारतीय राजनयिक पहुंच प्रदान कराने के लिए कहना, दरअसल अंतरराष्ट्रीय कानून के विचार की जीत है.

आलोचकों का चाहे जो भी कहना हो, पिछले सौ सालों में दुनिया के देशों ने काफी जतनपूर्वक जिन संधियों और कानूनों को मूर्त रूप दिया है, वे कभी-कभी देशों के बीच आपसी आचरण में बदलाव लाने का और आखिरकार किसी व्यक्ति की किस्मत को बदलने का काम करते हैं.

दांव पर जाधव की जिंदगी है- जाधव जिन्हें पाकिस्तान की सैनिक अदालत ने जासूसी का अपराधी करार दिया है और मौत की सजा सुनाई है, लेकिन जिनके बारे में भारत का कहना है कि नौ-सैनिक अधिकारी के तौर पर अवकाश प्राप्त करने के बाद वे एक कारोबारी के तौर पर काम कर रहे थे.

17 जुलाई को हेग में आए फैसले के बाद जाधव के फांसी के आदेश (डेथ वारंट) पर रोक लग गई और पाकिस्तान से उनकी दोषसिद्धि और सजा पर पुनर्विचार करने के लिए कहा गया है. यह एक बहुत बड़ी खबर है, लेकिन यही अंतरराष्ट्रीय कानून की हद भी है.

यह रोक कितने समय तक के लिए रहेगी और पुनर्विचार की प्रक्रिया का क्या नतीजा निकलेगा, इसका निर्धारण पाकिस्तान के अंदर और भारत के साथ द्विपक्षीय स्तर पर भी संभवतः राजनीतिक नफा-नुकसान के हिसाब के आधार पर होगा.

पाकिस्तान ने 29 मार्च, 2016 को जाधव की गिरफ्तारी की घोषणा की थी और उसी दिन उनके तथाकथित इकबालिया बयान का वीडियो प्रसारित किया गया था, जिसमें उन्हें यह कहते सुना जा सकता था कि वे एक भारतीय जासूस हैं और उन्होंने पाकिस्तानी जमीन पर आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम दिया था.

अपने विश्लेषण में उसी दिन मैंने उनकी गिरफ्तारी और इकबालिया बयान को लेकर दस सवाल पूछे थे. इसकी शुरुआत मैंने 1963 के वियना कंवेंशन ऑन कॉन्सुलर रिलेशंस (वीसीसीआर) के अनुच्छेद 36 के तहत राजनयिक पहुंच के जाधव के अधिकार के मसले से की थी.

एक साल बाद जब पाकिस्तान ने जाधव को सजा-ए-मौत सुनाई, मुख्य तौर पर वीसीसीआर के तहत पाकिस्तान के दायित्व के सवाल को आधार बनाकर ही भारत ने आईसीजे का दरवाजा खटखटाया था. दोनों ही देशों ने पूरी ताकत से यह मुकदमा लड़ा, लेकिन आखिरकार आईसीजे को भारत के मुख्य दावे में दम नजर आया.

इसने पाकिस्तान की इस दलील को ठुकरा दिया कि वीसीसीआर का अनुच्छेद 36 जासूसी के आरोपी व्यक्ति पर लागू नहीं होता है. इसने इस दलील को भी खारिज कर दिया कि 2008 का राजनयिक पहुंच पर भारत-पाकिस्तान द्विपक्षीय समझौता उसे ‘सुरक्षा’ आधार पर राजनयिक पहुंच न देने की इजाजत देता है.

इसकी जगह कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि पाकिस्तान ने भारत को जाधव से बातचीत और उन तक पहुंच कायम न करने देकर और भारत को कैद में उनसे मिलने और जासूसी और आतंकवाद के अपराध के लिए पाकिस्तानी सैन्य अदालत द्वारा उन पर मुकदमा चलाने से पहले उनकी तरफ से कानूनी पैरवी का इंतजाम करने की इजाज़त न देकर वास्तव में अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन किया है.

अपने फैसले के ऑपरेटिव हिस्से में, जिसमें सभी पंद्रह स्थायी जजों ने सहमति जताई (एकमात्र विरोध पाकिस्तान के एडहॉक जज द्वारा दर्ज कराया गया), आईसीजे ने कहा कि पाकिस्तान वीसीसीआर के उल्लंघन को दुरुस्त करने के लिए बाध्य है. इसके बाद पाकिस्तान को ये कदम उठाने के निर्देश दिये गए.

1. जाधव को तत्काल उनके अधिकारों से अवगत कराया जाए और भारतीय दूतावास के अधिकारियों को वीसीसीआर के अनुच्छेद 36 के तहत उनसे मिलने दिया जाए.

2. जाधव की दोषसिद्धि और उसे दी गई सजा की प्रभावशाली समीक्षा की जाए और इस पर पुनर्विचार किया जाए.

