भारत

ऐतिहासिक रोज़गार संकट से आंखें चुरा रही है मोदी सरकार

विधानसभा चुनावों में विभाजनकारी और भावनात्मक मुद्दों पर भाजपा को मिल रही जीत ने सरकार में यह भाव भरने का काम किया है कि अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर भी सब बढ़िया है.

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(फाइल फोटो: रॉयटर्स)

प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी तीन साल पूरे कर रहे हैं. 2014 के चुनावी भाषणों में उन्होंने नौजवानों से रोज़गार दिलाने का वादा किया था. तीन साल पूरे होने पर मोदी को यह वादा निभाने में उनकी सरकार की नाकामी के बारे में गंभीरता से चिंता करनी चाहिए.

मुझे याद है, अपनी कई जनसभाओ में मोदी ने पढ़ाई पूरी करके श्रम बाज़ार के दरवाजे पर खड़े नए मतदाताओं से उनकी ज़िंदगी बेहतर बनाने के लिए भाजपा को एक मौका देने की मांग की थी.

मोदी ने कहा था, ‘मैं पचास साल वालों के लिए तो ज्यादा कुछ नहीं कर सकता, मगर मैं नए रोज़गार की तलाश कर रहे बीस साल के नौजवानों के जीवन को बदलना चाहता हूं’.

अगर एनडीए को सिर्फ इसी एक पैमाने पर परखा जाए, तो उसे बुरी तरह नाकाम करार दिया जाएगा. श्रम मंत्रालय द्वारा मुहैया कराए गए सरकारी आंकड़े भी इसकी तस्दीक करते हैं.

बस एक तुलनात्मक आंकड़ा हमें संगठित क्षेत्र में नौकरियों की तेज गिरावट की कहानी कहने के लिए काफी है. 2009-11 के बीच जब भारत की जीडीपी 8.5 प्रतिशत के औसत से वृद्धि कर रही थी, तब संगठित क्षेत्र में हर साल 9.5 लाख नई नौकरियां पैदा हो रही थीं.

हमें इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि इसके बावजूद इस विकास को जॉबलेस ग्रोथ यानी बगैर नौकरी का विकास कहा गया. पिछले दो सालों,  2015 और 2016 में औसत रोज़गार निर्माण गिरकर 2 लाख नौकरियां प्रतिवर्ष तक आ गया है.

यह 2011 से पहले वार्षिक रोज़गार निर्माण के 25 प्रतिशत से भी कम है.

ऐसे में यह सवाल पूछा जाना लाज़िमी है कि आखिर कपड़ा, धातु, चमड़े, रत्न एवं आभूषण, आईटी एवं बीपीओ, ट्रांसपोर्ट, ऑटोमोबाइल्स और हतकरघा जैसे संगठित क्षेत्रों में रोज़गार निर्माण में आई इस तेज गिरावट की वजह क्या है?

इससे भी बड़ा सवाल यह है कि आखिर इन क्षेत्रों में गड़बड़ी कहां हो रही है, जबकि माना यह जाता है कि वैश्विक स्तर पर भारत को इन क्षेत्रों में बढ़त हासिल है.

2015 में इन आठ क्षेत्रों में नए रोज़गार का निर्माण गिरकर अब तक के सबसे निचले स्तर, 1.5 लाख पर आ गया. इसे खतरे की घंटी समझकर सरकार ने आंकड़े इकट्ठा करने के तरीके की समीक्षा करने का फैसला लिया.

इसने संगठित क्षेत्र का दायरा बढ़ाते हुए शिक्षा, स्वास्थ्य और रेस्ट्रां जैसे कुछ अहम सेवा उद्योगों को इसमें शामिल कर लिया.

जाहिर है यह रोज़गार वृद्धि के आंकड़ों में उछाल लाने के लिए किया गया था क्योंकि निर्माण क्षेत्र का विकास बेहद निराशाजनक रहा था- करीब 1.5 प्रतिशत प्रतिवर्ष. जबकि सेवा क्षेत्र की स्थिति काफी अच्छी थी और यह 7-8 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा था.

ज़ुबानी साक्ष्यों के आधार पर यह भी माना गया कि नोटबंदी से स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में रोज़गार निर्माण को नुकसान नहीं उठाना पड़ा.

संगठित क्षेत्र में सेवा क्षेत्र को जोड़ने से सरकार को 2016 के लिए रोजगार निर्माण में वृद्धि के थोड़े बेहतर आंकड़े पेश करने में मदद मिली है.

2015 में जहां, नई नौकरियों के निर्माण का आंकड़ा 1.55 लाख था, वहीं 2016 में यह बढ़कर 2.31 लाख हो गया. फिर भी यह 2009 में संगठित क्षेत्र मे हुए नए नौकरियों के निर्माण का सिर्फ एक चौथाई ही है.

इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण ये है कि रोज़गार वृद्धि की माप का नया तरीका एनडीए सरकार की मदद इस मिथक का प्रचार करने में करता है कि अक्टूबर-दिसंबर, 2016 की नोटबंदी की तिमाही में नौकरियों पर कोई खास असर नहीं पड़ा.

श्रम मंत्रालय के आंकड़े आश्चर्यजनक ढंग से इस तिमाही के दौरान निर्माण क्षेत्र के अलावा जिसमें रोज़गार वृद्धि दर में हल्की गिरावट देखी गई, अन्य सभी क्षेत्रों में रोजगार में बढ़ोतरी दिखाते हैं.

प्रथम दृष्टया इस बात पर यकीन करना मुश्किल है कि करीब छह महीने पहले जब नोटबंदी के कारण अर्थव्यवस्था पस्त पड़ी थी, उद्योग नई भर्तियां कर रहे थे.

