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विधायिका में मुसलमानों की घटती नुमाइंदगी लोकतंत्र के लिए बेहतर संकेत नहीं है

आंकड़े बताते हैं कि देश में मुसलमानों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व बहुत तेज़ी से गिरता जा रहा है. पहले ही आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े मुसलमानों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व घटने का मतलब होगा कि वह पूरी तरह से हाशिये पर चले जाएंगे.

Muslim India Reuters

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

तीन साल पहले लोकसभा चुनाव के दौरान जो रुझान दिखाई दिया था वही हाल के पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी रहा है. रुझान यह है कि मुसलमानों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में तेज़ी से गिरावट हो रही है. देश की संसद और राज्यों की विधानसभाओं में उनकी नुमाइंदगी सिमटती जा रही है.

लोकसभा चुनाव से लेकर हाल ही में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणामों पर नजर डालें तो यह बात बिल्कुल साफ हो जाती है.

आबादी के लिहाज़ से देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश से केवल 23 मुस्लिम विधायक चुने गए हैं. यहां सरकार बनाने वाली भाजपा से एक भी मुस्लिम विधायक नहीं है. जबकि इसके पहले 2012 के विधानसभा चुनाव में 64 मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव में जीत दर्ज करने में सफल रहे थे.

राज्य की जनसंख्या में मुस्लिमों की हिस्सेदारी करीब 19 फीसदी है. अब विधानसभा में मुस्लिम प्रतिनिधित्व गिरकर 5.9 प्रतिशत रह गया है. साल 2012 में मुस्लिम प्रतिनिधित्व 17.1 प्रतिशत थी.

अगर हम राज्यवार चर्चा करें तो मध्‍य प्रदेश, गुजरात, छत्‍तीसगढ़, हरियाणा, महाराष्‍ट्र, उत्‍तर प्रदेश, उत्‍तराखंड से सत्तारूढ़ भाजपा से कोई मुस्लिम विधायक नहीं है.

मध्‍य प्रदेश और उत्‍तराखंड से केवल एक मुस्लिम विधायक हैं और वह कांग्रेस से हैं. हरियाणा से दो मुसलमान विधायक हैं जो कि इनेलो के टिकट पर जीते हैं.

इसी तरह से गुजरात में कांग्रेस से दो मुस्लिम विधायक हैं. राजस्‍थान में दो मुस्लिम विधायक हैं, वो भाजपा से जीते हैं. इससे पहले की विधानसभा चुनाव में वहां 10 मुस्लिम विधायक थे. छत्तीसगढ़ विधानसभा में कोई मुस्लिम विधायक नहीं है.

महाराष्‍ट्र जहां पर भाजपा-शिवसेना की सरकार है वहां पर आठ मुस्लिम विधायक हैं. ये कांग्रेस और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्‍तेहादुल मुसलिमीन से चुने गए हैं. गौरतलब है कि महाराष्ट्र की आबादी में करीब दस फीसदी मुसलमान हैं.

मुस्लिम आबादी के लिहाज़ से दूसरे बड़े राज्यों पश्चिम बंगाल, बिहार और असम की चर्चा करें तो यहां भी मिला-जुला नज़ारा देखने को मिलता है.

मुस्लिम नुमाइंदगी को लेकर बिहार अपवाद है. बिहार में जहां 2010 में 19 मुसलमान विधायक थे वहीं 2015 के विधानसभा चुनाव के बाद 24 विधायक हो गए.

पश्चिम बंगाल में 2011 और 2016 दोनों विधानसभा चुनावों में 49 मुसलमान विधायक चुनाव जीते हैं. वहीं असम में 2011 में 28 मुस्लिम विधायकों ने चुनाव जीता था, जबकि 2016 में 29 मुसलमान विधायक जीतने में सफल रहे हैं. इसमें असम को छोड़कर बाकी दोनों राज्यों में ग़ैरभाजपा दलों की सरकार है.

इसी तरह अगर बाकी बचे राज्यों की चर्चा करें तो 13 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले तेलंगाना में बतौर विधायक 7 प्रतिशत हिस्‍सेदारी है. छह फीसदी मुस्लिम आबादी वाले तमिलनाडु में इस वर्ग के दो प्रतिशत यानी कुल पांच विधायक हैं. ओडिशा में मुस्लिमों की आबादी दो फीसदी है, लेकिन वहां से सिर्फ़ एक मुस्लिम विधायक है.