हालांकि, आईसीजे ने ‘समीक्षा के तरीके को तय करने’ का काम पाकिस्तान पर छोड़ दिया है, लेकिन इसमें यह स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि ऐसी किसी भी समीक्षा के दौरान यह याद रखा जाए कि पाकिस्तान ने जाधव को राजनयिक पहुंच से महरूम रख कर अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन किया है.

इसका अर्थ यह निकलता है कि जाधव के तथाकथित इकबालिया बयान- जिसे पाकिस्तान ने उने दोषसिद्ध करार देने के आधार के तौर पर इस्तेमाल किया और जिसे भारत ने जोर-जबरदस्ती से दबाव में दिलाया गया बयान बताया- जिसका सबूत यह तथ्य है कि जाधव को अपनी ही सरकार से राजनयिक और कानूनी मदद के अधिकार से वंचित रखा गया- को गलत तरीके से जुटाए गए सबूत के तौर पर देखा जाए और उसे प्रामाणिक न माना जाए.

इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं कि आईसीजे ने जाधव को आजाद करने की भारत की दरख्वास्त को स्वीकार नहीं किया. उसे रिहा करने का आदेश देने इनकार करते हुए आईसीजे ने अवेना मामले में दिए अपने फैसले को दोहराया, जिसमें अमेरिका द्वारा मौत की सजा पाए मेक्सिन नागरिकों को कॉन्सुलर पहुंच देने से इनकार किए जाने पर मेक्सिको अमेरिका को विश्व अदालत में लेकर गया था:

‘कोर्ट यह फिर से कहता है कि श्री जाधव की दोषसिद्धि और उन्हें सुनाई गई सजा को वियना समझौते के अनुच्छेद 36 का उल्लंघन नहीं माना जाएगा. कोर्ट [अवेना से] इस नजीर को भी याद करता है कि वियना समझौते के अनुच्छेद 36 के उल्लंघन के मामलों में ‘दोषसिद्धि या सजा को आंशिक रूप से पूरी तरह से खत्म करना ही अनिवार्य या एकमात्र उपाय नहीं है.’

इन आधारों पर कोर्ट ने जाधव को रिहा करने और उनकी सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करने की भारत की मांग को मानने से इनकार कर दिया. लेकिन उनके इकबालिया बयान को अमान्य करार देने- अगर पाकिस्तान को आखिरकार यह करने पर मजबूर होना पड़ा- का प्रभावी रूप से यही अर्थ निकलेगा. लेकिन इसके लिए जरूरी है कि पाकिस्तान समीक्षा का काम ईमानदारी और न्यायपूर्ण तरीके से अंजाम दे.

Judge Abdulqawi Ahmed Yusuf, president of the International Court of Justice, reads out the court’s verdict in the Kulbhushan Jadhav case at The Hague on Wednesday 17 July 2019. Photo: ICJ

जाधव मामले में फैसला पढ़ते आईसीजे के अध्यक्ष जज अब्दुलकावी अहमद युसूफ (फोटो साभार: आईसीजे)

चूंकि आईसीजे ने समीक्षा की प्रक्रिया तय करने का काम पाकिस्तान के जिम्मे छोड़ दिया है, ऐसे में पाकिस्तान अब भी इस प्रक्रिया को अपनी सैन्य अदालतों में सीमित रख सकता है. लेकिन अगर देश की नागरिक अदालतें सक्रियता और आजादख्याली दिखाती हैं, तो समीक्षा प्रक्रिया के सार्थक होने और इससे राहत मिलने की उम्मीद की जा सकती है.

सवाल है कि यहां से आगे का रास्ता कहां को जाता है? पाकिस्तान फिलहाल आईसीजे के फैसले के निहितार्थ को समझने में दिमाग खपा रहा है और यह स्पष्ट नहीं है कि वह आगे आधिकारिक तौर पर कौन-सा रास्ता अख्तियार करेगा. लेकिन आईसीजे के फैसले के बाद आठ बिंदु स्वतः स्पष्ट हैं-

एक, हालांकि आईसीजे ने भारत की मांग के अनुसार उन्हें दी गई सजा को रद्द नहीं किया है, न ही उन्हें रिहा करने का आदेश दिया है, लेकिन जाधव के मृत्युदंड पर लगी रोक जारी रहेगी.

दो, पाकिस्तान को अब इस्लामाबाद में भारतीय राजनयिकों को जाधव से मिलने देने की इजाजत देनी ही होगी. अगर वह ऐसा करने से इनकार करता है तो भारत तुरंत आईसीजे में वापस जा सकता है.

तीन, राजनयिक पहुंच का मतलब है कि भारत अब अकेले में जाधव से बात कर सकता है और खुद उनसे उनकी गिरफ्तारी की परिस्थितियों, कारावास में उनके साथ किए गए सुलूक और उनके इकबालिया बयान वाले वीडियो की कहानी के बारे में जानकारी हासिल कर सकता है.

