समाज

एनजीओ के एफसीआरए लाइसेंस रद्द होने से रुके शिक्षा और मानवाधिकार के काम

विदेशी मुद्रा नियमन अधिनियम (एफसीआरए) के तहत एनजीओ को मिलने वाले विदेशी चंदे पर रोक लगने के बाद सामाजिक मुद्दों और मानवाधिकार से जुड़े काम प्रभावित हुए हैं.

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एनजीओ को मिलने वाले फंड पर रोक के बाद गांवों में चल रहे शिक्षा से जुड़े काम प्रभावित हुए हैं. फोटो: रॉयटर्स

एनजीओ को मिलने वाली विदेशी फंडिंग पर लगी इस रोक के बाद महिला सशक्तिकरण, मानवाधिकार, शिक्षा और समाज सुधार संबंधी काम कर रहे एनजीओ बुरी तरह प्रभावित हुए हैं.

गृह मंत्रालय द्वारा लागू किए गए इस फैसले के तकरीबन चार महीने बाद हाल ये रहा कि ऐसी कई गैर सरकारी संस्थाएं जैसे-तैसे अपने कार्यक्रमों की संख्या घटाकर फंड की कमी से निपट तो रही हैं पर असली समस्या उन दूरदराज के गांवों के सामने आई है जहां इसी विदेशी फंड के सहारे कई जरूरी कार्यक्रम चल रहे थे, जरूरी सुविधाएं दी जा रही थीं.

पीपुल्स वॉच एक ऐसी ही संस्था है जो मानवाधिकार के क्षेत्र में काम कर रही है. पीपुल्स वॉच के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर हेनरी टिफेन ने ‘द वायर’ से बात करते हुए बताया, ‘29 अक्टूबर 2016 यानी जब से सरकार द्वारा विदेशी फंडिंग पर रोक लगाई गई है, देश के 10 राज्यों के लगभग 5,000 स्कूलों के तकरीबन 3.5 लाख बच्चों को मानवाधिकार शिक्षा देने का हमारा कार्यक्रम ठंडे बस्ते में चला गया है. हम स्टाफ को तनख्वाह नहीं दे पा रहे हैं. हमारे पास किसी कार्यक्रम के लिए धन नहीं है. फिर भी हमारी कोशिश यही है कि ये स्कूल चलते रहें. पर हां, ये तो सच है कि इस अधिनियम के बाद से हमारे तमाम कार्यक्रमों पर असर पड़ा है.

हेनरी को जनवरी 2015 में एमनेस्टी इंटरनेशनल, जर्मनी ने ‘मानवाधिकार के लिए किए गए उनके सतत और साहसी प्रयासों’ और भारत में होने वाले भेदभाव और अत्याचार के खिलाफ खड़े होने के लिए आठवें मानवाधिकार अवॉर्ड से सम्मानित किया था. हेनरी के अनुसार, इस अधिनियम से कई ऐसी संस्थाओं के काम पर भी असर पड़ा है, जो कई राज्यों के मानवाधिकार आयोगों के साथ मिलकर काम कर रही थीं.

उन्होंने बताया, ‘हम इनके साथ मिलकर इनकी क्षमता बढ़ाने का काम कर रहे थे क्योंकि अक्सर इन पर भी ध्यान नहीं दिया जाता पर अब फंड्स की कमी के चलते ये काम भी बंद पड़ा है.’ हेनरी की संस्था सरकार के इस फैसले के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का दरवाजा खटखटा चुकी है. वे बताते हैं, ‘हमारे सभी बैंक खाते बंद कर दिए गए हैं, जिससे हमारे स्टाफ के करीब 60 लोग बेरोजगार हो गए.’

स्कूलों में मानवाधिकार जागरूकता के अलावा हेनरी की संस्था मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के हक के लिए भी आवाज उठाती रही है. हेनरी बताते हैं, ‘हमने छत्तीसगढ़ में समाजसेवी बेला भाटिया के साथ हुई बदसुलूकी के मामले पर आवाज उठाई थी, इसके अलावा जगदलपुर में कार्यकर्ताओं के ऊपर हुए हमले के खिलाफ भी खड़े हुए थे. यह भी हमारे काम का हिस्सा है पर अब वो भी रुका हुआ है.’