हिमाचल प्रदेश में दो प्रतिशत मुस्लिम आबादी है लेकिन प्रतिनिधित्‍व शून्‍य है. ख़ास बात यह कि ये सभी राज्‍य ग़ैर भाजपा शासित हैं.

यही हाल आंध्र प्रदेश का भी है जहां सात फीसदी मुस्लिम आबादी है और विधायक दो फीसदी हैं. गोवा में सात फीसदी मुस्लिम आबादी है लेकिन कोई विधायक नहीं है.

इसी तरह लोकसभा में अभी केवल 23 सांसद मुस्लिम समुदाय से हैं. 543 सदस्यीय लोकसभा में यह हिस्सेदारी कुल 4.2 प्रतिशत है. जबकि देश की जनसंख्या में मुसलमानों की हिस्सेदारी 14.2 प्रतिशत है.

2014 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिम सांसद सिर्फ सात राज्यों पश्चिम बंगाल, बिहार, जम्मू कश्मीर, केरल, असम, तमिलनाडु, तेलंगाना और एक केंद्रशासित प्रदेश लक्षद्वीप से चुने गए हैं. इन राज्यों में कुल मुस्लिम जनसंख्या के 46 प्रतिशत लोग रहते हैं.

New Delhi: Parliament during the first day of budget session in New Delhi on Tuesday. PTI Photo by Kamal Kishore (PTI2_23_2016_000104A)

(फोटो: पीटीआई)

बाकी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, झारखंड, दिल्ली, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश समेत 22 राज्यों और छह केंद्र शासित प्रदेशों से कोई मुस्लिम प्रतिनिधि चुनकर संसद नहीं पहुंचा है. जबकि इन राज्यों में 54 प्रतिशत मुस्लिम आबादी रहती है.

जानकारों का कहना है कि इस बार के राष्ट्रपति चुनाव में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व सबसे कम रहेगा क्योंकि विधायिका में उनकी नुमाइंदगी सबसे कम है.

हालांकि बहुत सारे लोग केंद्र समेत देश के 14 राज्यों में सत्तारूढ़ भाजपा के बहुसंख्यक तुष्टीकरण की राजनीति को इसका कारण बताते हैं. उनका कहना है कि भाजपा की इस तरह की राजनीति ने मुसलमान वोट बैंक की ताक़त ख़त्म कर दी है.

वरिष्ठ पत्रकार अभय कुमार दुबे कहते हैं, ‘केंद्र में भाजपा सरकार आने के बाद मुसलमानों की राजनीतिक हालत बहुत ही ख़राब हो गई है. अगर हम पिछले कुछ सालों के चुनाव को देखें तो मुसलमानों को भी ये बात समझ में आ गई है कि कौन-सी पार्टी सत्ता में आएगी यह तय करने की ताकत उनके वोट बैंक में नहीं रह गई है.’

वे आगे कहते हैं, ‘मुसलमानों ने भाजपा के ख़िलाफ़ 2014 में वोट दिए लेकिन वह सत्ता में आ गई. हाल के उत्तर प्रदेश चुनावों में भी भाजपा ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया तब भी वह जीत गई. मतलब मुसलमानों की राजनीतिक हैसियत में इतनी गिरावट पहले कभी नहीं थी.’

हालांकि मुसलमानों की सामाजिक और आर्थिक हैसियत की चर्चा करने के लिए सच्चर कमेटी का ज़िक्र करना ज़रूरी है. रिपोर्ट में बताया था कि किस तरह से मुसलमान आर्थिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हैं, सरकारी नौकरियों में उन्हें उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता है.

इसके अलावा बैंक लोन लेने में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. कई मामलों में उनकी स्थिति अनुसूचित जाति-जनजातियों से भी ख़राब है, फिर वो चाहे शिक्षा, रोज़गार का मसला हो या अन्य मानव विकास सूचकांक.

