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कश्मीर में शांति के दावों के बीच पैलेट से घायल होने वालों की बढ़ती संख्या

ग्राउंड रिपोर्ट: अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद सरकार द्वारा घाटी में ‘शांति’ के दावे के बीच बीते कुछ दिनों में श्रीनगर के श्री महाराजा हरि सिंह अस्पताल में पैलेट गन से घायल हुए करीब दो दर्जन मरीज भर्ती हुए हैं.

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श्रीनगर के नातीपोरा में 15 साल के नदीम को ट्यूशन जाते समय आंख में पैलेट गन से चोट लगी. उनका कहना है कि वे अब दाईं आंख से नहीं देख पा रहे हैं. अपनी मां के साथ नदीम. (फोटो: सिद्धार्थ वरदराजन/द वायर)

श्रीनगर: नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा घटाए जाने के बाद के तीन दिनों में श्रीनगर के प्रमुख अस्पताल में कम से कम 21 युवा लड़कों को पैलेट गन से घायल होने के बाद इलाज के लिए लाया गया है. द वायर  इसकी सत्यता प्रमाणित कर सकता है.

हालांकि अस्पताल प्रशासन द्वारा आधिकारिक रूप से कोई जानकारी देने से मना कर दिया गया, लेकिन शहर के श्री महाराजा हरि सिंह अस्पताल के डॉक्टरों और नर्स ने बताया कि 6 अगस्त को तेरह और 7 अगस्त को आठ ऐसे घायलों को इलाज के लिए लाया गया, जिनकी आंखों या शरीर के अन्य हिस्सों में पैलेट गन से लगी चोटें थीं.

इनमें से कइयों की एक आंख की दृष्टि चली गई है; कुछ की दोनों आंखों की रोशनी जाने का खतरा बना हुआ है. ऐसी ख़बरें आई थीं कि एक घायल युवा प्रदर्शनकारी की मौत भी हुई है, लेकिन अस्पताल में कोई इस बात की पुष्टि नहीं कर सका.

मरीजों से भरे इस अस्पताल में द वायर  ने वॉर्ड संख्या 8 में भर्ती कुछ पीड़ितों और उनके परिवारों से मुलाकात की. कुछ ने कहा कि शहर के मुख्य हिस्से में विरोध-प्रदर्शन के दौरान उन्हें गोली लगी, वहीं कुछ का कहना था कि बिना किसी तरह की पत्थरबाजी के उन्हें सुरक्षाबलों द्वारा निशाना बनाया गया.

मीडिया के एक हिस्से द्वारा घाटी में ‘शांति’ होने की ख़बरों के दावे को धता बताते हुए, पैलेट गन से घायल हुए लोगों की संख्या घाटी की उस अनिश्चितता की कठोर तस्वीर पेश करती है, जिसके बारे में मोदी सरकार के अनुच्छेद 370 हटाने के बाद से बात की जा रही थी.

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श्री महाराजा हरि सिंह अस्पताल में भर्ती एक अन्य घायल युवक ने बात करने से इनकार कर दिया. (फोटो: सिद्धार्थ वरदराजन/द वायर)

सरकार के फैसले की घोषणा के बाद शहर में बंद घोषित कर दिया गया था- जो अब तक जारी है- मोबाइल और लैंडलाइन नेटवर्क को बंद कर दिया गया, इंटरनेट सेवाएं ठप कर दी गईं, अख़बारों का प्रकाशन रोक दिया गया और कर्फ्यू लगा दिया गया, जिसके नियमों के बारे में कोई आधिकारिक सूचना नहीं दी गई.

कुछ मुख्य सड़कों पर, खासकर प्रमुख अस्पतालों के आस-पास- ढेरों कंटीले तारों और बैरिकेड के बीच से- यातायात की अनुमति है. साथ ही कुछ विशेष इलाकों में आना-जाना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है, खास तौर पर उनके लिए जिनके पास आने-जाने के लिए अपना कोई साधन नहीं है.

अपने मोहल्ले-पास पड़ोस में तो लोग आ-जा रहे हैं, शाम को एकाध किराने की दुकान, फल वाले और बेकरी भी कुछ देर के लिए खुले दिखाई देते हैं. लेकिन किस बात की अनुमति है, किसकी नहीं, इसे लेकर बनी हुई अनिश्चितता के चलते किसी साधारण-सी गतिविधि का भी नतीजा भारी पड़ सकता है.

7 अगस्त को श्रीनगर के नातीपोरा का 15 साल का नदीम एक और लड़के के साथ ट्यूशन जाने के लिए निकला था, जब उसे पैलेट से चोट लगी. वो बताते हैं कि वे अब दायीं आंख से कुछ देख नहीं सकते.

गांदेरबल जिले के दो युवाओं की भी आंखों का इलाज चल रहा है. इनमें से एक व्यक्ति बेकरी में काम करते हैं और गुस्से में पहले तो उन्होंने इस रिपोर्टर से बात करने से इनकार कर दिया था.

अपनी घायल आंखों पर काला चश्मा पहने इस शख्स ने कहा, ‘मैं दिल्ली से आए किसी से भी बात नहीं करना चाहता, क्या मतलब है उसका?’ क्या आपमें से कोई सुनना भी चाहता है कि हम क्या कह रहे हैं?’

हालांकि उनके दोस्त, जो ज्यादा गंभीर रूप से घायल नहीं हैं, ने बताया कि उनके साथ क्या हुआ. उन्होंने कहा, ‘हम अपनी दुकान में रोटी बना रहे थे जब सुरक्षा बल के लोग आए और बोले- तुम लोग कश्मीरियों को रोटी खिलाने जा रहे हो? तुम्हें उन लोगों को ज़हर दे देना चाहिए. उन्होंने दुकान पर गोलियां बरसाईं और चले गए.’

उनके द्वारा बताई गई इस घटना की सत्यता की पुष्टि करना मुमकिन नहीं है. लेकिन उनकी चोटें असली थीं, इस बात में कोई शक नहीं है. न उनके गुस्से को लेकर ही कोई संदेह है.

जहां एक पीड़ित का कहना था कि अब ज्यादा से ज्यादा लोगों के पास अब केवल हथियार उठाने का विकल्प बचा है, वहीं एक युवा लड़के के पिता का कहना था कि सरकार को समझना चाहिए कि लोगों को इस तरह पैलेट गन से घायल करके उन्हें सरकार की नीति के सही होने का यकीन नहीं दिलाया जा सकता.

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पैलेट के हमले में घायल गांदेरबल के दो युवक. (फोटो: सिद्धार्थ वरदराजन/द वायर)

वे सरकार के फोन पर प्रतिबंध लगाने को लेकर भी खासे नाराज थे. उनका कहना था, ‘मैं इस बारे में बात नहीं करता कि उन्होंने अनुच्छेद 370 के बारे में क्या किया- लेकिन अमित शाह ने क्या किया- बाप को बेटे से दूर कर दिया, पति को पत्नी से, बहन को भाई से, हम में से किसी को नहीं पता हमारी बहन कहां हैं, मां कहां हैं… अगर वे चाहते थे तो उन्हें इंटरनेट बंद कर देना चाहिए था, लेकिन वे फोन तो चलने दे सकते थे. यह उसी तरह है, जैसे यहूदियों ने किया था. मुझे यकीन है कि अमित शाह असली हिंदू नहीं हैं, एक हिंदू कभी ऐसा नहीं कर सकता. वे किसी यहूदी की तरह व्यवहार कर रहे हैं.’

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)