पीपुल्स वॉच अब अपने संभावित दानकर्ताओं से चंदे के इंतजाम के बारे में बात करने में लगी है जिससे कि आने वाले समय में उनके स्कूलों के संचालन में कोई मुश्किल न आए.

हेनरी ने बताया, ‘हमारी कोशिशें लगातार जारी हैं पर अब तक हमें कोई फण्ड नहीं मिला है. हम भी हर किसी के पास जाने से बचते हैं, कॉर्पोरेट की मदद भी नहीं लेना चाहते, हम कुछ चुनिन्दा लोगों की ही मदद चाहते हैं जो वाकई में हमारे उद्देश्य और मानवाधिकारों के प्रति सजग हों न कि किसी स्वार्थ के चलते हमारी मदद करें. हम अब तक एक करोड़ रुपये सालाना तक फंड्स जुटा लेते थे, जिससे हमारे सभी कार्यक्रमों को मदद मिल जाती थी.’ हेनरी को उम्मीद है कि उन्हें जल्द ही आर्थिक मदद मिलेगी.

किसी तरह चल ही रहा है काम

इस अधिनियम से प्रभावित होने वाली एक संस्था नवसृजन ट्रस्ट है. गुजरात के इस एनजीओ ने खुद को इस परिस्थिति के लिए तैयार कर लिया था और अब ये गांवों और शहरों में लोगों को इनके प्रमुख कार्यक्रमों को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है. इसके संस्थापक मार्टिन मैक्वान, जो गुजरात में दलित अधिकारों के लिए लड़ते आए हैं, बताते हैं, ‘हमारे जितने भी कार्यक्रम चल रहे थे उनकी जिम्मेदारी अब आम लोग उठा रहे हैं, इससे हमारा काम किसी तरह चल ही रहा है. लोग लगातार हमें कह रहे हैं कि हम बिना रुके अपना काम जारी रखें. जब तक देश में जातिगत भेदभाव होता रहेगा, नवसृजन काम करता रहेगा.’

वे इस बात से इनकार नहीं करते कि विदेशी फंडिंग बंद होने से उनके काम पर असर तो पड़ा है. वे बताते हैं, ‘जितनी विदेशी फंडिंग हमें मिला करती थी, अब उसका बहुत छोटा हिस्सा ही हमें स्थानीय लोगों से मिल पा रहा है. किसी ने 25 हजार रुपये दिए, किसी ने 30 हजार. अहमदाबाद से किसी ने पांच लाख रुपये का चेक भेजा था. तो धीरे-धीरे ही सही, लोग हमारी मदद के लिए आगे तो आ रहे हैं. अब काम करने का तरीका भी बदल गया है. कई जगह कार्यक्रमों में अब भुगतान हमें नहीं करना पड़ता, लोग आगे आते हैं और इसकी जिम्मेदारी ले लेते हैं. 25 जनवरी को आयोजित किये गए विरोध प्रदर्शन में ऐसा ही हुआ था. हमारी संस्था की तरफ से एक पैसा भी इसमें खर्च नहीं किया गया था. लोगों ने खुद आगे आकर, कई जगह से चंदा जुटाकर इसे आयोजित किया था.’

नहीं शुरू हो पाएंगे महिला सशक्तिकरण के काम

ऐसी ही एक संस्था ‘एक्ट नाऊ फॉर हारमनी एंड डेमोक्रेसी’ (अनहद) भी है. इसके संस्थापक भी ऐसी किसी स्थिति के लिए पहले से ही तैयार थे. इसकी संस्थापक शबनम हाशमी बताती हैं, ‘हमारे मामले में तो फंडिंग तभी से रुक गई थी जबसे नरेंद्र मोदी सत्ता में आए थे. एफसीआरए से हमें उतना फर्क नहीं पड़ा. हमें जो संस्थाएं चंदा दिया करती थीं, उन्होंने मई, 2014 के बाद से ही मदद देना बंद कर दिया था, वे जानते थे कि अनहद से जुड़े रहने के नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं. हमने मार्च 2016 के बाद से विदेशी फंड लेना बंद कर दिया था. हालांकि तब नियम नहीं था पर हमें इसका कोई फायदा भी नहीं मिला.