अगर उनकी गिरफ्तारी और उनके साथ किए गए सुलूक का ब्यौरा सामने आता है, तो यह पाकिस्तान के लिए शर्मिंदगी का सबब साबित हो सकता है. शायद यही कारण है कि पाकिस्तान भारत को जाधव तक राजनयिक पहुंच नहीं देना चाहता था.

चार, अब भारत जाधव को समुचित कानूनी मदद मुहैया करा सकता है. इससे न सिर्फ ‘समीक्षा’ के नतीजों पर असर पड़ सकता है, बल्कि इससे भारत को उस प्रक्रिया को नजदीक से देखने का मौका भी मिलेगा, जिसे पाकिस्तान अन्यथा कैमरे के भीतर पूरा करना चाहेगा.

पांच, पाकिस्तान जाधव की दोषसिद्धि और उन्हें दी गई सजा की समीक्षा और पुनर्विचार करने के लिए बाध्य है और उसे जाधव को राजनयिक पहुंच से वंचित रखने से उन पर पड़े नकारात्मक प्रभावों को भी अपने दिमाग में रखना होगा. यह उस इकबालिया बयान की स्वीकार्यता पर भी सवालिया निशान खड़े करेगा, जो जाधव के खिलाफ पाकिस्तान के आरोपों की बुनियाद में था.

छह, समीक्षा और पुनर्विचार के तरीके को तय करना पूरी तरह से पाकिस्तान के ऊपर छोड़ दिया गया है. मिसाल के लिए, इसके पास यह कहने की आजादी है कि इसके सैन्य पैनलों ने इस मामले की समीक्षा की है और उनका फैसला है कि दोषसिद्धि और सजा के फैसले को बदला नहीं जाएगा. या यह एक बार फिर जाधव पर किसी सैन्य कोर्ट में मुकदमा चला सकता है और जाधव को एक बार फिर दोषी ठहरा सकता है.

सात, जाधव को मिली राहत अस्थायी है और अगर पाकिस्तानी सेना मनमाने तरीके से काम करने का फैसला करती है और अपने पक्ष पर डटी रहती है, तो भारत के पास ज्यादा विकल्प नहीं होंगे. ऐसे में भारत के पास आईसीजे के पास फिर से वापस जाने और पाकिस्तान द्वारा इसके फैसले को ईमानदारी से लागू न करने की शिकायत करने का विकल्प हो सकता है, लेकिन अगर पाकिस्तानी सेना असहयोग करने पर उतारू हो जाएगी, तो किसी व्यक्ति, संस्थान यहां तक कि विश्व कोर्ट के पास भी ज्यादा विकल्प नहीं रह जाएंगे.

आठ, अब जबकि कानून ने अपना काम कर लिया है, यह कूटनीतिक विकल्पों को आजमाने का समय है. जब सब कुछ हो चुका है, तो हकीकत यह है कि जाधव का मामला भारत-पाकिस्तान संबंधों में राज्य प्रायोजित आतंकवाद और अलगाववाद के आरोपों का उत्पाद है.

इस्लामाबाद के खिलाफ नई दिल्ली के मामले को भले ही विश्वभर में मजबूत समर्थन हासिल हो, लेकिन पाकिस्तानी सेना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह वह जाधव और खासकर उसके ‘इकबालिया बयान’ को इस बात का सबूत मानता है कि वह भी सीमापार आतंकवाद का शिकार है.

लेकिन इस तरह से ‘बराबरी’ का दावा करने के बाद पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व भारत को लेकर भविष्य में कौन-सी चाल चलने की योजना बना रहा है? जाधव के मृत्युदंड को बरकरार रखकर इस पर अमल करने का मतलब होगा है कि भारत और पाकिस्तान आनेवाले दशक या उससे भी ज्यादा समय तक एक दूसरे से रंजिश पाले रखेंगे.

दूसरी तरफ उन्हें जाने देने का मतलब पाकिस्तान की ‘सुरक्षा’ के स्वयंभू रखवाले के तौर सेना की पकड़ कमजोर पड़ने के तौर पर निकलेगा. इसलिए आईसीजे और अंतरराष्ट्रीय कानून से हमें फिलहाल बस थोड़ा-सा समय मिला है, जिसका उपयोग भारत और पाकिस्तान, दोनों के ही राजनीतिक नेतृत्व को इस भूल-भुलैया से बाहर निकलने में करना चाहिए, जहां एक इंसान की जिंदगी की कीमत पर तलवार न लटकी हो.

अगर मोदी सरकार संबंधों को आगे बढ़ाने का रास्ता खोज पाती है, तो जाधव के मामले का एक सौहार्दपूर्ण समाधान भी निकाला जा सकता है.

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