वरिष्ठ पत्रकार राशिद किदवई कहते हैं, ‘लोकतंत्र में भागीदारी का मतलब सिर्फ़ किसी समुदाय, वर्ग या धर्म को मिलने वाले ख़ास लाभ से नहीं होता है बल्कि यह उस समुदाय की राजनीतिक और सामाजिक स्वीकार्यता को भी दर्शाता है. हमारे यहां आरक्षण का प्रावधान करते वक़्त इस बात का ख़ास ध्यान दिया गया कि सभी समुदायों और वर्गों की हिस्सेदारी बनी रही.’

वे आगे कहते हैं, ‘मुसलमानों का घटते राजनीतिक प्रतिनिधित्व का असर हमें तत्काल तो नहीं दिखाई दे रहा है लेकिन लंबे समय में इसका बहुत नुकसान होगा. इसका असर यह होगा कि एक वर्ग हमारी व्यवस्था में पूरी तरह से सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ जाएगा.’

मुसलमानों की राजनीतिक नुमाइंदगी घटने का मतलब है कि हालात और ख़राब होंगे. समुदाय को पूर्ण रूप से हाशिये पर रहने जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है.

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग के प्रोफेसर आफ़ताब आलम कहते हैं, ‘पहली बात राष्ट्रीय पार्टी भाजपा मुसलमानों को टिकट ही नहीं दे रही है, जिसका कारण है उनका प्रतिनिधित्व तेजी से गिर रहा है. दूसरी बात यह है कि क्या मुसलमान हितों की रक्षा के लिए उनका ही प्रतिनिधि विधायिका में होना जरूरी है? क्या सरकार में शामिल लोग उनके हितों की रक्षा नहीं कर रहे हैं? इस पर तमाम मत हैं.’

वे आगे कहते हैं, ‘अगर लोकतंत्र में सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व नहीं रहेगा तो विशिष्ट वर्ग की सरकार बनेंगी. अगर सभी वर्गों और समुदायों का उचित प्रतिनिधित्व रहेगा तो हम कह सकेंगे कि सर्वांगीण सरकार है. फिलहाल जहां तक विधायिका में मुसलमानों के घटते प्रतिनिधित्व का सवाल है तो इसका परिणाम यह हो रहा है कि सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय होने के बावजूद वह अलग-थलग होते जा रहा हैं. यह हमारे लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक है.’

फिलहाल केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा का दावा है कि उनकी सरकार अल्पसंख्यक हितों का ख़ास ख़्याल रख रही है. पार्टी नेता इसके लिए ‘सबका साथ, सबका विकास’ नारे की चर्चा करते हैं.

वरिष्ठ साहित्यकार असगर वजाहत कहते हैं, ‘यह बीजेपी की काफी सोची समझी नीति है कि राजनीति की मुख्यधारा से मुसलमानों को हटाओ. इसके चलते ध्रुवीकरण इतना ज़्यादा हो गया है कि मुसलमानों को अगर सिर्फ़ मुसलमानों का कुल वोट भी मिल जाए तो वह जीत नहीं सकते हैं. लेकिन यह लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक संकेत है क्योंकि आप देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय को यह महसूस करवा दे रहे हैं कि उसकी लोकतंत्र में कोई भूमिका नहीं है.’

वे आगे कहते हैं, ‘अब जब ये बात मुसलमान समेत दूसरे अल्पसंख्यक समुदायों को समझ में आ जाएगी कि उनकी लोकतंत्र में कोई भूमिका नहीं है तो उसके बाद यह मांग शुरू होगी कि जब वह लोकतंत्र में शामिल नहीं हैं तो किस रूप में उनकी भूमिका होगी. फिर कुछ नए तरह का घटनाक्रम होगा जो लोकतंत्र के लिए बेहतर नहीं ही होगा.’

वहीं वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कहती हैं, ‘अगर सहभागिता नहीं होगी तो अलगाव होगा. अगर 18 करोड़ मुसलमान हैं और उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं होगा तो निसंदेह चिंता करने वाली बात होगी. इसके कारणों पर भी पड़ताल करनी होगी कि कैसे बहुसंख्यक समुदाय की भावनाओं को भड़काया जा रहा है. कैसे अल्पसंख्यक समुदाय को मुख्यधारा से अलग-थलग किया जा रहा है. इस पर सभी को विचार करना होगा. हमारे समाज को, हमारे राजनीतिक दलों. क्योंकि अगर यही हालात रहे तो आने वाले वक़्त में हालात और ख़राब होंगे.’