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जम्मू कश्मीर: दक्षिण एशियाई शिक्षाविदों और कार्यकर्ताओं ने ‘अमानवीय बर्ताव’ की निंदा की

250 से अधिक शिक्षाविदों, कलाकारों और कार्यकर्ताओं ने बयान जारी कर कहा कि जम्मू कश्मीर में भारत सरकार के फैसले दिखाते हैं कि उनके मन में संविधान, धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति कोई सम्मान नहीं है.

Reuters-Danish-Siddiqui

(फोटो साभारः रॉयटर्स/दानिश सिद्दीकी)

नई दिल्लीः जम्मू कश्मीर के लोगों के साथ एकजुटता दिखाते हुए 250 से अधिक शिक्षाविदों, कलाकारों, कार्यकर्ताओं और अन्य ने 15 अगस्त को एक बयान जारी कर कश्मीर में ‘अमानवीय बर्ताव’ की निंदा की है.

इस संबंध में एक बयान जारी किया गया, जिसमें हस्ताक्षर करने वालों में दक्षिण एशियाई नागरिक भी हैं और वो भी हैं, जिन्होंने दक्षिण एशियाई क्षेत्र में काम किया है.

इनमें वीना दास, पार्थ चटर्जी, ए.एस.पन्नीरसेल्वम, आयशा जलाल, शाहिदुल आलम, कुलचंद्र गौतम, ज्ञानेंद्र पांडे, चंद्र तलपड़े मोहंती, एमवी.रमना, परवेज़ हुदभॉय, जिया मियां, सोफिया करीम, शर्मीन ओबैद चिनॉय, मार्था नुसबूम और शेल्डन पॉलक हैं.

इस बयान में अनुच्छेद 370 हटाए जाने की निंदा की गई. इसके साथ ही हस्ताक्षरकर्ताओं ने उन मीडिया रिपोर्टों का भी उल्लेख किया गया, जिसमें कहा गया कि प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी की गई और घाटी में लोगों की आवाजाही और संचार व्यवस्था ठप है.

बयान में कहा गया, ‘भारत सरकार की ये गतिविधियां संवैधानिकता, धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक मूल्यों में सम्मान की पूर्ण कमी को दिखाता है. यह भारत के लोगों के लिए सही नहीं है, जिन्होंने दशकों के लोकतांत्रिक मूल्यों से लाभ उठाया है.’

बयान में आगे कहा गया, ‘हम जम्मू और कश्मीर में हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों को लेकर चिंतित हैं. हम विचलित हैं कि दशकों से हिंसा और राजनीतिक असंतोष के बीच रह रहे यहां के लोगों को बीते लगभग दस दिनों से सैन्य दबाव के जरिए उनके अधिकारों से वंचित कर दिया गया है.

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 370 जम्मू कश्मीर और भारत के लोगों के बीच ऐतिहासिक समझ को दर्शाता है. पांच अगस्त 2019 को न सिर्फ अनुच्छेद 370 हटाया गया बल्कि जम्मू कश्मीर से राज्य का दर्जा लेकर उसे केंद्र सरकार के अधीन कर दिया, जिस तरह कार्यकारी आदेश के जरिए यह अनुच्छेद हटाया गया है, वह जम्मू कश्मीर के लोगों के साथ विश्वासघात है. यह लोकतांत्रिक शासन का अंत है और इस फैसले की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है.

हम जम्मू कश्मीर में नागरिक अधिकारों के हनन, दूरसंचार एवं इंटरनेट सेवाओं पर रोक, मीडिया, लोगों की आवाजाही, शांतिपूर्ण तरीके से उनके इकट्ठे होने और विरोध पर प्रतिबंध और प्रदर्शनों के हिंसक दमन की निंदा करते हैं. यह नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय करार (आईसीसीपीआर) सहित अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों का उल्लंघन है, जिसे 1979 में भारत ने मंजूरी दी थी.

हम सुरक्षाबलों द्वारा शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन कर रहे प्रदर्शनकारियों पर चलाई गई गोलियों की विश्वसनीय मीडिया रिपोर्टों से हैरान और प्रशासन द्वारा इससे इनकार किए जाने से चिंतित हैं. प्रशासन इसे पत्रकारों द्वारा मनगढ़ंत वाकया बता रहा है. हम असहमति जताने वालों को भारत सरकार द्वारा चुप कराए जाने, सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों, पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी से चिंतित हैं. हम भारत सरकार द्वारा मैजोटेरियन पॉपुलिज्म के उपयोग से देशभर में डर का माहौल बनाने की निंदा करते हैं.

हम भारत सरकार से जम्मू कश्मीर में अमानवीय बंदी को तत्काल खत्म करने, नागरिक अधिकारों को बहाल करने, सभी राजनीतिक बंदियों और कैदियों को तत्काल रिहा करने और जम्मू कश्मीर के लोगों से बातचीत करने का आग्रह किया है.’

बयान में यह भी कहा गया कि अगस्त में जब हम आजादी का जश्न मना रहे हैं, ऐसे में हम इस निरंकुश शासन के दमन की निंदा करते हैं. हम जम्मू कश्मीर के लोगों, भारत और दक्षिण एशिया के लोगों के साथ एकजुटता के साथ खड़े हैं, जो शांति, समृद्धि और मौलिक स्वतंत्रता की चाह रखते हैं.

इस बयान को नीचे पूरा पढ़ा जा सकता है.

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