यह मुमकिन है कि सरकार शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में नई भर्तियां कर रही हो, जिसके कारण इनमें बढ़ोतरी दिख सकती है. मगर संगठित क्षेत्र का बड़ा हिस्सा इस दौरान नोटबंदी के कारण पैदा हुई नई स्थिति से निपटने में ही लगा हुआ था, क्योंकि इस समय लगभग हर क्षेत्र में बिक्री में कमी आई थी.

अब तक हमने केवल संगठित क्षेत्र के रोज़गार के बारे मे बात की है. नोटबंदी के कारण असंगठित क्षेत्र के छोटे निर्माताओं को उत्पादन और नौकरी, दोनों मोर्चों पर भारी गिरावट झेलनी पड़ी.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के से जुड़े भारतीय मज़दूर संघ के महासचिव वृजेश उपाध्याय ने द वायर को बताया, ‘नोटबंदी के दौरान 2.5 लाख इकाइयों पर ताला पड़ गया. अगर आप उस तिमाही के दौरान बंद हुई इकाइयों में औसतन 5-10 मज़दूर भी मानें, तो रोज़गार का काफी ज्यादा नुकसान हुआ होगा.’

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(फाइल फोटो: रॉयटर्स)

असंगठित क्षेत्र में रोज़गार के आंकड़ों का अनुमान लगाना मुश्किल है, मगर अर्थशास्त्री इस बात पर एकमत हैं कि संगठित क्षेत्र और असंगठित क्षेत्र के रुझानों में आपसी रिश्ता है.

ये दोनों उलटी दिशा में नहीं चल सकते. सरकार अक्सर यह दावा करती रही है कि आम तौर पर संगठित क्षेत्र की तुलना में असंगठित क्षेत्र में नौकरियां कहीं ज्यादा तेज रफ्तार से बढ़ी हैं.

हालांकि, इस दावे को सबित करने के लिए कोई आंकड़ा मौजूद नहीं है. इसके अलावा अगर पिछले चार सालों में संगठित क्षेत्र में रोज़गार वृद्धि दर में 70 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आई है.

ऐसे में इस बात की गुंजाइश बेहद कम है कि इस दौरान श्रम बाजार के 85 फीसदी हिस्से का निर्माण करने वाले असंगठित क्षेत्र की नौकरियों में तगड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गयी हो. साफ है कि यह मोदी सरकार की सबसे बड़ी नाकामी साबित हुई है.

आने वाले दो-तीन सालों के लिए आईटी और बीपीओ जैसे क्षेत्रों में छंटनी को लेकर लगाए जा रहे विनाशकारी पूर्वानुमान चिंताओं को और बढ़ाने वाले हैं.

ये बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन करने वाले क्षेत्र रहे हैं. इन दोनों क्षेत्रों में आज करीब 40 लाख लोग कार्यरत हैं. अंदरूनी अनुमानों के मुताबिक इनमें से करीब 60 फीसदी अपने वर्तमान कौशल स्तर पर बेकार हो जाएंगे.

नैसकॉम के प्रेसिडेंट आर. चंद्रशेखर के मुताबिक़, ‘इस वर्कफोर्स के एक बड़े हिस्से को फिर से ट्रेनिंग देनी होगी. इसके बाद भी इनकी नौकरी बचे रहने की कोई गारंटी नहीं है. ऑटोमेशन से न सिर्फ आईटी और बीपीओ क्षेत्र की वर्तमान नौकरियों पर असर पड़ रहा है, बल्कि ऑटोमोबाइल और इंजीनियरिंग जैसे कई मैन्युफैक्चरिंग सेक्टरों की नौकरियों को भी यह प्रभावित कर रहा है. हम फिक्की के साथ मिलकर इस बारे में एक साझा अध्ययन कर रहे हैं.’

इंफोसिस के सीईओ विकास सिक्का ने ज्यादा साफगोई दिखलाते हुए यह संकेत दिया कि आने वाले कुछ वर्षों में आईटी/बीपीओ क्षेत्र में लगे आधे से ज्यादा कर्मचारी किसी काम लायक नहीं बचेंगे.

स्थिति काफी गंभीर है, मगर सरकार यह मानने को तैयार नज़र नहीं आती. वह आर्थिक आंकड़ों को सहलाने में ही व्यस्त है.

कम से कम मैंने, सरकार में किसी को भारत के संगठित मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर में नौकरियों के भविष्य के बारे में गंभीरता से बहस करते नहीं सुना है.

विधानसभा चुनावों में विभाजनकारी और भावनात्मक मुद्दों पर भाजपा को मिल रही जीत ने सरकार में यह भाव भरने का काम किया है कि अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर भी सब बढ़िया है.

यह भी समस्या का एक अंग बन गया है. क्योंकि नोटबंदी ने चुनावों में भाजपा को नुकसान नहीं पहुंचाया इसलिए इसका प्रचार एक महान सफलता के तौर पर किया जा रहा है.

मोदी को वास्तव में लगता है कि मुद्रा बैंक जैसी पहल के दम पर अर्थव्यवस्था का अनौपचारिक क्षेत्र काफी अच्छी स्थिति में है. यह जरूर है कि सरकारी अर्थशास्त्री पहले से ही स्वरोजगार के फायदों के पक्ष मे घुमावदार दलीलें देना शुरू कर चुके हैं.

लेकिन यह सब विश्वास और आस्था की दुनिया तक सीमित है, क्योंकि किये जा रहे दावों के पक्ष में बहुत कम आंकड़े हैं. पहले खंभा छूने वाले तंत्र में चुनावी जीतों का इस्तेमाल जमीनी हक़ीक़त से इनकार करने के लिए नहीं किया जा सकता है.

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