शबनम ने बताया कि अनहद का एफसीआरए लाइसेंस 15 दिसंबर को कैंसल कर दिया गया था पर उसके बाद से संस्था ने कभी फंड के लिए अपील भी नहीं की. वे कहती हैं, ‘अनहद में कभी बहुत ज्यादा स्टाफ नहीं रहा. हमारे दफ्तर में ज्यादा से ज्यादा दो लोग होते हैं, और सबकी तनख्वाह 15 से 20 हजार के बीच ही है, जिससे सिर्फ आने-जाने का ही खर्च निकल पाता है.’

वे यह भी साफ करती हैं कि अनहद में लोगों को बनाए रखना कभी उनके लिए मुश्किल नहीं रहा. अनहद से लोग काम करने के लिए जुड़ते थे न कि पैसे कमाने के लिए. वे बताती हैं, ‘जो लोग अनहद छोड़कर गए, वे आज काफी अच्छी तनख्वाह पर काम कर रहे हैं, पर वे अनहद में काम करने आए, मोदी सरकार के आने के बाद हमने खुद उन्हें कहा कि वे नई नौकरी तलाश लें.’

हाशमी को जिस बात का सबसे ज्यादा दुख है वो ये है कि बिहार के 10, दक्षिणी हरियाणा के मेवात इलाके के 10 और जम्मू कश्मीर के लगभग 35 गांवों में वे लोग महिला सशक्तिकरण के मसले पर कई कार्यक्रम शुरू करने वाले थे जो दुर्भाग्य से अब नहीं हो पाएंगे. वे कहती भी हैं कि ज्यादा गरीबी की वजह से इससे कोई आय तो नहीं होती पर स्थानीय स्तर पर इन सामाजिक कामों के लिए थोड़ी-बहुत सहायता मिल जाती है.

कॉरपोरेट संस्थाओं की मदद सिर्फ ‘भ्रम’

हाशमी ने ये भी आरोप लगाया कि कॉरपोरेट की ओर से संस्थाओं की मदद से सामाजिक जिम्मेदारी निभाने को लेकर की जाने वाली बातें और वादे सिर्फ ‘भ्रम’ हैं और कुछ नहीं. वे कहती हैं, ‘बड़े कॉरपोरेट बस शौचालय बना रहे हैं, प्रधानमंत्री रिलीफ फंड में दान कर रहे हैं या उन्होंने अपना एनजीओ शुरू कर दिया है. वे अनहद की मदद नहीं करना चाहते क्योंकि उन्हें ये लगता है कि हम मोदी के खिलाफ हैं.’

वे बताती हैं कि बदले हुए इसी नजरिये की वजह से अब अनहद ने बड़े कार्यक्रम प्रोग्राम आयोजित करने की बजाय छोटे कार्यक्रम और चर्चाएं आयोजित कर रहा है. उन्होंने बताया, ‘पहले हम महीने में एक बार कोई एक बड़ा कार्यक्रम किया करते थे पर अब हम महीने में छोटी-छोटी आठ चर्चाएं आयोजित करते हैं. हमारा काम तो बदला ही है, पर हमारे जो काम हाशिये पर पड़े समुदायों के लिए हो रहे थे, वे पूरी तरह से बंद हो चुके हैं.’ इन सब के बावजूद भी वे कहती हैं कि अनहद कमजोरों के हक और धर्मनिरपेक्षता के लिए खड़ा होता रहेगा, इस उद्देश्य को कोई नहीं बदल सकता.

इसके इतर सरकार के इस कदम के बाद कई एनजीओ सोशल मीडिया पर सामने आए और इस कदम को ‘प्रतिशोधात्मक’ और तर्कहीन ठहराया. उनका ये भी आरोप था कि केंद्र एफसीआरए का इस्तेमाल एनजीओ को नियंत्रण में लेने के हथियार के रूप में प्रयोग कर रहा है. कई आरटीआई कार्यकर्ताओं ने भी दलील दी कि इसके पीछे उन लोगों को नियंत्रित करने की मंशा है जो सरकार के विकास के आदर्श पर सवाल उठाते हैं.